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क्या जेटली के बजट में किसानों और आम आदमी से बोला गया सफेद झूठ?

नई दिल्ली: जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय मंच ने मोदी सरकार के अंतिम पूर्ण बजट की समीक्षा कर प्रतिक्रिया व्यक्त की है. मंच ने कहा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट 2018 के भाषण ने इस तथ्य को बरकरार रखा कि सरकार का ध्यान किसान, ग्रामीण गरीब, सीमांत समुदायों और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति पर है, हालाँकि सभी घोषणाएं और बजट आवंटन सरकार के इरादों के विपरीत बोलते ही दीखते हैं. गांधी के 150 वर्षों के उत्सव की घोषणा का स्वागत है लेकिन गांधीवादी अर्थशास्त्र की पूर्ति, एक आत्मनिर्भर गांव की अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज किया गया है और साथ ही स्थानीयकरण और स्वदेशी की विचारधारा को भी.

इस बार का बजट ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पैदा करने की बात की उपेक्षा करता है, जैसे कि नरेगा का कोई उल्लेख ना होना या हैंडलूम क्षेत्र में 50% कटौती होना. सारा ध्यान बड़े व्यवसायों और मानव श्रम की लागत पर गांवों को निजी निगमों के प्रवेश करने पर दिया गया है. तेजी से हो रहे शहरीकरण के बावजूद, गाँव और कृषि, भारत की आत्मा रहे हैं जहां 50% से अधिक आबादी रहती है और रोज़गार पर निर्भर है. हमारे देश का यह भाग #डिजिटल अर्थव्यवस्था या डिजिटल प्रशासन पर बना नहीं रह सकता, इस देश के गरीबों को अधिक ठोस चीजों की जरूरत है, ना ही आभासी और कृत्रिम बुद्धि.

सरकार द्वारा विनिवेश के लक्ष्य का उत्सव यह दिखाता है कि वे सभी लाभकारी सार्वजनिक उद्यमों को निजी क्षेत्र के उद्यमों को बेचने में खुश हैं और यह पूरी तरह गाँधी और नेहरु की समाजवादी अर्थव्यवस्था की विचारधारा के विपरीत है.

फसल के दामों पर झूठ बोलते हुए, अरुण जेटली कृषि संकट को नहीं कर पाए संबोधित
मोदी सरकार के कृषि उत्पाद के लिए उचित मूल्य का वादा, जो 1: 1.5 के लागत-मूल्य अनुपात पर आधारित था, एक विश्वासघात साबित हुआ है. इसी लक्ष्य को पाने के लिए, आज के बजट से उम्मीद थी की कुछ ठोस कदम लिए जायेंगे, जैसे की 2017-18 की बराबरी में मूल्य स्थिरता निधि 2018-19 में बढ़त होना. आत्महत्याओं का कोई जिक्र नहीं है, ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का दर और कारण को हमारी खाद्य गारंटी से जोड़ना, असंवेदनशीलता व्यक्त करता हैं. ऐसे सरकारी वादों से अधिक विश्वासघात होता है जिनमे कहा गया की लागत-मूल्य अनुपात पिछले घोषणापत्र के मुताबिक होगा और यह मानदंड के लिए तंत्र तैयार किया जाएगा, जो कि 2020 तक भी नीती आयोग के साथ किया जाएगा. भवन्तर योजना और की प्रति एकड़ अनुदान योजना का तो कोई उल्लेख ही नहीं है, जाहिर है क्योंकि सभी विरोधाभास, गैर-अनुपालन और एमएसपी का काम करने के गलत मानदंड के संदर्भ में बात करने से बचा जा रहा है!

सबसे बड़ा झूठ जो मंत्री जी ने संसद की मंजिल पर कहा, वो यह तथ्य था कि सरकार ने एमएसपी का लक्ष्य हासिल किया है जो कि रबी फसलों में लगने वाली लागत की तुलना में 50% अधिक है और अब इसे खरीफ तक बढ़ाया जाएगा. वास्तविकता यह है कि किसानों की कुल आय कम या नकारात्मक हुआ करती थी, जब एमएसपी बहुत कम था ,की कई मामलों में वे नकारात्मक रिटर्न देते हैं. वास्तव में, सत्ता में होने के अपने पहले वर्ष में, केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को अपने स्वयं के किसानों के लिए एमएसपी में अतिरिक्त बोनस देने से भी निषिद्ध किया था. पिछले चार वर्षों की औसत रिटर्न 7 खरीफ फसलों और रबी फसलों के मामले में नकारात्मक है, गेहूं को छोड़कर, जहां बेहतर मूल्य देखा गया था, लेकिन 50% के करीब नहीं. जब सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य से 1.5 गुना मूल्य देने के दावे कर रही है तब इसके लिए कोई बजट में आवंटन नहीं दिखाई देता है और ना ही इसका जिक्र.

ऋण मांफी जो की देश भर के सभी किसान संगठनो की सबसे बड़ी मांग रही है जिसमे कोई राहत नहीं मिली है. आज प्रस्तुत बजट में एक गंभीर झूठ बोला गया है. सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, श्री जेटली ने झूठा दावा किया है कि भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और दूसरा, उन्होंने ऑपरेशन ग्रीन मिशन होने का दावा किया है, केवल समर्थक किसान होने का एक आकर्षक प्रदर्शन करने के लिए.

यह एक बजट है जो कि कृषि उत्पादन में जैविक खेती और विकास का उल्लेखनीय उल्लेख कर रहा है, जबकि वास्तव में यह केंद्र सरकार और सभी 19 राज्य सरकारें जीएम खाद्य पदार्थों के लिए हैं. उत्पादन में वृद्धि एफएम या पीएम की उपलब्धि नहीं है और जो सवाल अनुत्तरित हो जाता है वो यह है की कुछ वर्षों में उत्पादन के बावजूद आत्महत्याएं बढ़कर 1.5 गुना क्यों हो गई हैं. संक्षेप में, किसानों की लूट जारी है और एफएम के वक्तव्य में कोई ‘दंड खंड’ नहीं है, जो कि घोषित एमएसपी (कम से कम 2 लाख करोड़ रुपये) पर किसानों के साथ धोखाधड़ी का संकेत देते हैं, एक तरफ, गोदामों में सुधार का वादा है, पूरा ध्यान आयात-निर्यात उन्मुखीकरण और पदोन्नति पर केंद्रित है, जो कि आम भारतीय किसानों को कभी लाभान्वित नहीं हुआ है, खासकर छोटे और सीमांत, जो अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना नहीं कर सकते हैं.

दूसरी तरफ ग्रामीण हाटों को बड़े बाजारों में बदलने पर एक स्पष्ट ध्यान दिया गया है. ई-आधारित समाधान जो हमेशा बड़े खिलाड़ियों, कॉर्पोरेट के प्रवेश की सुविधा के लिए होते हैं, जो वर्तमान मंडियों में ‘Adatye’ से भी बदतर हो सकता है.

सिंचाई
96 जिलों में सिंचाई के लिए धन घोषित किया गया है, लेकिन विभिन्न प्रौद्योगिकियों के बीच के विकल्प के बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया है. बड़ी नदियों को अंतर नदियों के बेसिन दृष्टिकोण के साथ जल विकास करने की बात कही गयी. तब सरकार आईएलआर के एक हिस्से के रूप में नदियों को जोड़ने के साथ-साथ बांध परियोजनाओं में स्वतंत्र रूप से पूंजी निवेश कर सकती है, जिसे जग्गी वासुदेव, सद्गुरु जैसे कॉर्पोरेट्स के प्रशंसकों द्वारा प्रोत्साहित किया गया.

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम (NREGA) का 2018-19 के बजट में सही मायनों में उल्लेख नहीं –
2018 के बजट भाषण में भी NREGA का उल्लेख ना होना एन डी ए सरकार की NAREGA को लेकर लगातार चल रही उदासीनता को दर्शाता है. वित्त मंत्री के भाषण में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण का उल्लेख हुआ लेकिन गरीबी, कुपोषण और खाद्य सुरक्षा को कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया जो की देश में बहुत बड़ी समस्या है. NREGA का 2018-19 का बजट 55000 करोड़ है जो कि इस साल के बजट के जितना ही है (2017-18 का शुरूआती बजट 48000 था जिसमें जनवरी में 7000 करोड़ का अतिरिक्त बजट जोड़ दिया गया था.)

प्रत्येक वर्ष बकाया/लंबित ऋणों की आपूर्ति साल के अंत में पुराने साल के बजट से की जाती है, तो 2017–18 के बजट का एक हिस्सा पुराने साल के ऋणों की आपूर्ति करने में उपयोग किया जायेगा. NREGA का 2017-18 का बजट भी अधिनियम के प्रावधान के तहत NREGA के कार्यों के कार्यान्वयन के लिए पूरी तरह से पर्याप्त नहीं था. NREGA और अन्य ग्रामीण विकास कार्यक्रमों के लिए यह अपर्याप्त बजट, रोजगार गारंटी अधिनियम और लोगों के सरकार से अपने काम की मांग करने के अधिकार को छीनता है.

स्वास्थ्य
आम चुनाव से पहले घोषणाओं का चलन इस बार के बजट भाषण में भी साफ़ दिख रहा है. आखिरी वर्ष राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के लिए 1000 करोड़ का आवंटन किया था जिसको इस बार के आवंटन से हटा दिया गया है. लेकिन जब सरकार 10 करोड़ परिवारों को स्वास्थय बीमा देने का वादा करती है तब इसके लिए बजट में कोई आवंटन ना होना सरकार की नीयत साफ़ करती है.

मिड डे मील योजना
सरकार ने इसमें पिछले वर्ष के मुकाबले 500 करोड़ रुपये की वृद्धि करते हुए इसके लिए 10500 करोड़ रुपये का आवंटन किया है. लेकिन वहीँ 25 लाख बच्चों को इससे बाहर करते हुए अब इस योजना के अंतर्गत पिछले वर्ष के 10.08 करोड़ बच्चों के मुकाबले 9.83 करोड़ कर दिया हैं.

रोजगार
भारत में 2014 के आम चुनाव से पहले ही रोजगार के बारे में चर्चाएँ होती आ रही हैं. बेरोजगारी में हो रही वृद्धि का खुलासा हो रहा है, प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री अम्बानी-अडानी और टाटा बिरला, जिनको न सिर्फ सीमा शुल्क और करों में बल्कि भूमि आवंटन में भी रियायतें मिली हैं, को भूलकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम की तरफ अपना ध्यान देने को मजबूर हैं. ऐसे तथ्यों को छुपाकर जहाँ इंफ्रास्ट्रक्चर, बुलेट ट्रेन, हवाई अड्डे, सागरमाला, भारतमाला, औद्योगिक गलियारे जैसी परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्र में राशि आवंटित की गयी है वहां टेक्सटाइल पैकेज के रूप में सिर्फ 7100 करोड़ रूपये का बजट मजाक जैसा है. जाहिर है बेरोजगारी पर कोई ठोस आंकड़ा पेश नही किया गया है क्योंकि 2014 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र में दिया गया 2 करोड़ का लक्ष्य झूठ साबित हुआ है. वे दोनों ही MNREGA को पूरी तरह भूल गये, ग्रामीण गरीबों के लिए गारंटी भी हमें स्पष्ट सन्देश दे रही है कि अधिकार आधारित संगठन, ग्रामीण उद्योग भी इसका हिस्सा नहीं हैं.

हथकरघा विभाग
नोटबंदी के बाद हथकरघा बुनकर गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं क्योंकि हथकरघा उद्योग से होने वाला उत्पादन अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा हिस्सा है. नकद संकट ने उन्हें बुरी तरह प्रभावित किया है और नकद निकासी के तंग मानदंडों ने उन्हें किसी भी गैर-सरकारी, निजी धन ऋणदाता सहायता के रूप में भी लूट लिया है. नुकसान और बड़ते कर्ज के साथ हथकरघा बुनकरों को उम्मीद थी कि सरकार राहत की घोषणा करेगी और कुछ प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण का अधिकार दे सकती है. हालाँकि हथकरघा क्षेत्र के लिए 2017-18 में 604 करोड़ से 486.09 करोड़ और 2018-19 में 386.09 करोड़ तक की गिरावट /कमी एक बड़ा झटका है. यह पहले से ही नोटबंदी और जी एस टी के करों के प्रभावों बीच फंसा हुआ है. पिछले 100 सैलून में हथकरघा क्षेत्र में इतनी गिरावट कभी देखी नहीं गयी है.

बुनियादी ढांचे (Infrastructure)
बजट में छोटे शहरों से गलियारों, बंदरगाहों से हवाई अड्डों, राजमार्गों से बुलेट ट्रेन जो कि लोगों की जमीन, जीविका के अधिकारो का अतिक्रमण करते हैं/ छींनते हैं, प्राथमिकता दी गयी है. प्रभावित जनसँख्या और भूमि के डायवर्सन को कोई राहत नहीं दी गयी है बल्कि 56 हवाई अड्डों के प्रस्ताव से क्षेत्रीय संपर्क स्थापित करना और हवाई चप्पल वालों को अवसर देना मात्र एक मजाक है और कुछ नहीं.

आवास
इस बार के बजट में आवास के लिए सिर्फ 2 घोषणाएं की गयी, एक ग्रामीण क्षेत्रों में 51 लाख घरों के निर्माण और दूसरा राष्ट्रीय आवास बैंक के गठन का लक्ष्य. इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है कि सरकार वर्ष 2022 तक 2 करोड़ घरों के निर्माण के इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को कैसे प्राप्त करेगी. पीएमएवाई के तहत 2015 से 22 जनवरी 2018 तक निर्मित कुल आवास इकाइयां केवल 3,19,397 हैं. अगर यही धीमी गति जारी रही तो 2 करोड़ घरों के निर्माण का लक्ष्य लगभग 62 वर्षों में प्राप्त हो पाएगा और अगर पीएमएवाई की कमियों को ठीक नहीं किया गया तो इसके तहत गरीब और असुरक्षित को आवास नहीं मिल पायेगा.

स्वच्छ गंगा मिशन
बजट में स्वच्छ गंगा मिशन और इसके अंतर्गत आने वाली नयी और पूर्ण हो चुकी परियोजनओं की सूचि का एक विशेष उल्लेख किया गया है. लेकिन भारत की अन्य प्रमुख नदियां जो की प्रदूषित हैं और विनाश की कगार पर हैं, उनके लिए कोई आवंटन नहीं किया गया है. हेरिटेज मिशन के विकास का भी उल्लेख किया गया था, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास द्वारा होने वाले विनाश और विरासत के डूबने का बजट में कोई उल्लेख नहीं है.

बजट बनाने की प्रक्रिया दोषपूर्ण, बिना दृष्टि के आवंटन पर है ध्यान
वार्षिक बजट ने अब विभिन्न क्षेत्रों और योजनाओं के लिए संसाधनों के आवंटन, जो विधायकों या जनता में होने वाली बहस की प्राथमिकताओं को दर्शाती है, का अंतिम अभ्यास नहीं रह गया है. संसदीय पटल में बहुमत वाला राजनैतिक दल अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने में लगे हैं, जब 125 करोड़ से ज्यादा लोगों के लिए इस प्रक्रिया में कोई स्थान नहीं रह गया है. यूपीए सरकार के दौरान वित्त मंत्रालय द्वारा संगठित बजट से पूर्व परिचर्चा में एक स्थान बनता था जिसमें लोकतांत्रिक संवाद हुआ करता था, लेकिन अब जैसा कि जाहिर हो रहा है, जन संगठनों और गैर-निर्वाचन प्रतिनिधियों और उनके विचारों के लिए भी जगह ख़त्म हो रही है. वर्तमान सरकार जन संगठनों के आलोचनाओं से भागती हुई उनके लोकतान्त्रिक सहभागिता के अवसर ख़त्म करने में लगी हुई है. किसानों, मजदूरों, दलितों और आदिवासियों के संगठनों के लिए कोई गुंजाइश नहीं है जो सही समय पर उनकी मांगों के लिए दबाव डाल सके और नतीजा सबके सामने है कि किसानों या दलितों या छात्रों द्वारा उठाए गए मांगों में बहुत कम ही बजट अपना स्थान बना पाए हो.

हमारी उम्मीदें
हम, जन आंदोलनों ने, इस वर्ष के बजट को आने वाले संकटों को ध्यान में रखते हुए एक बहुआयामी दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की. संविधानिक मूल्यों के साथ-साथ अधिकारों और मार्गदर्शक, निर्देश सिद्धांत को बुनियादी ढांचों में रखते हुए सभी वंचित, किसानों, दलितों, आदिवासियों, मजदूरों और आर्थिक रूप से गरीब समूहों द्वारा परखा हैं. बढ़ती बेरोजगारी के बीच, कृषि संकट, औद्योगिक उत्पादन में कमी, बढ़ती मुद्रास्फीति, आर्थिक संकट, वृद्धि दर में गिरावट, बढती असमानता, अन्याय, कृषि में बड़ी आबादी को हो रही हानि, अन्य आर्थिक और सामाजिक रूप से असुरक्षित क्षेत्रों, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए बजट को संदेह में रखते हुए बहुत उम्मीदों के साथ देखती है. आर्थिक विकास के जुनून ने समाज में ज्यादातर लोगों के साथ हो रहे अत्याचारों, आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी की चिंता को नजरंदाज किया है, जिससे अभी की सरकार के मूल्यों की कमी साफ़ दिखाई दे रही है. हम गांधी को जश्न मनाने के लिए तो चाहते हैं लेकिन गांधीवादी मूल्यों के लिए सार्वजनिक नीति और राजनीति में कोई जगह नहीं देना चाहते है, ऐसा साफ़ प्रतीत हो रहा है इस वर्ष के वार्षिक बजट से.

सौजन्य- सबरंग

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