आसनसोल हिंसा : मौलाना इमदादुल रशीदी और महात्मा गाँधी की अपील

आसनसोल हिंसा : मौलाना इमदादुल रशीदी और महात्मा गाँधी की अपील

पश्चिम बंगाल का दूसरा सबसे बड़ा शहर आसनसोल जो बांग्लादेश में नाओक्ली से 562 किमी दूर है। इन दो ऐतिहासिक शहरों के बीच की एक समानता को आकर्षित करना आज सही हो सकता है। आसनसोल में एक हालिया और नोआखाली में सात दशक पहले हुई घटना में एक समानता है। आसनसोल में मौलाना इमदादुल रशीदी, जबकि दूसरे छोर पर नोआखाली में नायक मोहनदास करमचंद गांधी।

1946 की अंतिम तिमाही के दौरान अनेक विशेषज्ञ और गांधीवादी महात्मा गांधी के साथ थे, जब उन्होंने नोआखाली में उस समय हस्तक्षेप किया था जब लोग धर्म के नाम पर एक-दूसरे की हत्या कर रहे थे। गांधी जी ने बंगाल व बिहार के दंगा वाले इलाकों का दौरा किया। इसके शिकार हुए लोगों को दिलासा दिया और शरणार्थियों के पुनर्वास का प्रयास किया। गांधी पर दोनों समुदायों ने आरोप लगाए, जब उनकी बातों का कोई असर नहीं हुआ तो वह अनशन पर बैठ गए।

उनके उपवास ने कलकत्ता में दंगे बंद करवा दिए। इतना ही नहीं दंगाइयों ने उनके सामने हथियार भी डाल दिए थे। वहां 40 से अधिक गांव जल गए थे, अनेक लोग मारे गए, बलात्कार हुए और लोग घायल हुए थे। मार्च के आखिरी हफ्ते में रामनवमी जुलूस के कारण हुई हिंसा के बाद मौलाना इमादुल रशीदी ने 16 वर्षीय बेटे को खो दिया। जब हजारों नाराज लोग इमाम के सामने इकट्ठे हुए, तो बेटे की मृत्यु के कारण दुखी हो गए लेकिन उन्होंने 1946 में गांधी के समान ही बात रखी कि मेरा बेटा चला गया है मैं इसे स्वीकार करता हूं। लेकिन अगर कोई उसकी हत्या पर बदला लेने की बात करेगा तो मैं इस मस्जिद और शहर को हमेशा के लिए छोड़ दूंगा।

महात्मा गांधी जानते थे कि ब्रिटिश सेना या अंतरिम भारत सरकार नोआखाली में शांति लाने में सक्षम नहीं होगी। गांधी को पता था कि अस्थिर स्थिति को संभालने का एकमात्र तरीका लोगों से खूबसूरती से मरने की तैयारी के बारे में बात करना था। गांधी बहुत ही सरल थे। उन्होंने एक गेंद ले ली और गांव के बच्चों से कहा कि आपके माता-पिता एक-दूसरे से डरते हैं, लेकिन आपको कौन सा डर है?

आप भगवान के बच्चे हैं मैं आपको गेंद के खेल खेलने के लिए आमंत्रित कर रहा हूं। हिंदू और मुस्लिम बच्चे मंच पर आगे बढ़ने लगे तो गांधी ने उन पर गेंद फेंक दी जिससे बच्चे खेलते रहे। तब गांधीजी ने कहा था कि यदि आपके भीतर हिम्मत नहीं है, तो इसे अपने बच्चों से अनुकरण करने का प्रयास करें। 2018 में इमाम मौलाना इमदादुल रशीदी के बेटे सिबतुल्ला की हत्या कर दी गई लेकिन उन्होंने अपने बेटे की मौत की वजह से शांति को बिगड़ने नहीं दिया।

(मलयाली लेखक गोपालकृष्णन)

Top Stories