Wednesday , November 22 2017
Home / Khaas Khabar / निर्भया काण्ड तो सड़क से संसद तक गूंजा लेकिन बिलकिस बानों का नाम सुर्खियां न बन सका: राजदीप सरदेसाई

निर्भया काण्ड तो सड़क से संसद तक गूंजा लेकिन बिलकिस बानों का नाम सुर्खियां न बन सका: राजदीप सरदेसाई

यह कहानी है भारत की दो बेटियों की, जो भयावह यौन अपराधों की शिकार हुईं। ज्योति सिंह 23 साल की थी और उसने मेडिकल में एक उज्ज्वल भविष्य का सपना देखा था, ताकि अपने परिवार को गरीबी से बाहर निकाल सके। लेकिन दिसंबर 2012 में देश की राजधानी दिल्ली में क्रूरता से गैंग रेप हुआ और उसकी हत्या कर दी गई।

वहीं दूसरी बिल्किस बानो सिर्फ 19 साल की थीं  और पांच महीने से गर्भवती भी, तब उनका दंगाईयों ने बालात्कार किया। उस समय उनके परिवार में कुल 13 सदस्य थे, जिसमें तीन साल का एक बच्चा भी शामिल था। दंगाइयों ने सभी की हत्या कर दी थी।

ज्योति और बिलकिस की घटना हमारे समाज का एक स्याह पक्ष है, फिर भी दोनों की कहानी अलग-थलग जा पड़ता है। इसमें से एक हमें गंभीर आत्मनिरीक्षण के लिए मजबूर करता है।

पिछले हफ्ते ज्योति सिंह के हत्यारों को सर्वोच्च न्यायालय ने मौत की सजा सुनाई। मतलब कि साढ़े चार साल के भीतर न्याय दे दिया गया। लेकिन उसके एक दिन पहले बिलकिस मामले में 11 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा।

वहीं दूसरी छह पुलिस अधिकारियों और एक सरकारी डॉक्टर को तीन साल सी सजा सुनाई। मीडिया में ज्योति सिंह का फैसला सुर्खियां बनी और टीवी चैनलों पर चौबीस घंटे सातों दिन चलाया गया। लेकिन वहीं बिलकिस के फैसले को न तो किसी चैनल ने सुर्खी बनाई और न ही उस पर बहस में किसी को शामिल किया गया।

लेकिन इस अंतर से आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। जैसाकि ज्योति की घटना राष्ट्रीय राजधानी में हुई थी, जहां देश के ज्यादातर टीवी चैनल और अखबारों का मुख्यालय है। यह घटना कानून बनाने वाली संसद के कुछ ही किलोमीटर दूरी पर हुई थी। ज्योति की मृत्यु के कुछ घंटों के भीतर हजारों लोगों ने राजपथ के सामने इकठ्ठा हो गए थे जिसमें आगे चलकर लगातार बढ़ोतरी होती चली गई। इसका गुस्सा संसद में भी गुंजा। देश ने उसकी मृत्यु पर शोक मनाया। नेताओं ने बढ़-चढ़कर ज्योति के परिवार वालों से मुलाकात की। और आखिर में एक उच्च स्तरीय समिति का भी गठन किया गया।

इसके विपरीत बिलकिस बानो अहमदाबाद से करीब 200 किलोमीटर दक्षिणी में स्थित एक आदिवासी वर्चस्व वाले जिले दाहोद में। वहां वो दंगा पीड़ितों के एक शरणार्थी शिविर में थी जब उनके साथ बालात्कार किया गया।बिलकिस ने स्थानीय पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन उन्हें धमकाया गया कि वो अपने याचिका और आरोपों को वापस ले लें।

लेकिन किसी तरह से कुछ एनजीओ, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मजबूत कानूनी दल के प्रयास से उसके केस को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर सीबीआई को सौंपा गया। और मामले को गुजरात से बाहर हस्तांतरित करने का आदेश दिया गया। यह मामला कोई दशक से अधिक समय तक चला। बिलकिस ने अपने मामले को बहादुरी लड़ा। हालांकि उन्हें अपने घर से बाहर बाहर रहना पड़ा जहां हमलावर अभी भी चारों तरफ फैले हुए थे।

बिलकिस का मामला धीरे-धीरे सिर्फ और सिर्फ गुजरात दंगों का प्रतीक बन गया, जबकि ज्योति सिंह का मामला मशहूर हो गया, लिंग न्याय की लड़ाई का प्रतीक बन गया। जो लोग बिलकिस के समर्थन में आए उन्हें छद्म धर्मनिरपेक्ष ‘झोलवाल्ला’ उदारवादी कहा गया और उन पर आरोप लगाया कि वो सिर्फ गुजरात सरकार को बदनाम करना चाहते हैं।

जबकि ज्योति सिंह का का मामला उठाने वालों को बलात्कार कानूनों को फिर से परिभाषित करने के मोर्चे लेने वालों में देखा गया। ज्योति सिंह के साहस की याद में ग्लोबल डॉक्यूमेंट्री बनाने की भी योजना बनाई गई। काश कोई ऐसा बिलकिस और उसके परिवार वालों के लिए भी करता।

हालांकि दोनों मामलों में अभियुक्तों को अदालत ने दंडित किया गया था। लेकिन दोनों मामलों में न्यायाधीशों के अंतिम आदेशों में जो विरोधाभास दीखता है वह हमारे न्याय प्रणाली की मनोदशा को दर्शाता है। दिल्ली गैंग रेप को ‘राक्षसी’ कार्यवाई बताया गया। न्यायाधीशों ने इसे ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ की संज्ञा दी। अदालत ने यह फैसला सुनाया कि यह रेयरेस्ट ऑफ रेयरेस्ट मामला है इसलिए दोषी मृत्युदंड के लायक है।

दूसरी तरफ बिलकिस मामले में न्यायाधीशों ने षड्यंत्र के चार्ज को खारिज कर दिया। और दावा किया कि अपराध उसकावे के तहत किया गया था। हालांकि अदालत ने यह माना कि यह घटना मुसलमानों का टारगेट करते हुए अंजाम दिया गया।

लेकिन इसके बावजूद अदालत ने बलात्कारियों को मौत की सजा देने से इंकार कर दिया। न्यायाधीशों ने कहा कि गोधरा ट्रेन जलने के बाद आरोपियों ने यह कार्यवाई बदला लेने के लिए किया था।

विडंबना यह है कि जब मैंने बिलकिस से इस बारे में पूछा कि क्या वह इस फैसले से संतुष्ट है, तो उन्होंने बहुत कम शब्दों में जवाब दिया, “मैं हमेशा न्याय चाहती थी, बदला नहीं!” लेकिन मेरा एक सवाल दुनिया वालों सिर्फ इतना है कि क्या एक संप्रदायिक हिंसा में गैंगरेप पीड़िता का न्याय दिल्ली के बस में सामूहिक बलात्कार की शिकार पीड़िता से अलग हो जाता है।

बिलकिस अब 34 साल की हो चुकी हैं। जब उनके साथ बलात्कार हुआ तब वो सिर्फ 15 साल की थी और गर्भवती भी। वह एक वकील बनना चाहती हैं। उन्होंने यह बात मुझे मुस्कुराते हुआ बताया था। शायद, वह एक दिन ‘नए भारत’ को न्याय का सही अर्थ बता सकेंगी।

TOPPOPULARRECENT