Wednesday , April 25 2018

‘जिस नफ़रत की सज़ा उस बच्ची को दी गई, वो शायद ही नफ़रत का मतलब समझती होगी’

क्या आपने कभी केसर का फूल देखा है? एक बार गूगल ज़रूर कीजिएगा। बिल्कुल वैसी ही दिखने वाली एक तस्वीर आजकल हर जगह फैली हुई है। गहरे जामुनी रंग के कुर्ते में शोख़ सा चेहरा, बड़ी बड़ी आंखों में मासूमियत तैरती मुझे केसर के फूलों की याद दिला रही थी, जम्मू कश्मीर में केसर की खेती होती है लेकिन इस साल केसर को नज़र लग गई।

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फूल, पेड़, जंगल, पहाड़ नदियां इनको कभी क़रीब से देखिएगा, सुनिएगा बहुत सुकून देते हैं, ऐसे ही जंगल के क़रीब रहती थी कठुआ की 8 साल की मासूम, वो जंगलों में बेधड़क घूमती थी उसकी मां कहती है कि वो हिरनी सी दौड़ा करती थी, क्योंकि उसकी इस जंगल से दोस्ती थी उसे शायद ही कभी जंगल के जानवरों से डर लगा होगा।

अम्मी-अब्बू की इस दुलारी ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा जिस खुले आसमान के नीचे घने जंगल ने उसे कभी नहीं डराया उसी जंगल में इंसान की शक्ल में हैवान नस्ल ने उसकी ज़ात को तार-तार कर दिया। इस मासूम से जुड़ी एक और तस्वीर नज़रों से गुज़री और ज़हन से गुज़रने वाले ख़ून को जज़्ब कर गई… जिसमें इस मासूम बच्ची की मां अपनी बेटी के उन कपड़ों को देख रही है जो वो अब कभी नहीं पहन पाएगी।

बेहद ग़रीब मां-बाप की इस लाडली को क़त्ल कर दिया गया यहां क़त्ल शब्द पता नहीं उस दरिंदगी को बयां कर पाएगा जो उस मासूम के साथ हुई थी, मेरे अल्फ़ाज़ उस दर्द को बयां करने की क़ाबलियत नहीं रखते जो आठ साल (पता नहीं इस उम्र को कैसे बयां करूं) की रूह ने झेले, क्या वाकई ये दुनिया ख़ुदा ने बनाई है? क्या वाकई वो उन ज़ालिमों की पकड़ करेगा? क्यों मेरा ईमान डगमगा गया?

कहते हैं मासूम बच्चों की हिफ़ाज़त में हमेशा फ़रिश्ते तैनात रहते हैं फिर क्यों उस जान को ऐसी ख़ौफनाक मौत मिली? रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस मां के कलेजे के टुकड़े को अगवा कर एक मन्दिर में रखा गया और उसके साथ गैंगरेप किया गया, जिस मां ने शायद ही कभी अपनी बेटी पर हाथ उठाया होगा उसकी बेटी को जानवरों की तरह पीटा गया, भूखी प्यारी मासूम जान को नशे की दवाइयां देकर हैवानों ने उसके ज़िस्म को नोचा, जिस नफ़रत की सज़ा उस बच्ची को दी गई वो शायद ही नफ़रत का मतलब समझती होगी?

कितना ख़तरनाक हो गया है इंसान जो अपनी अदावतों का शिकार बच्चों को बना रहा है, कभी सुना था कि बच्चे सब के सांझे होते हैं, दुश्मन भी बच्चों को बख्श देते हैं लेकिन कठुआ की घटना ने वो सारे भरम तोड़ दिए जो इनते पक्के थे कि जिनपर कहावतें गढ़ी जाती थी मिसालें दी जाती थीं, इस मासूम को जान से मारने की जो साज़िश रची गई वो भारत के इतिहास में तो पता नहीं पर कठुआ के इतिहास में ज़रूर उस ख़ौफ़ की कहानी के रूप में हमेशा ज़िन्दा रहेगी जिसका ज़िक्र कर मां अपनी बच्चियों को घर से बाहर निकलने पर ज़रूर हिदायत के रूप में सुनाएंगी।

मैं इस नन्हीं जान की मौत पर हो रही सियासत पर कुछ नहीं लिखूंगी क्योंकि इत्तेफ़ाक से इस बच्ची का मज़हब और मेरा मज़हब एक ही है और मेरे इसपर बोलने जो मैं बोलना चाहती हूं उसे छोड़कर बाक़ी सब मायने लगाए जाएंगे। काश की मैं यक़ीन दिला पाती कि ख़ुदा ना ख़ास्ता (ख़ुदा न करे) अगर ऐसा किसी और मज़हब की बच्ची के साथ भी हुआ होता तो मैं, मैं ही होती। प्यारी बेटी आसिफ़ा तुम्हारी रूह को सुकून मिले, हो सके तो हमें माफ़ करना, हम तुम्हें एक महफ़ूज़ वतन नहीं दे पाए, वाकई हम शर्मिंदा हैं।

(साभार- पत्रकार नाजमा खान)

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