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जानिए कैसी थी हज़रत अली की शख़्सियत

काबा

पैग़म्बरे इस्लाम के दामाद और मुसलमानो के चौथे ख़लीफ़ा हज़रत अली एक ऐसी आदर्श शख़्सियत थे जिन्होंने अपना जीवन अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ बिताया। उन्हेँ अमीरुल मोमिनीन ,हैदरे र्करार ,इमामुल मुत्तकीन ,असदुल्लाह ,अबूतराब ,वसी ए रसूल और ना जाने कितने लकब दिये गये। इतने सारे नामोँ से उन्हेँ यूँ ही नही पुकारा जाता था ,वरना हर नाम की सिफत को उन्होने ने अपने दामन मे उतार लिया था ।अल्लाह के जो हुक्म  वह लोगोँ को देते थे खुद पर अमल कर के दिखाते थे।

इमाम और खलीफा होने के बाद भी उनके जीवन का बड़ा हिस्सा इबादत मे बीता था । कहा जाता है कि इंसानी कलम मे इतनी ताक़त नही कि इमाम अली की तारीफ कर सके। बुलंद फिक्र व ख़यालात, मखलूस अंदाज़ मे एक खास मेयार पर ज़िँदगी बसर की वह निराले अंदाज़ मे रहे और खास अंदाज़ मे इस दुनियाँ से विदा ली।

आपकी पैदाइश अल्लाह के घर पवित्र काबे शरीफ मे हुई थी। कहा जाता है कि आपकी वालदा आपकी पैदाइश के पहले जब काबे शरीफ के पास गयीँ तो अल्लाह के हुक्म से काबे की दीवार ने आपकी मां को रास्ता दे दिया था। उनके काबे मे तशरीफ लाने के चार दिन बाद 13 रजब को इमाम अली पैदा हुए ।मोहम्मद मुस्तफा स. स. का आपकी ज़िँदगी पर गहरा असर पड़ा था ।चाहे वह मस्जिद हो ,जंग का मैदान हो या फिर आम जगह इमाम अली हर वक्त पैग़म्बरे इस्लाम के साथ रहते थे ।यहाँ तक कि जब रसूले अकरम शबे मेराज पर गये तो अपने बिस्तर पर अली को सुला कर गये थे ।एक गिरोह पैगम्बरे इस्लाम को कत्ल करना चाहता था ,तो अल्लाह ने उन्हेँ शबे मेराज पर एक रात के लिए बुला लिया। हमलावर गिरोह पहचान ना सके इस लिए अली रसूल के बिस्तर पर ऐसे सोये कि वह लोग पहचान नही सके।

खुदा कि सिफात के आईनेदार ,तमाम सिफात के मरकज़ अली आज से करीब 1352 साल पहले 661 ई. मे माहे रमज़ान मुबारक की 21 वीँ तारिख को कूफे की मस्जिद मे सुबह की नमाज़ के वक्त शहीद कर दिये गये। 19 रमज़ान को सहरी के बाद जब सुबह की नमाज़ अदा की जा रही थी तो नमाज़ियोँ के बीच खड़े कातिल रहमान इब्ने मुलज़िम ने ज़हर से बुझी तलवार से मौला अली पर वार कर दिया। आप इसके बाद दो दिन तक बिस्तर पर रहे। ऐसा कहा जाता है कि मोहम्मद मुस्तफा स.स. ने मौला अली को कातिल की पहचान और उसके बारे मे बता दिया था ।19 रमज़ान को नमाज़ के वक्त मौला अली ने ये जानते हुये कि यही कातिल है ,उसे नमाज़ के लिए उठाया था ।अब देखिये अली का इंसाफ ,हमले के बाद नमाज़ियोँ ने इब्ने मुल्ज़िम को पकड़ लिया था । मौला अली ने निर्देश दिया कि इसके खाने पीने का पूरा ख्याल रखा जाये और चूंकि इसने तलवार से एक वार किया है इस लिए इस पर भी एक ही वार किया जाये ।

हज़रत अली इस्लाम धर्म के चौथे खलीफा बने ।वह अपनी ज़िँदगी यहूदी के बाग़ मे नौकरी करके बसर करते थे। खाने मे हमेशा जौ की रोटी और नमक या फिर दूध लेते थे ।खलीफा बनने के बाद भी सरकारी खज़ाने से अपने लिए और ना ही रिश्तेदारों के लिए कुछ लेते थे।

आज के दौर मे हज़रत अली की जीवन दर्शन प्रसांगिक है। उन्होंने अमन और शान्ति का पैगाम दिया और बता दिया कि इस्लाम कत्ल और गारतगिरी के पक्ष में नही है। जानबूझ कर किसी का कत्ल करने पर इस्लाम मे अदबी आज़ाब मुर्कर है ।उन्होंने कहा कि इस्लाम तमाम मुसलमानों का मज़हब है ।अल्फाज़ और नारों से हट कर अदल और इंसाफ की हकीकी तस्वीर पेश की ।उन्होंने राष्ट्रप्रेम और समाज मे बराबरी की पैरोकारी की ।वह कहा करते थे कि अपने शत्रु से भी प्रेम किया करो तो वह एक दिन तुम्हारा दोस्त बन जायेगा। उनका कहना है कि अत्याचार करने वाला ,उसमे सहायता करने वाला और अत्याचार से खुश होने वाला भी अत्याचारी ही है।

हज़रत अली ने अपनी पुस्तक नैजुल बलागाह में जीवन का कोई पहलू छोड़ा नही है। इसी पैग़म्बरे इस्लाम मोहम्मद मुस्तफा स. ने कहा है कि मैं इल्म का शहर तो अली उसके दरवाज़े हैं ।अली वह ज़ात है जिसकी विलादत भी मोजिज़ा और जिसकी शहादत भी मोजिज़ा है । वह सिफात के मरकज़ थे तभी तो पैदा भी अल्लाह के घर मे हुये और शहीद भी अल्लाह के घर मे हुए ।अगर आज अली के बताये रास्ते पर कुछ दूरी तक भी चला जाये तो दुनियां और समाज मे फैली अशान्ति ख़त्म हो सकती है । इंसानों के बीच गैरबराबरी और नफरत मिट सकती है । लेकिन पिछली 13 शताब्दियोँ से पैग़म्बरे इस्लाम और अली को याद तो किया जाता है लेकिन हम इन तारीखों के बीत जाने के बाद फिर अपने अंदाज़ मे जीने लगते है।

 

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