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निजता के अधिकार को लेकर पांच राज्यों ने केंद्र को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में पांच गैर–भाजपा शासित राज्यों ने केंद्र से उलट निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने की मांग की है। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल इन पांचों राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

डेक्कन हेराल्ड के मुताबिक बुधवार को कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, पंजाब, पुडुचेरी और हिमाचल प्रदेश ने निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार मानने का समर्थन किया है। जबकि, केंद्र इसे सामान्य कानूनी अधिकार बता रहा है। 

सुनवाई के दौरान इन राज्यों के वकील कपिल सिब्बल ने कहा, ‘निजता एक निरपेक्ष अधिकार नहीं हो सकता, फिर भी यह मौलिक अधिकार ही है।’ साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से तकनीकी विकास को ध्यान में रखकर अनुच्छेद-21 को नए सिरे से परिभाषित करने की मांग भी की है।

वहीं, केंद्र सरकार का कहना है कि निजता का अधिकार एक सामान्य अधिकार है और यह मौलिक अधिकारों का हिस्सा नहीं है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपनी दलील में कहा कि ‘जीवन जीने का अधिकार’ (राइट टू लाइफ)’ निजता का अधिकार’ (राइट टू प्राइवेसी) से बड़ा और ज्यादा अहम है। सरकार ने कहा कि अगर ‘राइट टू प्राइवेसी’ और ‘राइट टू लाइफ’ के बीच में से किसी एक को तरजीह देने की बात आए तो ‘राइट टू लाइफ’ को तरजीह मिलनी चाहिए। 

ग़ौरतलब है कि इस मामले पर नौ जजों की बेंच सुनवाई कर रही है, जिसकी अध्यक्षता सीजेआई जे एस खेहर कर रहे हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि आधार योजना के तहत बायोमेट्रिक सूचना इकट्ठा और साझा करना निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

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