Friday , December 15 2017

जिंदा कौमें शिकायत नहीं करतीं, बल्कि पहाड़ खोद कर रास्ते बना लेती हैं

बहुत समय पहले मैंने एक अंग्रेज विचारक का थोट पढ़ा था कि जब तक मेरी कौम में ऐसे सिर फिरे मौजूद हैं जो किसी नज़रिए को साबित करने के लिए अपना घर बार दांव पर लगाकर उसका रिसर्च करते रहें, किसी चीज की खोज में रेगिस्तान में भटकते रहें और पहाड़ों की ऊपरी चोटियों को सर करने की कोशिश करते रहें, तब तक मुझे अपनी कौम के बारे में कोई समस्या नहीं है।

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इसके विपरीत, हमारी हालत यह है कि खाने, पीने, पहनने, पश्चिम की नई नई चीजें गर्व से खरीदने से हमें फुर्सत नहीं है। एक हजार साल तक दुनिया को देने के बाद पिछले कई सौ साल से हमने दुनिया से कुछ लिया ही है, दिया कुछ नहीं है।

अभी कुछ दिन पहले खबर आई है कि पूरी तरह से विकलांग ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग के 1966 के पीएचडी लेख को कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने अपनी वेबसाइट पर डाल दिया तो कुछ दिनों के अंदर पांच मिलीयन (पचास लाख) लोगों ने उस वेबसाइट पर जाकर उस लेख को पढ़ा, और उनमें से 5 लाख लोगों ने उस लेख को डाउनलोड किया। क्या यह उदाहरण किसी मौजूदा अरब या मुस्लिम समाज में पाया जा सकता है? हमारे मार्ग एक के बाद एक बंद होते जा रहे हैं। हमारी उर्दू किताबें जो पहले एक हजार की संख्या में छपती थीं, अब केवल पांच सौ की संख्या में छपती हैं, क्योंकि कोई खरीदता नहीं है। बड़े से बड़े लेखक व रिसर्चर एवं साहित्यकार का कोई मोल नहीं, जबतक कि वह किसी बड़े पद पर न बैठा हो। हाँ, हमारे मोहल्लों में रेस्तरां, कबाब के ठेले और दवा की दुकानें खूब चल रही हैं।

हॉकिंग का उक्त लेख कोई नॉवेल नहीं है बल्कि ”लगातार विस्तार पाने वाली बाहरी दुनियाओं के विशेषताओं (Properties of Expandig Universes) के बारे में है। (यह वही नज़रिया है जिसे कुरान में ”व इन्ना ल मूसिउन” (अलज़ारियात 47 (के शब्दों में वर्णन किया गया है)। और यह लेख एक ऐसे आदमी ने लिखा है जो चलने, फिरने, बोलने और यहां तक ​​कि लिखने से भी बिल्कुल विकलांग है।

उसकी क़ाबिलियत को देखते हुए ब्रिटिश सरकार और समाज ने उसे हर तरह की सुविधा मोहय्या कराई है, जिसमें एक अजीब व गरीब कंप्यूटर भी शामिल है, जो कि हॉकिंग के मस्तिष्क तरंगों को समझकर कंप्यूटर पर शब्दों का आकार देता है। हॉकिंग के यह विचार न सिर्फ वैज्ञानिक दुनिया में बहुत अहमियत रखता है बल्कि इसे बहुत दिलचस्पी और रुचि से पढ़े जाते हैं, बल्कि अक्सर अखबारों की सुर्खियां भी बनती हैं।

हमारे समाज में हॉकिंग जैसा व्यक्ति कब का कुढ़ कुढ़ कर मर चूका होता, या किसी चौराहे पर विकलांगता वाहन में बैठकर भीख मांग रहा होता। हमारे समाज में क़ाबिल जो विकलांग भी न हो ऐसे व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। कई साल पहले अमेरिका में मेडिकल में पीएचडी करने वाले हर गोबिंद खुराना अपने देश की सेवा करने देश में वापस आ गए, तो सरकार ने उन्हें एक देहाती इलाके में बहाल कर दिया।

बेचारा अपना टूटा हुआ दिल ले कर फिर अमेरिका चला गया और कुछ सालों के बाद जब उसे अपनी रिसर्च पर नोबेल पुरुस्कार मिला तो भारत में उसे बड़ा गर्व से बयाँ किया जाने लगा। उसके जवाब में डॉक्टर खुराना ने सिर्फ एक लाइन का बयान जारी किया। “यह सम्मान मुझे एक अमेरिकी नागरिक के रूप में मिला है”

(डॉक्टर जफरुल इस्लाम खान)

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