देश के मुसलमान मेरे साथ, कट्टर लोग अकेले पड़ जाएंगे- मौलाना

देश के मुसलमान मेरे साथ, कट्टर लोग अकेले पड़ जाएंगे- मौलाना
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राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में सुलह के पैरोकारों में लखनऊ के मौलाना सलमान नदवी भी शामिल हैं। श्रीश्री रविशंकर के साथ वह भी सुलह की कोशिशों में जुटे हैं। इससे खफा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उन्हें बोर्ड से निष्कासित कर दिया है। हालांकि मौलाना का दावा है कि उन्होंने खुद ही बोर्ड से रिश्ता खत्म कर लिया है। निष्कासन के बाद उन्होंने सबसे पहले ‘हिन्दुस्तान’ लखनऊ के कार्यकारी संपादक के के उपाध्याय से बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के अंश:

पर्सनल लॉ बोर्ड से अपने निष्कासन पर आप क्या कहेंगे?
एक दिन पहले (शनिवार को) ही मैंने एलान कर दिया था कि मैं उनके (मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड नेतृत्व के) साथ नहीं रह सकता। इस पर बोर्ड नेतृत्व ने मुझे निकालने का फैसला रविवार को सुनाया। मैं तो शुक्रवार को हैदराबाद में शुरू हुई बोर्ड कार्यकारिणी की पहली मीटिंग के बाद ही अलग हो गया था।

तो क्या रविवार को बोर्ड नेतृत्व ने बस आपके निष्कासन की घोषणा भर की थी?
रविवार को उन्होंने (बोर्ड नेतृत्व ने) एलान भले ही किया, मगर मैं तो शुक्रवार को पहली मीटिंग के बाद ही अलग हो गया था।

आपकी बेंगलुरु में श्रीश्री रविशंकर से क्या बात हुई है?
श्रीश्री से मेरी यह बात हुई कि अगर हम लोग आपस में बात करें और अदालत से बाहर फैसला करें, तो इसमें तीन बातें शामिल होंगी। पहली- जिन्होंने मस्जिद तोड़ी, उन्हें सजा मिलनी चाहिए। इस पर वह राजी हुए। दूसरी बात मैंने यह रखी कि अयोध्या के विवादित स्थल की 70 बीघा जमीन के बदले हम दोगुनी यानी 140 बीघा जमीन लेंगे, जिस पर एक मस्जिद और एक यूनिवर्सिटी बनाएंगे। तीसरी बात यह कि फिर किसी मस्जिद, किसी दरगाह, किसी कब्रिस्तान या मदरसे के साथ छेड़छाड़ नहीं होगी। इन तीनों बातों से उन्होंने सौ फीसद इत्तेफाक किया। जब इस पर इत्तेफाक हुआ, तब मैंने कहा कि चलिए, अब हम आगे बढ़ते हैं।

श्रीश्री के अलावा क्या कोई और भी आपके संपर्क में है, जिसके साथ सुलह के मुतल्लिक बात चल रही हो?    
नहीं। श्रीश्री रविशंकर साहब का यह कहना था कि हिंदू महासभा और निर्मोही अखाड़े के लोग उनके संपर्क में हैं। वह उन सबको मिलाएंगे। तभी मैंने बेंगलुरु में गुरुवार को श्रीश्री से बातचीत के बाद तय किया कि अब हम लोग अयोध्या में मीटिंग करेंगे। मैंने यह कहा कि अयोध्या में जितने साधु-संत हैं, सबको जमा करना होगा। मैं आलिमों को लेकर जाऊंगा। वहां हम लोग बातचीत करेंगे।

क्या यह मीटिंग 20 फरवरी को होनी है?
मालूम नहीं कि उन्होंने फाइनल किया या नहीं। वैसे मैंने 20 फरवरी की तारीख ही दी थी। मैंने उनसे कहा था कि जल्द मीटिंग करें, ताकि होली से पहले कुछ अच्छी बातें सामने आ सकें।

क्या किसी नेता ने इस मसले पर आपसे बात की है?
नहीं, किसी सियासी शख्सियत से मेरी कोई बात नहीं हुई।

इस्लामी सिद्धांत के मुताबिक इस मसले का आखिर क्या हल हो सकता है?
देखिए, इस्लाम सलामती चाहता है। इस्लाम अमन चाहता है। हिन्दुस्तान में भी अमन की फिजां होनी चाहिए। हमारे यहां चार मसलक हैं। उनमें से एक मसलक हम्बली मसलक है। वह शरीअत के तहत ही है, जिसमें यह इजाजत दी गई है कि मस्जिद को शिफ्ट किया जा सकता है। अब एक ऐसा झगड़ा, जिसमें बहुत खून बह चुका हो और 25 साल गुजर चुके हों, कब तक चलेगा? क्या आइंदा फिर 25 साल गुजरेंगे? क्या होगा, पता नहीं। अगर आपस में मिल-बैठकर शरीअत का यह मसला हम लोग ले लें कि मस्जिद शिफ्ट हो सकती है। हम मस्जिद हटा नहीं रहे, बल्कि दूसरी जगह ले जा रहे हैं, जहां इबादत की जाए। मस्जिद तो इबादत के लिए होती है। मस्जिद झगड़े के लिए थोड़े ही होती है। मेरा यही कहना है कि झगड़ों से बचने के लिए, भाईचारे के लिए हम उस मसलक को ले लें।

सऊदी अरब में विकास के कामों के लिए मस्जिदें स्थानांतरित होती हैं। इस्लाम अरब में जन्मा है, वहां किस इस्लामी सिद्धांत के मुताबिक ऐसा किया जाता है?
अब वो मसलक भी सही है। शरीअत का हिस्सा है। मेरा यही तो कहना है कि झगड़ों से बचने के लिए, भाईचारे के लिए हम उस मसलक को ले लें।

भारत में इस सिद्धांत को अमली जामा पहनाने की राह में किस तरह की दिक्कतें आती हैं?
कोई ऐसी दिक्कत नहीं है। बस मुद्दा ऐसा बना दिया गया। सियासी शक्ल दे दी गई। चूंकि झगड़ा बहुत पुराना है। 1992 में मस्जिद गिराई गई। 25 साल गुजर गए उसको। कितने हजार लोग उस वक्त मारे गए। अब मेरा यह कहना है कि जो हजारों लोग मारे गए, उनका मुकदमा क्यों नहीं लड़ रहे हैं आप? आखिर इंसान की जान की कोई कीमत नहीं है क्या? सिर्फ ईंट की कीमत है। इसलिए मेरा यह कहना था कि संजीदगी से इस पर गौर कीजिए। मैंने वहां (हैदराबाद में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में) देखा कि माहौल हंगामे का था। मुझे ठीक से बोलने भी नहीं दिया गया। जब मेरी बात ही नहीं सुनी गई, तो मैंने उसी वक्त कह दिया था कि मैं आपके साथ नहीं हूं।

आम भारतीय मुसलमान इस मसले पर क्या सोच रहा है?
मैं दावे के साथ कहता हूं कि भारतीय मुसलमानों की अक्सरीयत (बहुमत) मेरे साथ है। सैकड़ों-हजारों फोन मेरे पास आ रहे हैं कि मौलाना, हम लोग आपके साथ हैं। तंजीमों (संगठनों) के फोन भी आ रहे हैं, अफराद (निजी) भी आ रहे हैं। अभी जब माहौल ठंडा होगा, तो देखेंगे कि मुल्क की अक्सरीयत किसके साथ होगी? लोग तंग आ चुके हैं, और झगड़ा नहीं चाहते। वे भाईचारा चाहते हैं।

पर्सनल लॉ बोर्ड में ‘हार्डलाइनर्स’ का दबदबा हो गया है?
कुछ ऐसा ही हो गया है। आप जानते हैं कि बोर्ड अब ओवैसी साहब (सांसद असदुद्दीन ओवैसी) की गोद में चला गया है। उसके बाद आजम खां दनदना रहे हैं। उधर कासिम रसूल इलियास साहब, कमाल फारुकी जैसे लोग यही सब बातें कर रहे हैं। कमाल फारुकी हैदराबाद में बोर्ड की मीटिंग में क्या बोले? उनका लहजा, उनके अल्फाज शायद रिकॉर्ड भी हुए होंगे।.. मस्जिद वहीं बनाएंगे, चाहे जानें चली जाएं। यह कौन सी बात हुई भाई? आपके नजदीक इंसान की जान इतनी हल्की चीज है? स्ट्रक्चर है, उसको कहीं शिफ्ट करके नमाज पढ़िए। नमाज पढ़ने की फिक्र नहीं है आपको, सिर्फ मस्जिद के झगड़े की फिक्र है। मैं कुरान को मानता हूं। हदीस को मानता हूं। पर्सनल लॉ बोर्ड की तजवीजों को नहीं मानता हूं। मैं उस पर ईमान नहीं लाया हूं।

बोर्ड लीडरशिप को क्या अपने रवैये पर भी गौर नहीं करना चाहिए, उस पर ‘हार्डलाइनर’ हावी हो रहे हैं?
हैदराबाद में हुई बोर्ड की मीटिंग में तो काफी गरमा-गरम फिजा थी और ‘हार्डलाइनर’ वाला रुख ही था।

अब जब बोर्ड से आपको बर्खास्त कर दिया गया है, क्या अब भी आपकी सुलह की कोशिशें जारी रहेंगी?
अरे, इसी वजह से तो मैंने अलगाव खुद चुना है। वे आज बोल रहे हैं। मैंने तो बीते शुक्रवार को बोर्ड की पहली मीटिंग में ही कह दिया था कि मेरा रास्ता अलग, आपका रास्ता अलग। अब मैं हिंदुओं से मिलूंगा, सबसे मिलूंगा। बातचीत से मसला हल होगा।

देश का हित किसमें है, सुलह में या अदालती फैसले में?
यकीनन आपसी सुलह में।

मीर बाकी के वारिस, बाबरी मस्जिद के पक्षकार और आप जैसे लोग सुलह के पक्ष में आ चुके हैं, तो क्या ‘हार्डलाइनर’ अब अलग-थलग पड़ रहे हैं?
ऐसा जरूर होगा। अभी तो नहीं, पर आगे यही होना है।

आपसी सुलह की कवायद में आपके साथ इस वक्त और कौन-कौन से लोग हैं?
आप देखते जाइए। अक्सरीयत मेरे साथ है और सिर्फ एक साल के अंदर मेरी यह बात सबके सामने आ जाएगी।

कानून इसे जमीन का मामला मानता है। हिंदू आस्था का। मुसलमानों के लिए यह कैसा मामला है?
शरीअत में गुंजाइश है कि स्ट्रक्चर को कहीं शिफ्ट किया जा सकता है। मस्जिद थी, वह दूसरी जगह बनाई जा सकती है। अब जब यह बात मौजूद है और इसका फायदा उठा सकते हैं, तो झगड़ा खत्म होना चाहिए। सबसे अहम चीज है कि झगड़ा खत्म होना चाहिए। अमन का माहौल हो, भाईचारे का माहौल हो, क्या यह अच्छी बात नहीं है?

आने वाले दिनों में क्या आप श्रीश्री के साथ इस केस के सभी पक्षकारों को बैठाकर बात कराने की कोशिश करेंगे?

अयोध्या में मीटिंग होगी। वहां हमारे आलिम भी होंगे, साधु-संत भी होंगे। जहां तक पर्सनल लॉ बोर्ड की बात है, तो क्या उस बोर्ड में इलियास आलिम हैं? कमाल फारुकी आलिम हैं? अरे आलिम तो बेचारे खामोश हैं। हैदराबाद में बोर्ड की मीटिंग में ही अरशद साहब (अरशद मदनी) पूरी बैठक में खामोश बैठे रहे। मौलाना राबे साहब (बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना राबे हसनी नदवी) खामोश बैठे रहे। कल्बे सादिक साहब गए ही नहीं। अब ऐसे नरम बुजुर्ग शख्सियतों को घेर लिया गरम लोगों ने। वे अपने दिल की बात नहीं कह सके। बोर्ड में जितने भी बुजुर्ग थे, उन्होंने मेरी मुखालफत नहीं की। मौलाना राबे साहब का दिल-दिमाग मेरे साथ था। ये अलग बात है कि उन्हें तंजीम के हिसाब से फैसला करना पड़ रहा है।

कहा जा रहा है कि आप पर सरकार का कोई दबाव है?
हरगिज नहीं, हरगिज नहीं। मैं तो जब से मोदी जी आए हैं, उनसे मिलना चाहता हूं। मगर अब तक उनसे मुलाकात नहीं हो सकी है।

मुख्यमंत्री योगी या संघ के लोगों से आपकी कोई बातचीत?
नहीं हो सकी। मैं तो चाहता हूं कि साफ दिल से बात सबसे हो। योगीजी से भी चाहता हूं, मोदीजी से भी चाहता हूं, और भागवतजी से भी चाहता हूं। मेरा यह कहना है कि मुल्क में मोहब्बत हो, इंसाफ और भाईचारा हो।

अल्लामा इकबाल ने भगवान राम को ‘इमाम-ए-हिंद’ कहा था। आम मुसलमान राम के बारे में क्या धारणा रखता है?
देखिए, राम एक मुअज्जिज शख्सियत थे। एक बड़ी बुजुर्ग शख्सियत के मालिक थे। बाज लोगों का ख्याल है कि वह यहां के पैगंबर रहे होंगे। इसलिए कि करोड़ों इंसानों के दिल में अगर किसी के लिए मोहब्बत, अकीदत हो, तो यकीनन वह बड़ा आदमी होता है। इसलिए मैं श्रीराम को बड़ा आदमी समझता हूं। इसलिए मैंने अयोध्या के लोगों से कहा कि श्रीराम के नाम पर मंदिर बनाओ।

साभार- लाइव हिंदुस्तान

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