जस्टिस बेदी समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक; मोदी के तहत गुजरात सरकार के खिलाफ मुसलमानों के आरोप खारिज

जस्टिस बेदी समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक; मोदी के तहत गुजरात सरकार के खिलाफ मुसलमानों के आरोप खारिज

शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एच एस बेदी द्वारा सुप्रीम कोर्ट (एससी) को सौंपी गई 229 पन्नों की एक रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है। रिपोर्ट कहते हैं कि मुसलमानों को विशेष रूप से वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी द्वारा लक्षित नहीं किया गया था. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस एच.एस. बेदी ने निष्कर्ष निकाला कि 2002 और 2006 के बीच हुई 17 पुलिस मुठभेड़ों में से तीन फर्जी थे, कमेटी ने उन आरोपों को भी खारिज किया है जिनमें कहा गया था कि गुजरात में 2002 से 2006 के बीच मुस्लिम अतिवादियों को चुन-चुन कर बाहर निकाला गया था. इस दौरान नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस ने अपनी रिपोर्ट मॉनिटरिंग कमेटी के अध्यक्ष को सौपी है. इस मॉनिटरिंग कमेटी का गठन 2002-2006 के बीच गुजरात में हुए एनकाउंटर्स की जांच के लिए किया गया था. यह 229 पन्नों की रिपोर्ट का हिस्सा है, जिसे न्यायमूर्ति बेदी ने फरवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया था। इस रिपोर्ट को जनहित याचिकाकर्ताओं के साथ साझा करने का आदेश दिया गया था, जिन्होंने 2007 में सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था, जिसमें निष्पक्ष जांच की आवश्यकता थी।

गुजरात के पूर्व डीजीपी आरबी श्रीकुमार के उस दावे को भी खारिज किया है जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि मुस्लिमों की हत्या में राज्य की मशीनरी भी शामिल थी. उन्होंने आरोप लगाए थे बड़े पदों पर बैठे अधिकारी और नेता फेक एनकाउंटर कर मुस्लिमों को मारने के लिए मौखिक आदेश देते थे. उस वक्त श्रीकुमार गोधरा कांड के दौरान गुजरात में सशस्त्र इकाइयों के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक थे और 2002 में हुए दंगों के दौरान इंटेलिजेंस डीजीपी भी थे. उन्होंने समिति के सामने अपना बयान दर्ज किया और 2 अन्य आवेदन भी दायर किए.

न्यायमूर्ति बेदी ने कहा “श्रीकुमार द्वारा उठाए गए मुद्दे इस प्रकार प्रासंगिक नहीं हैं …”

समिति के सामने श्रीकुमार ने दावे के साथ कहा कि उन्होंने उन आदेशों को मानने से इनकार कर दिया था जिसमें मुसलमानों के मारने की बात कही गई थी. जिसके बाद उन्हें राज्य सरकार की ओर से डीजीपी पोस्ट पर प्रमोशन नहीं दिया गया. उन्होंने समिति के समाने गुजरात के पूर्व डीआईजी डीजी वंजारा के त्याग पत्र का भी हवाला दिया, जिसमें राज्य सरकार के आदेशों का पालन करने वाली ‘मुठभेड़ पुलिस’ के बारे में बात की गई थी. लेकिन जस्टिस बेदी की अध्यक्षता वाली समिति को श्रीकुमार के दावों में कोई विश्वसनीय तथ्य नहीं मिला.

श्रीकुमार की ओर से किए गए रिप्रेजेंटेशन और स्टेटमेंट सामान्य हैं जो प्रशासनिक निर्णय से संबंधित हैं, जिस पर वे सहमत नहीं थे. और ये वही कारण थे जिसकी वजह से राज्य सरकार के सामने उन्होंने पीड़ित होने की बात कही. 229 पन्नों की इस रिपोर्ट में कहा गया कि ये सारे मुद्दे मुस्लिम अतिवादियों के चयन से संबंधित थे जिनके बारे में रेकॉर्ड नहीं है.|

जस्टिस बेदी ने इस बात पर भी बल दिया कि परिस्थितियों की वजह से आरोपों की सत्यता संदेहों के घेरे में है. जिसकी वजह से अलग-अलग राज्यों से संबंधित एनकाउंटर के 17 मामलों में सभी समुदाय के पीड़ित पक्ष शामिल हैं. इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, केरल और महाराष्ट्र प्रमुख हैं. कमेटी ने कहा कि इन सभी मामलों में एक ही तथ्य समान है कि सभी लोग अपराध से जुड़े हुए थे.

सभी तथ्यों को सुनने बाद यह निर्णय किया गया कि श्रीकुमार की ओर से उठाए गए मुद्दे प्रासंगिक नहीं हैं. हालांकि इन एनकाउंटर्स में 18 लोगों की मौत सोचने का विषय है. कमेटी की ओर से जांचे गए 17 मामलों में गुजरात पुलिस को 14 मामलों में सुप्रीम कोर्ट की ओर से क्लीन चिट मिल गई है. कमेटी ने सुनवाई के बाद फैसला किया कि इन मामलों में कोई ऐसा तथ्य नहीं है जिनकी वजह से एनकाउंटर के दौरान मौजूद रहने वाले अधिकारियों के खिलाफ जांच के आदेश दिए जाएं.

फर्जी एनकाउंटर के तीन मामलों में कमेटी ने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर मुकदमा चलाने का अनुरोध किया है. इन तीन फर्जी एनकाउंटर के मामलों में पीड़ितों के नाम कासिम जफर, समीर खान और हाजी इस्माइल है. जिन अधिकारियों के खिलाफ कमेटी ने कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं उनमें सभी इंस्पेक्टर पद से ऊपर के हैं.

इन मामलों से संबंधित अंतिम रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बेदी ने फरवरी 2018 में दाखिल की थी. यह वही सप्ताह है जब जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश दिया था कि इस मामले की अंतिम रिपोर्ट याचिकाकर्ताओं को भी सौंपी जाए. इन मामलों में याचिकाकर्ता पत्रकार बीजी वर्गीस और गीतकार जावेद अख्तर का नाम भी शामिल है. वर्गीस और जावेद अख्तर दोनों ने अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं. उन्होंने 2007 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था और अपील की थी कि 2002 से 20006 के बीच हुए सभी एनकाउंटरों की जांच की जाए.

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