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जाने कौन थे ईवीआर रामास्वामी पेरियार, जिनकी तोड़ी गई प्रतिमा

त्रिपुरा में रूसी विचारक व्लादिमीर लेनिन की प्रतिमा तोड़े जाने के बाद तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में सामाजिक आंदोलन के प्रणेता ईवीआर रामास्वामी पेरियार की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने की घटना सामने आई. यही नहीं, पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में भाजपा के शिखर पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा के साथ भी छेड़छाड़ किया गया. इन घटनाओं की देशभर में निंदा की गई. वहीं, तमिलनाडु में तो पेरियार की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने के आरोप में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए भाजपा कार्यकर्ता आर. मुत्थूरमण को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने दल से निकाल दिया.

रामास्वामी पेरियार दक्षिण भारत के बड़े समाज सुधारकों में से एक माने जाते हैं. उन्होंने स्त्री शिक्षा, दलितों के उद्धार की दिशा में काम किया था. उन्होंने जस्टिस पार्टी का गठन कर रूढ़ीवादी हिन्दुत्व का विरोध किया था. इसके अलावा पेरियार का नाम दक्षिण भारत में हिन्दी विरोधी आंदोलन के लिए भी जाना जाता है. पेरियार ने हिन्दी की अनिवार्य शिक्षा का पुरजोर विरोध किया था. आइए जानते हैं पेरियार के बारे में और भी कई अहम बातें…

1. तमिलनाडु के इरोड में 17 सितंबर 1879 को जन्मे ईवीआर रामास्वामी की स्कूली शिक्षा ज्यादा नहीं हुई थी. उनका जन्म परंपरागत हिन्दू परिवार में हुआ था, लेकिन बचपन से ही विरोधी प्रवृत्ति के रामास्वामी उपदेशों में कही गई बातों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते रहते थे. वे हिन्दू शास्त्रों में कही गई बातों का मखौल उड़ाते रहते थे.

2. बाल विवाह, स्त्री शोषण और दलितों से संबंधित मसले उठाने के कारण रामास्वामी को ‘पेरियार’ कहा जाने लगा. तमिल भाषा में इस शब्द का अर्थ होता सम्मानित व्यक्ति. पेरियार ने हिन्दू वर्ण व्यवस्था का भी विरोध किया था. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के कहने पर 1919 में कांग्रेस में शामिल हो गए थे. कांग्रेस में रहते हुए ही उन्होंने वाईकाम आंदोलन का नेतृत्व किया, जो मंदिरों की ओर जाने वाली सड़कों पर दलितों के चलने की मनाही को हटाने के लिए था.

3. अपने काशी (वाराणसी) प्रवास के दौरान भी पेरियार को हिन्दू धर्म में भेद-भाव की प्रवृत्ति का सामना करना पड़ा. काशी में रहते हुए उन्हें भोजन करने की इच्छा हुई तो पता चला कि वहां निःशुल्क भोजन का इंतजाम है. लेकिन जब पेरियार वहां पहुंचे तो उन्हें पता चला कि यह सुविधा सिर्फ ब्राह्मणों के लिए थी. इससे उन्हें बहुत दुख हुआ और उन्होंने हिन्दुत्व का विरोध करने की ठान ली.

4. इसके अलावा कांग्रेस में रहते हुए ही एक बार उन्होंने पार्टी के प्रशिक्षण शिविर में गैर ब्राह्मण कार्यकर्ताओं के साथ भेद-भाव को देखा. इसका उन्होंने विरोध किया. बाद में उन्होंने कांग्रेस के बड़े नेताओं के समक्ष दलितों और पीड़ितों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा, जिसे मंजूरी नहीं मिलने पर उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया.

5. कांग्रेस से अलग होने के बाद पेरियार ने जस्टिस पार्टी की स्थापना की, जिसका नाम बाद में द्रविड़ कड़गम कर दिया गया. हालांकि इससे पहले वे रूस भी गए, जहां की मार्क्सवादी विचारधारा ने उन्हें काफी प्रभावित किया. स्वदेश लौटने के बाद उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा के तहत आर्थिक नीति को साम्यवादी बनाने का सुझाव दिया, लेकिन बाद में उन्होंने अपना विचार बदल दिया.

6. पेरियार ने तमिलनाडु में वर्ष 1937 के दौरान राजाजी द्वारा आरोपित हिन्दी की अनिवार्य शिक्षा का घोर विरोध किया. इसके कारण तमिलनाडु में वे बहुत लोकप्रिय हो गए. इसके बावजूद उन्होंने खुद को सत्ता की राजनीति से अलग रखा तथा आजीवन दलितों और स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए प्रयासरत रहे.

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