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बिहार: सृजन घोटाले में अब मनोरमा देवी के डॉक्टर बेटे का नाम भी आया

बिहार के सृजन घोटाले में रोज़ाना नए नए नामों का खुलासा हो रहा है । अब इस घोटाले में सृजन संस्था की संचालिका मनोरमा देवी के बड़े बेटे डॉ प्रणब का नाम भी सामने आ रहा है । प्रणब फिलहाल ऑस्ट्रेलिया में रह रहा है । कहा जा रहा है कि उसे घोटाले की पूरी जानकारी पहले से थी । प्रणब पहले रांची में ही प्रेक्टिस करता था ।

सृजन घोटाले में उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी की चचेरी बहन का नाम सामने आया था। इसके अलावा घोटाले में मनोरमा देवी के बेटा अमित और बहू प्रिया कुमार का भी नाम आ चुका है और अब बड़े बेटे के तार भी सृजन घोटाले से जुड़ गए हैं ।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी खातों में अरबों रुपये डकारने वाले सृजन के कर्ताधर्ता ने घोटाला उजागार होने से बचने की पूरी तैयारी की थी । विभागीय खातों में डालने के लिए पचास लाख रुपए की दरकार थी । लेकिन सृजन की संचालिका मनोरमा देवी की मौत के बाद यह राशि नहीं जुटाई जा सकी । घोटालेबाज जिला नजारत के नाजिर अमरेंद्र यादव को पचास लाख रुपए देना चाहते थे। इस राशि के मिलते ही अमरेंद्र सृजन को फिर से दो करोड़ रुपये की सरकारी राशि की व्यवस्था कर दे देता।

सतीश के मुताबिक, मनोरमा के श्राद्ध के दो दिन बाद डॉ. प्रणव ने फोन कर उसे अपने घर बुलाया। सतीश ने जाने में असमर्थता जताई तो उसे लाने के लिए गाडी भेज दी। वह उसके घर पहुंचा तो वहां मनोरमा के दोनों बेटे प्रणव और अमित, बहू प्रिया कुमार, दामाद, जिला परिषद नाजिर का राकेश यादव, जिला नजारत नाजिर का अमरेंद्र यादव, सृजन का ऑडिटर पीके घोष और भाजपा नेता विपिन शर्मा पहले से मौजूद थे।

प्रणव ने सतीश झा से पूछा कि सृजन का पैसा कहां-कहां लगा है? सतीश ने कहा कि मुझे इसकी जानकारी नहीं है। बैंकों में जाकर इन पैसों का पता लगाना होगा। इस पर वहां मौजूद लोग चुप रहे, लेकिन पीके घोष ने कहा कि बैंक जाकर रुपये की जानकारी लेना जल्दबाजी में संभव नहीं होगा। अगर हमलोग नाजिर अमरेंद्र को पचास लाख रुपए व्यवस्था कर दें तो वह दो करोड़ के फंड की व्यवस्था कर देगा। इन पैसों से तुरंत समस्या का समाधान हो जाएगा। सतीश ने वहां मौजूद लोगों ने कहा, आप लोग दलदल में लगातार फंसते जा रहे हैं।

सतीश के मुताबिक, वह सहकारिता विभाग के तहत निबंधक सहयोग समितियां के अधीन ऑडिटर संवर्ग में कार्यरत था और 31 जनवरी 2016 को भागलपुर पदस्थापन के दौरान वर्ष 2000 से 2003 तक के सृजन संस्था का ऑडिट करने का दायित्व मिला था। इसी दौरान मनोरमा से जान-पहचान हुई।

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