Tuesday , September 18 2018

इस्लाम, मुस्लमान और कर्ज़

कानपुर के ‘पान पराग’ और रोटोमेक पेन के मालिक ‘विक्रम कोठारी’ के भी यूनियन बैंक आफ इंडिया का ₹500 करोड़ लेकर भाग जाने की खबर है। जब देश का प्रधानमंत्री खुद को प्रशासक की जगह ‘व्यापारी’ समझने लगे तो उनके व्यापारी तो देश को लूटेंगे ही।

मैं बार बार कहता हूं और फिर कह रहा हूं कि 5 साल में मोदी सरकार भाजपा और संघ के मुसलमानों पर लगाए सभी आरोप अपनी करनी से खुद झुठला देगी।

मुग़लों और मुसलमानों पर मंदिर ढहाने का आरोप “बाबरी मस्जिद ढहा कर तब झुठला दिया जब इसके 25 साल बाद भी मुसलमानों ने किसी भी एक मंदिर की एक ईंट भी नहीं उखाड़ी।

दंगों को मुसलमानों द्वारा शुरु करने का आरोप भी झूठा साबित हो गया और मुज़फ्फरनगर, कासगंज तथा 36 मुसलमानों के गोआतंकियों के द्वारा मारे जाने पर भी मुसलमान संयमित रहा एक ढेला भी किसी के ऊपर नहीं फेका।

और अब मुग़लों के द्वारा भारत के लूटने का आरोप भी इनके द्वारा झुठलाया जा रहा है , देश को 70 साल से लूटा जा रहा है, और लूट कर विदेशों में जमा किया जा रहा है।

मुग़ल तो यहाँ आए और यहीं राज किए और यहीं मर कर दफन हो गये, देश का एक ढेला भी बाहर नहीं ले गये परन्तु पिछले 70 साल से देश को लूट कर बाहर ले जाने का सिलसिला जो जारी है उसमें कोई मुसलमान शामिल नहीं है।

आपको बता कि मोदी गिरोह इसका ताजा उदाहरण है और विक्रम कोठारी उस उदाहरण का एक छोटा सा और मिशाल। माल्या, और ना जाने कितने हिन्दूजा, हर्षद, मेहताओं के देश लूटने का इतिहास नहीं बल्कि वर्तमान है जिसे देखने के लिए किसी संघी या वामपंथी इतिहासकार के आँख की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

सोचिएगा कि ऐसा क्युं है कि किसी मुसलमान का नाम इस देश के कर्ज लेकर भागने और घोटाले वालों में शामिल नहीं।

आइये उत्तर यहाँ है-

दरअसल, इस्लाम में कर्ज़ और ब्याज को लेकर बहुत सख्त आदेश है इसीलिए जिस मुसलमान के पास थोड़ा सा भी ईमान है वह अपना हिसाब किताब बहुत साफ रखता है।

जिसको लौटाना है वह उसको लौटा देता ही है और यदि नहीं दिया तो इस्लाम में कब्र से लेकर आखिरत तक तमाम सजाएं तय करके बता दी गयीं हैं। इमान ना रखने वाले पर कोई नियम लागू नहीं होता, कोई उर्दू नाम वाला सलमान रश्दी भी हो सकता है, तसलीमा नसरीन भी हो सकती हैं तो तारेक फतेह भी हो सकता है।

मैं आम ईमान वाले मुसलमानों की बात कर रहा हूं जो किसी के अपने पास रखे पैसे को उसकी “अमानत” समझता है और किसी से भी लिए कर्ज़ को जल्दी से जल्दी अदा करने की कोशिश करता है।

इस्लाम में किसी भी मुसलमान के ऊपर हज भी तभी फर्ज़ है जबकि उस पर कोई कर्ज़ ना हो, यदि कर्ज़ है तो उसके लिए हज से ज़रूरी है कि उस पैसे से वह अपने कर्ज को चुका दे।

कुरान में कर्ज़ ना चूकाने की बहुत बड़ी सज़ा बताई गयी है और आखिरत ( रोज ए मेहसर) में ऐसे लोगों के कुल “पुण्य” में से उसी अनुपात में पुण्य उस व्यक्ति को दे दिए जाने की बात कही गयी है जिसका कर्ज उसने नहीं चुकाया , इसी डर से मुसलमान किसी से लिया कर्ज़ जल्दी से जल्दी चुकाने का प्रयास करता है , और यदि अपने मृत्यु तक यदि वह नहीं कर पाया तो उसकी औलादें किसी भी तरह उसके कर्ज़ की भरपाई उसके कब्र में जाने से पहले ही कर ही देती हैं या फिर कर्ज़ देने वाला उस कर्ज़ को माफ कर देता है।

इस्लाम में कर्ज़ से मुक्त करने की दुआएं भी हैं।

اللَّهُمَّ اكْفِنِي بِحَلَالِكَ عَنْ حَرَامِكَ، ‏‏‏‏‏‏وَأَغْنِنِي بِفَضْلِكَ عَمَّنْ سِوَاكَ

“ऐ मेरे परवरदिगार! मैं तुझसे पनाह मांगता हूं क़र्ज़ के फ़िक्र व अन्देशे से और उसके झमेलों से और उसके बाएस बेख़्वाबी से तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे इससे पनाह दे। परवरदिगार! मैं तुझसे ज़िन्दगी में उसकी ज़िल्लत और मरने के बाद उसके वबाल से पनाह मांगता हूँ। तू मोहम्मद (स0) और उनकी आल (अ0) पर रहमत नाज़िल फ़रमा और मुझे माल व दौलत की फ़रावानी और पैहम रिज़्क़ रसानी के ज़रिये इससे छुटकारा दे”

यहाँ तक कि मुसलमानों के हर साल अपने माल के चालिसवें हिस्से का प्रयोग “ज़कात” के रूप में किसी मजबूर के कर्ज़ को चुकाने में खर्च करने को कहा गया है।

ध्यान दीजिए की इस्लाम में कर्ज़ का अदा न करना गुनाहे कबीरा है। कर्ज की अदाएगी में टालमटोल करना और उसे चुकाने में बहानेबाजी करना दुनिया और आखिरत दोनों के ही ऐतबार से बेहद हानिकारक है कि दुनिया में बेईज़्ज़ती और आखिरत में खुदा के गुस्से का शिकार होगा। हदीस की रोशनी में इस काम को बड़े और “कबीरा गुनाह” में शुमार किया गया है और यहाँ तक है कि अगर किसी के सर पर कर्ज का बोझ हो और वह इस हालत में वह शहीद हो जाए और अल्लाह के रास्ते में अपनी जान कुर्बान कर दे तब भी कर्ज के अदा न करने का गुनाह उसके सर बाकी रहेगा।

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