गोरखपुर : तीन दशक तक भाजपा के अभेद्य गढ़ ‘गोरखपुर’ को विपक्ष ने ध्वस्त किया

गोरखपुर : तीन दशक तक भाजपा के अभेद्य गढ़ ‘गोरखपुर’ को विपक्ष ने ध्वस्त किया

भाजपा ने वर्ष 2014 का चुनाव मोदी लहर के साथ लड़ा था लेकिन हाल के उपचुनाव में कोई लहर नहीं थी जिससे भाजपा को नुकसान और विपक्ष ने यूपी और बिहार में उपचुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल कर सभी को हैरान कर दिया है। राजस्थान में असफलता के बाद पूर्वोत्तर में की जीत के बाद लगभग तीन दशक तक भाजपा का गढ़ और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर ढह गया है, जिसने उन्हें पांच बार लोकसभा के लिए सांसद चुना है।

गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें भाजपा लाखों मतों से जीती थी लेकिन उपचुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा। बिहार के संसदीय उपचुनाव में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। इन नवीनतम चुनावों के फैसले महत्वपूर्ण हैं। गोरखपुर सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का लम्बे समय से कब्ज़ा था। फूलपुर सीट पर उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पिछली बार भारी मतों से विजयी हुए थे।

गोरखपुर और फूलपुर के मुकाबले बिहार की अररिया लोकसभा सीट और जहानाबाद एवं भभुआ विधानसभा सीट के नतीजे भाजपा और साथ ही जदयू के लिए इस कारण कहीं कम आघातकारी हैं। बिहार में लालू प्रसाद को जेल भेज दिया गया जिससे विपक्ष फिर से संगठित हो गया।

सपा-बसपा को महसूस हो गया है कि अगर वे राम लहर को रोकने वाले 1993 के मुलायम-कांशीराम गठबंधन को याद करेंगी तो भाजपा का मुकाबला कर सकती हैं।
उत्तर प्रदेश में लोगों से किये गए नौकरियों और अन्य वादों को पूरा करने में सरकार ने कोई प्रगति नहीं की। योगी आदित्यनाथ सरकार ने गलतियों को गहरा कर दिया और जाति और धार्मिक असंतोष पैदा किया।

क्या भाजपा ऐसी सद्भावना को हटाना चाहती है जो धार्मिक विभाजनों को नहीं तो जाति को पार करना चाहे, और जिसने 2014 में और फिर फिर 2017 में यूपी को दबाने में मदद की? राज्य और केंद्र में भाजपा ने 2014 और 2017 के चुनाव नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़े गए थे। विपक्ष के लिए उपचुनाव के परिणाम से भविष्य का मार्ग तय करेंगे जो लंबा रास्ता है।

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