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हाशिमपुरा नरसंहार: 30 साल बाद वही सवाल PAC जवान निर्दोष थे तो मुसलमानों को किसने मारा

आज ही के दिन 22 मई 1987 को उत्तर प्रदेश के हाशिमपुरा गांव में 42 मुसलमानों को पीएसी (प्रोवेंशियल आर्मड काउंस्टेबलरी) जवानों ने मौत के घाट उतार दिया था। इस हत्या का षड़यंत्र बहुत ही सुनियोजित तरीके से किया गया था। लेकन साल 2015 आते-आते दिल्ली की एक अदालत ने नरसंहार के सभी 16 अभियुक्तों बरी कर दिया।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की रिज़र्व पुलिस बल पीएसी के जवानों को बरी करते हुए कहा था कि अभियोजन पक्ष संदिग्ध पुलिसकर्मियों की पहचान साबित करने में नाकाम रहा है। लेकिन इस मुकदमे का सबसे बड़ा सवाल अनसुलझा ही रह गया कि आखिर उन 42 मुसलमानों को किसने मारा।

27 साल बाद आए अदालत के फैसले के बाद पीड़ित परिवार के लोगों को मानो ऐसा लगा कि उस नरसंहार का कोई दोषी नहीं है। उन सारे मुसलमनों को पीएसी की 41वीं कंपनी ने गोली मारी थी। मारे गए 42 लोगों के अलावा इस घटना में कई छोटे-छोटे बच्चे बच गए थे जबकि कई घायल भी हुए थे। इस नरसंहार की चार्जशीट गाजियाबाद में 1996 में दाखिल की गई। यानी नौ साल तक यह मामला ऐसे ही लटका रहा।

इंसाफ के इंतजार में परेशान हाशिमपुरा के पीड़ितों और उनके परिजनों ने आखिरकार 2002 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सितंबर, 2002 में मुकदमे को दिल्ली स्थानांतरित किया गया। इस दौरान 19 आरोपियों में से तीन की मौत सुनवाई के दौरान ही हो गई।

जिस दिन सरकार प्रायोजित यह नरसंहार चलाया गया था उस दिन रमजान का आखिरी जुमा यानी अलविदा का दिन था। उस दिन नमाज के बाद हाशिमपुरा और आसपास के मुहल्लों में तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी अभियान चलाया गया। सभी मर्दों और बच्चों को मुहल्ले के बाहर मुख्य सड़क पर इकट्ठा करके वहां मौजूद पीएसी के हवाले कर दिया गया। इस दौरान 644 मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उनमें अकेले हाशिमपुरा के 150 मुस्लिम नौजवान शामिल थे।

हाशिमपुरा नरसंहार के समय गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक विभूति नारायण राय ने पिछले साल एक किताब लिखा था। वो कहते है, “मेरी अंतरात्मा पर सास 1987 में उमस भरी गर्मियों में 22 मई की भयानक रात अब भी बोझ बनी हुई है। और इसी तरह से बाद के दिन मेरी यादों में ऐसे उकरे हुए है जैसे कि किसी पत्थर पर हों, इसने मुझे पुलिसकर्मी के रूप में जकड़ लिया। हाशिमपुरा का अनुभव मुझे अब भी पीड़ा देता है।’’

वो इपनी किताब ‘हाशिमपुरा 22 मई: द फारगॉटन स्टोरी आफ इंडियाज बिगेस्ट कस्टोडियल किलिंग्स’ में लिखते हैं, ‘‘यह रात करीब साढे दस बजे की बात है और मैं बस हापुड़ से आया था। जिला मजिस्ट्रेट नसीम जैदी को उनके आधिकारिक आवास पर उतारने के बाद मैं पुलिस अधीक्षक के आवास पहुंचा। मैं जैसे ही इसके दरवाजे पर पहुंचा, मेरी कार की हेडलाइट डरे हुए और घबराए हुए निरीक्षक वी.बी. सिंह पर पड़ी जो उस समय लिंक रोड थाने के प्रभारी थे। मैं अनुमान लगा सकता था कि उनके क्षेत्र में कुछ खौफनाक हुआ है। मैंने चालक से कार रोकने को कहा और मैं उतर गया।’’

वो लिखते हैं, ‘‘फिर भी, उनके लडखड़ाते शब्द किसी को भी स्तब्ध करने के लिए पर्याप्त थे। मुझे समझ आ गया कि प्रोविंशियल आर्म्ड कांस्टेबुलरी (पीएसी) के जवानों ने माकनपुर जाने वाले मार्ग की नहर वाली क्रासिंग के पास कुछ लोगों को मार डाला जिनके मुस्लिम होने की ज्यादा संभावना है।’’

“मेरे मन में सलाव उठे कि उन्हें क्यों मारा गया? कितने लोग मारे गए? उन्हें कहां से पकड़ा गया? काफी प्रयास के बाद सिंह ने मुझे घटना के बारे में बताया कि रात करीब 9 बजे जब वी.बी. सिंह और उनके साथी थाने में बैठे थे। उन्होंने माकनपुर के पास गोलियों की आवाज सुनी। उन्होंने सोचा कि गांव में कुछ डकैत हैं।’’

अपनी किताब में उन्होंने लिखा है, ‘‘सिंह ने उसी दिशा में अपनी मोटरसाइकिल दौड़ा दी और उनके साथ एक अन्य उपनिरीक्षक तथा एक कांस्टेबल थे। कुछ मीटर चलने के बाद उन्हें एक ट्रक दिखा जो तेजरफ्तार से उनकी तरफ आ रहा था। अगर सिंह ने मोटरसाइकिल सड़क से नीचे नहीं उतारी होती तो ट्रक ने उन्हें कुचल दिया होता। जब वह अपना वाहन नियंत्रित कर रहे थे, उन्होंने ट्रक के पीछे पीले रंग में ‘41’ लिखा हुआ देखा और खाकी वर्दी में कुछ लोग पीछे बैठे थे। पेशेवर पुलिसकर्मियों के लिए यह पता करना मुश्किल नहीं था कि वाहन पीएसी की 41वीं बटालियन का था।’’

पुलिसकर्मियों ने सोचा कि एक पीएसी ट्रक रात के समय इस सड़क पर क्यों था और क्या इसका संबंध गोलियों से था। इसके बाद पुलिसकर्मी माकनपुर पहुंचे। वे मुश्किल से एक किलोमीटर और आगे बढ़े होंगे तभी सिंह और उनके साथियों ने कुछ बहुत ही डरावना देखा। माकनपुर से ठीक पहले नहर के पास खून से लथपथ शव पड़े थे। उस समय तक भी शवों से खून बह रहा था।’’

विभूति नारायण राय ने लिखा है, ‘‘सिंह ने अपनी मोटरसाइकिल की हेडलाइट से देखा कि नहर के किनारे झाड़ियों में शव पड़े थे और कुछ पानी में भी बह रहे थे। उपनिरीक्षक और उनके साथियों को तेजरफ्तार पीएसी ट्रक और गोलियों तथा नहर में शवों के बीच संबंध को समझने में देर नहीं लगी।’’

लेकिन साल 2015 आते आते सारे के सारे आरोपी बरी कर दिए गए। अभियोजन पक्ष संदिग्ध पुलिसकर्मियों की पहचान साबित करने में नाकाम रहा। लेकिन इस मुकदमे ने अपने पीछे सबसे बड़ा सवाल छोड़ा की आखिर उन 42 मुसलमानों को किसने मारा? सवाल अब भी अनसुलझा है। साजिश किसने की इसका भी कोई पता नहीं। बस हर साल हाशिमपुरा नरसंहार की वर्षी मनाई जा रही और भारतीय लोकतंत्र को याद दिलाई जा रही है कि मुसलमानों को इंसाफ दिलाने में तू फिर हार गया।

  • हबीब-उर-रहमान

 

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