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महिला किसान को अगर मिले बराबरी का दर्जा तो बदल सकती खेती बारी की सूरत: अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति

15 अक्टूबर का दिन अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति भारत के उन तमाम अदृश्य महिला किसानों को सलाम करता है, जो देश की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देते आये हैं। एक प्रकार से महिला किसान भारत की कृषि व्यवस्था की रीढ़ हैं। देश में आज भयावह रूप ले चुके खेती-किसानी के संकट से ग्रामीण महिलाएं सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने आज प्रेस को बताया कि “ग्रामीण महिला किसानों में वह शक्ति और सामर्थ्य है जो अपनी दृष्टि, ज्ञान और दृढ़ता से हमारे समय के कृषि संकट को दूर कर सकती है। अगर महिला किसानों को उनके अधिकार दिए जाते हैं, और बाकी किसानों के बराबर खड़ा होने का अवसर दिया जाता है तो वे आर्थिक स्वाबलंबन हासिल करने के साथ साथ समाज को भी आगे ले जा सकेंगी।”

अधिसंख्य महिलाएं सरकार के आर्थिक आंकड़ों में जिनकी गिनती श्रमिकों के रूप में होती है, कृषि पर निर्भर हैं। सर्वेक्षणों और अध्ययनों से प्राप्त आंकड़ों से भी स्पष्ट है कि विभिन्न फसलों की प्रति एकड़ खेती में महिलाओं का श्रम पुरुषों की तुलना में अधिक होता है। खेतों में बुआई से लेकर उपज तैयार करने तक महिलाएं अधिक काम करती हैं। यह बात बिलकुल तय है की भारत के गाँव को बचाने के लिए खेती को बचाना आवश्यक है, और खेती बचाने के लिए महिलाओं को साधन संपन्न बनाना भी उतना ही आवश्यक है। सरकारी नियमों के हिसाब से अभी किसान केवल वे ही माने जाते हैं, जिनके नाम से जमीन होती है, ऐसे में कितनी ही महिलाएं किसान के रूप में पहचाने जाने से वंचित हो जाती हैं। आंकड़ें तो यह भी बताते हैं की अगर महिला किसानों को कृषि कार्य में समान अधिकार हासिल हो जाता है तो उत्पादन में 40% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। देश भर के 180 किसान संगठनों के साथ आने से बना अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) कृषि क्षेत्र में महिलाओं को निम्न दर्ज़े दिए जाने की सरकारी नीति की घोर निंदा करता है। आज अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस के मौके पर सरकार को चाहिए कि वह महिला किसानों के भूमि अधिकारों को सुरक्षित बनाने के प्रयास करे। AIKSCC की स्पष्ट मान्यता है की कृषि उद्यम में महिलाओं की भागीदारी होने के बावजूद उसे समाज और राज्य से उतना सम्मान नहीं मिलता, जिसकी वे हक़दार हैं। हर दृष्टि से वे उपेक्षा की शिकार हैं। चूँकि सरकार महिला किसानों को किसान नहीं मानती इसलिए उन्हें कृषि ऋण, समर्थन मूल्य, सब्सिडी, फसल बीमा और आपदा क्षतिपूर्ति का लाभ नहीं मिल पाता है। इसलिए जब AIKSCC किसानों के लिए दो मांगों “ऋण मुक्ति” और “फ़सल के पुरे दाम” की बात करता है तो महिला किसान भी उसके दायरे के भीतर हैं। जब किसान कर्ज़े के बोझ से तंग आकर आत्महत्या करता है, तब महिला ही खेत और अपने परिवार की देखरेख करती है। अधिकांश मामलों में देखा गया है की किसान की आत्महत्या के बाद भी, लेनदार क़र्ज़ उगाही के लिए विधवा महिला किसानों पर दबाव डालना जारी रखता है।

हाल ही में महाराष्ट्र की ऋण माफ़ी में देखा गया की किसानों की संख्या को कम करने के लिए सरकर ने किसान को इकाई न मानते हुए परिवार को इकाई माना, जिससे अनगिनत महिला किसान स्वतः ऋण माफ़ी के दायरे से बाहर आ गयीं।

AIKSCC यह पहले ही घोषणा कर चुका है की संसद मार्ग पर आगामी 20 नवम्बर से शुरू हो रहे किसान मुक्ति संसद में नेतृत्व की कमान महिला किसानों के हाथ में होगा। ऋण मुक्ति और डेढ़ गुना समर्थन मूल्य का बिल पारित कर संसद को भेजा जायेगा। AIKSCC को इस बात का फक्र है की उसके साथ महिला किसान अधिकार मोर्चा जैसे कई ऐसे किसान संगठन हैं, जो महिलाओं द्वारा संचालित है और जिनका 20 राज्यों में प्रभावी असर है।

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