जामिया के छात्र बोले- आप लाइब्रेरी तोड़ेंगे, हम सड़क पर पढेंगे !

जामिया के छात्र बोले- आप लाइब्रेरी तोड़ेंगे, हम सड़क पर पढेंगे !

पढ़ेंगे-पढ़ाएंगे’ का नारा जामिया में बुलंद हो रहा है। ओल्ड लाइब्रेरी के आगे ‘खुला रीडिंग सेक्शन’ किताबों के कद्रदानों को खींच रहा है। एक दरी पर लोग बैठकर किताबें पढ़ रहे हैं। स्टूडेंट्स स्वागत कर रहे हैं। किताबें फैली हैं। किताब आप उठाएं, वहीं बैठें और पढ़ना शुरू करें।

जामिया पहुंचीं अल्मनाई सहर कहती हैं, मैं रोमांचित हूं इस आइडिए से। यह कमाल का है। आपने हमारी लाइब्रेरी तोड़ी, हम सड़क पर पढ़कर दिखाएंगे। मैं इस आंदोलन के दौरान तीन बार जामिया आ चुकी हूं, क्योंकि यह आंदोलन इंसानियत के लिए है। मुझे गर्व होता है कि मैंने इस यूनिवर्सिटी में पांच साल बिताएं हैं, जिसे स्टूडेंट्स मिलकर मजबूत बना रहे हैं। महात्मा गांधी की किताब हिंद स्वराज पढ़ रहे जामिया स्टूडेंट राहिल कहते हैं, यहां पढ़कर हम लोगों को जागरूक करना चाहते हैं कि पढ़ें जरूर! एनआरसी-सीएए के बारे में भी पहले पढ़ें, फिर विरोध में शामिल हों। हम कोशिश करेंगे कि इस कोने को और गुलज़ार करें और कई किताबें लाएं। हम कुछ दोस्त सोच रहे हैं कि संविधान, कानून और आंदोलनों पर भी किताबें लाएं, ताकि जज्बा बढ़े।

जामिया से पिछले साल पढ़ चुकीं स्टूडेंट नूर कहती हैं, जामिया एक उदाहरण बन रहा है और यह देखकर मैं बहुत खुश हूं। जब लाइब्रेरी की खबर मिली तो मैं हैरान हो गई। कोई कैसे लाइब्रेरी को तबाह कर सकता है। पुलिस वालों के बच्चे भी तो लाइब्रेरी जाते होंगे! अगर वहां पत्थरबाज थे तो उन्हें टारगेट करते, हिरासत में लेते। डंडे भी मारते, मगर जो किताबों संग बच्चे दिखे, उन पर आपने क्यों डंडे बरसाए। मैं सहम जाती हूं जब जामिया के उस स्टूडेंट के बारे में सोचती हूं जिसकी आंख की रोशनी चली गई। उसके ख्वाबों पर अंधेरा ला दिया। आज यह कोना बता रहा है कि आप लाइब्रेरी छीनेंगे, हम सड़क पर किताबें सजाएंगे।

डीयू स्टूडेंट अनुपम द्विवेदी कहते हैं, जब-जब पढ़ने वालों पर हमला होता है, तब-तब दुनिया में बदलने की हिम्मत उठती है। आज यही हो रहा है। सीएए-एनआरसी लाना था तो पहले किताबें पढ़ने चाहिए थी। संविधान पढ़ना चाहिए था। अगर आपकी मंशा साफ थी तो पढ़े-लिखे लोगों से खुली चर्चा करनी चाहिए थी। मुझे लगता है कि सड़क पर ये किताबें यही कह रही हैं।

आप धारा 144 लगा दें, प्रदर्शन के लिए बाहर ना आने दें, मगर हमारे पास और भी तरीके हैं विरोध जताने के लिए। हम पढ़ेंगे और कलम से वार करेंगे।

साभार- नवभारत

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