मिलिए उस शख्स से जिसने कैंसर को छह बार हराया

मिलिए उस शख्स से जिसने कैंसर को छह बार हराया

छह बार कैंसर को हराने के बाद जीवन कैसा महसूस होता है? पांच रेडीएशन चक्र और कीमोथेरेपी के तीन चक्रों के बाद शरीर कैसा महसूस करता है? कहानी बताने के लिए बहुत से लोग जीवित नहीं हैं, लेकिन 67 वर्षीय नरेंद्र कुमार चौधरी के पास है, रियल एस्टेट के क्षेत्र में बड़ा नाम रहे नरेंद्र को सबसे पहले 2005 में मुंह का कैंसर हुआ। अगले 13 साल में पांच और बार उन्हें इस खतरनाक बीमारी से गुजरना पड़ा। नरेंद्र सिगरेट पीने के आदी थे। सिगरेट छोड़ने के करीब सात साल बाद उन्हें यह कैंसर हुआ। कैंसर के इलाज की प्रक्रिया (सर्जरी) में अब सिर्फ उनकी आधी जीभ बची है। इतना ही नहीं उन्हें बायां जबड़ा और ठुड्डे का हिस्सा भी गंवाना पड़ा है। वह अपने सर्जिकल रूप से पुनर्निर्मित चेहरे पर मास्क पहनता है; उसकी नाक में एक ट्यूब है जिसके माध्यम से वह हर सुबह भोजन करता है और प्राणायाम करता है। वह संवाद करने के लिए हर जगह नोटपैड और पेन ले जाता है। उनकी पत्नी, गंगा, हालांकि, गले से निकलने वाली आवाज़ों, उनकी ताली और बुनियादी हाथों के संकेतों को समझ सकती हैं।

लंबे दुःस्वप्न की शुरुआत उनकी जीभ पर एक छोटे से काले धब्बे के साथ हुई। बीकानेर में अपने फार्महाउस से बोलते हुए गंगा याद करती हैं जहाँ वे दिल्ली के प्रदूषण से दूर जाने के लिए स्थानांतरित हुए थे “हम कुछ दिनों के लिए उस पर ग्लिसरीन डालते थे, लेकिन यह बड़ा हो गया और खून बहने लगा। जब हमने इसकी जाँच की, तो यह एक घातक वृद्धि थी”। 2005 में संचालित होने के बाद (उनकी जीभ का आधा हिस्सा हटाया जाना था), चौधरी दो साल तक कैंसर से मुक्त रहे। फिर 2007 में, उन्होंने अपने दाहिने टॉन्सिल पर विकास किया। “यह शायद हमारे लिए सबसे कठिन समय था। बीमारी को वापस देखने के लिए, “गंगा कहती हैं, जो पिछले महीने दिल्ली सरकार के स्कूल शिक्षक के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे। “मुझे बहादुर बनना पड़ा। अन्यथा, मैं उससे बहादुर होने की उम्मीद कैसे कर सकता था? ”

सर्जरी के बाद अपने चेहरे को ढकने के लिए नरेंद्र मास्क लगाते हैं। उनकी नाक में एक ट्यूब लगा है, जिसके जरिए हर सुबह वह भोजन करते हैं। शरीर और मन स्वस्थ रहे इसके लिए डॉक्टरों ने उन्हें योगासन करने की भी सलाह दी है। 6 बार कैंसर को मात देने वाले नरेंद्र की जिंदगी इतनी आसान नहीं है। मुंह के कैंसर के इलाज के बाद अब ना तो उनसे ठीक से बोला जाता है और ना ही आराम से खाना- पीना कर पाते हैं। कहीं बाहर जाते हैं तो एक नोटपैड हमेशा साथ रखते हैं ताकि किसी को अपनी बात बता सकें, समझा सकें। हालांकि साथ रहने के कारण उनकी पत्नी जरूर उनके गले की आवाज या किसी भी तरह के संकेत को आसानी से समझ जाती हैं।

नरेंद्र बताते हैं कि इस खतरनाक बीमारी की शुरुआत जीभ पर दिखे एक काले धब्बे से हुई। नरेंद्र ने कहा, जब इस दाग को मैंने देखा तो सिहर गया। कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि ग्लिसरीन रखने से यह दूर हो जाएगा। मैंने ऐसा ही किया लेकिन यह कम होने की जगह और बढ़ गया। बीकानेर में अपने फॉर्म हाउस पर हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में नरेंद्र ने कहा, हमें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह छोटा सा धब्बा मेरी जिंदगी में इतना बड़ा भूचाल लाने वाला है। दिल्ली के प्रदूषण से खुद को दूर रखने के लिए ही नरेंद्र अब यहीं बीकानेर में अपने फॉर्म हाउस में रहते हैं।

2005 में ऑपरेशन के बाद दो साल तक नरेंद्र कैंसर मुक्त रहे। 2007 में उन्हें दाहिने टांसिल पर उन्हें कुछ गांठ सा महसूस हुआ। यह बहुत कठिन समय था, जब मेरे डॉक्टर ने मुझे बताया कि कैंसर ने फिर अटैक किया है। वर्ष 2010 में एक बार फिर जब कैंसर के बारे में पता चला तो एक पल के लिए तो नरेंद्र अपनी जिंदगी को खत्म समझ बैठे थे। पर, उन्होंने हौसला नहीं हारा और सोचा कि अब तो यह लड़ाई और मजबूती से लड़नी है।

2018 में छठवीं बार कैंसर हुआ तो सब टूट गए
2014 में चौधरी को एक बार फिर कैंसर से दो-चार होना पड़ा। 2014 में जबड़े में कैंसर का पता चला और डॉक्टरों को बायां जबड़ा निकालना पड़ा। इसके बाद 2017 और 2018 में भी कैंसर ने फिर अटैक किया। इस बार उनकी ठुड्डी निकालनी पड़ी और कीमोथेरेपी दी गई। चौधरी की पत्नी गंगा कहती हैं, ‘2018 में जब छठवीं बार कैंसर के बारे में पता चला तो हम सबका तो हौसला टूट सा गया। हालांकि नरेंद्र अंदर से मजबूत हैं। पर, वह भी परेशान होकर बोले कि यह अंतिम बार है। आगे ऐसा हुआ तो मैं अब इलाज नहीं कराऊंगा।’

गंगा के मुताबिक फिलहाल पिछले 9 महीने से सबकुछ ठीक है। छठवीं बार कैंसर के इलाज के बाद से अब तक वह पूरी तरह स्वस्थ हैं। अपनी जिंदगी को अब खूबसूरत बनाने के लिए नरेंद्र अलग-अलग तरह से खुद को व्यवस्त रखने की कोशिश करते हैं। कभी पत्नी गंगा के साथ बाहर घूमने जाते हैं तो कभी घर में लगे पेड़-पौधों की सफाई करते हैं। क्रिकेट और नई फिल्में देखने के अपने पुराने शौक को भी नरेंद्र ने अब जिंदा कर लिया है। उनकी कोशिश और सबके लिए सबक बस यही है कि जब तक रहो, बिंदास जीते रहो।

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