हैदराबाद: इस्लाम के बारे में गलत धारणाओं को दूर करने के लिए ‘ओपन मस्जिद’ कार्यक्रम का आयोजन

हैदराबाद: इस्लाम के बारे में गलत धारणाओं को दूर करने के लिए ‘ओपन मस्जिद’ कार्यक्रम का आयोजन

हैदराबाद। ईद के एक दिन बाद शहर स्थित एक मस्जिद ने गैर-मुस्लिम समुदाय के लोगों के लिए ओपन मस्जिद नामक कार्यक्रम की कुबा मस्जिद ने मेजबानी की। मेहदीपटनम के नानाल नगर में स्थित मस्जिद-ए-कुबा में इस कार्यक्रम के माध्यम से इस्लाम की शिक्षाओं के बारे में गलत धारणाओं को दूर करने के प्रयास में यह गैर मुस्लिमों के लिए रखा गया।

मस्जिद को सभी धर्मों के लोगों के लिए संवाद में भाग लेने के लिए खुला रखा गया और नमाज, अज़ान, वजू समेत मुस्लिम समुदाय की कुछ अन्य दिनचर्या की व्याख्या की गई।

आगंतुक मेहदीपटनम के नानाल नगर में स्थित मस्जिद-ए-कुबा में आयोजित अपनी तरह के ओपन मस्जिद कार्यक्रम के पहले इस्लाम के मूल सिद्धांतों से सम्बद्ध पोस्टरों को देखते हैं। ओपन मस्जिद कार्यक्रम के दौरान आने वाले लोगों को पवित्र कुरान की प्रतियां दी गईं।

ईसाई, सिख, हिंदुओं सहित विभिन्न समुदायों के लोगों की बड़ी संख्या में सत्र में भाग लिया जहां प्रतिभागियों को अज़ान का अर्थ, कैसे मुसलमान नमाज अदा करते हैं और अधिकांश मस्जिदों के वास्तुकला में मीनार क्यों हैं, आदि के सम्बन्ध में बताया गया।

 

इस तरह के कार्यक्रम की मेजबानी करने के लिए देश में पहली मस्जिद के अलावा, मस्जिद-ए-कुबा अपने वास्तुकला और निर्माण में विशिष्ट है। सैयद अख्तर द्वारा निर्मित 850 वर्ग गज वाली मस्जिद और आर्किटेक्ट्स नसीर अज़ीज़ और जहीर अहमद द्वारा डिजाइन किया गया मिस्र-अरब वास्तुकला का एक उदाहरण है।

 

इसमें एक गुंबद शीर्ष और मीनार है जो मस्जिद के तीन मंजिलों तक है। मस्जिद एक समय में 1200 लोगों को समायोजित कर सकती है। इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों को समझाते हुए मुद्रित चार्ट मस्जिद की पहली मंजिल पर पढ़ने और व्याख्या करने के लिए रखे गए थे, जबकि डेट्स और शीर कुर्मा को आगंतुकों को परोसा गया था।

ओपन मस्जिद का विचार मोहम्मद मुस्तफा का है, जिन्होंने हाल ही में इस्लाम कुबूल किया और जो इस तरह के कार्यक्रमों पर विश्वास करते हैं। पैगंबर मोहम्मद (सल्ल.) के समय में मस्जिदें निकाह, विदेशी प्रतिनिधियों के साथ बैठकें और यहां तक ​​कि मदरसे के रूप में शिक्षा केंद्र के लिए एकमात्र स्थान था।

विद्वानों ने कहा, ‘उन दिनों में व्यवस्था जहां मस्जिद प्रार्थना के केंद्र थे, शिक्षा और संवाद अमूल्य था। इसे पुनर्जीवित करने की जरूरत है’। इस अवसर पर सैयद अनीसुद्दीन, इंटैक्ट एनजीओ की डॉ अनुराधा, मुस्लिम आलिम और कई इस्लामी विद्वान भी उपस्थित थे।

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