मिर्ज़ा शिबली बेग का ब्लॉग- ‘राब्ता आलमे इस्लामी का असाधारण क़दम’

   

राब्ता आलमे इस्लामी के सेक्रेट्री जनरल डॉक्टर मोहम्मद बिन अब्दुल करीम अल ईसा के नेतृत्व में मुसलमानों के एक प्रतिनिधि मंडल ने होलोकास्ट के स्मारक ऑशविट्ज़ का दौरा किया।

 

राब्ता आलमे इस्लामी के जनरल सेक्रेटरी ने यह दौरा ‘अमरीकन जीविश कमेटी’ के सी ई ओ डेविड हैरिस के सानिध्य में किया।ऑशविट्ज़ प्रताड़ना कैंप का दौरा 23 जनवरी 2019 की तारीख में किया गया।

 

जिसमें 62 सदस्यों के प्रतिनिधि मंडल ने ‘राब्ता आलमे इस्लामी’ के सेक्रेट्री जनरल डॉक्टर मोहम्मद बिन अब्दुल करीम अल ईसा की अगुवाई में किया। इसमें 28 देशों से बुलाए गए मुस्लिम धार्मिक , सामाजिक व्यक्ति थे। इनमें 25 विख्यात उलेमा थे।

 

ऑशविट्ज़ नाजी़ जर्मनी के समय का वह प्रताड़ना कैंप है जहां बड़ी संख्या में यहूदियों को प्रताड़ना देकर उनकी हत्या की गई । यह पोलैंड में स्थित है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय नाजी़ सेनाओं द्वारा यहूदियों पर ढाए गए अत्याचार और नरसंहार को होलोकास्ट कहते हैं ऑशविटज़ इसी होलोकास्ट का एक स्मारक है। जो विश्व भर में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों पर ढाए गए जर्मन सेना द्वारा अत्याचार का एक प्रतीक है । जिसका यहूदियों में बड़ा महत्व है।

 

आज 27 जनवरी के दिन पचहत्तर वर्ष पूर्व रूसी सेना द्वारा इसे आज़ाद कराया गया था। जिसकी याद में इज़राइल में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं । तथा यूरोप में भी विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया हैं । दुनिया भर के यहूदी प्रताड़ना कैंप में मारे गए यहूदियों को याद कर रहे हैं ।

राब्ता आलमे इस्लामी के 62 सदस्यों के प्रतिनिधि मंडल के साथ ‘अमरीकन जीविश कमेटी’ के 24 उच्च अधिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल भी साथ था ।

 

‘राब्ता आलमे इस्लामी’ के सेक्रेट्री जनरल और ‘अमरीकन जीविश कमेटी’ के बीच एक ‘सहमति पत्र’ पर हस्ताक्षर किए गए । जिसके अनुसार दोनों संगठन मिलकर कार्य करेंगे । इसी ‘सहमति पत्र’ की अगली कड़ी के रूप में ‘अमरीकन जीविश कमेटी’ के निमंत्रण पर ‘राब्ता आलमे इस्लामी’ के सेक्रेट्री जनरल ने विश्व मुस्लिम समुदाय के प्रसिद्ध एवं प्रबुद्ध सदस्यों पर आधारित प्रतिनिधिमंडल के साथ और ऑशविटज़ कैंप का दौरा किया

‘सहमति पत्र’ पर हस्ताक्षर ‘अमरीकन जीविश कमेटी’ के न्यूयॉर्क स्थित हेड क्वार्टर पर 30 अप्रैल 2019 को किए गए ।

ऑशविटज़ स्मारक स्थल से लौटने के बाद ‘राब्ता आलमे इस्लामी’ के प्रतिनिधि मंडल ने वारसॉ स्थित नाज़ेक साइनागॉग के एक विशेष कार्यक्रम में भी भाग लिया । कार्यक्रम के बाद प्रतिनिधि मंडल ने यहूदियों का ‘शब्बात’ रात्रि भोज किया ।

‘राब्ता आलमे इस्लामी’ मुस्लिम जगत की अति प्रसिद्ध एवं प्रतिष्ठित मुस्लिम संस्था है। जिसके संस्थापक सदस्य मौलाना मौदूदी और मौलाना अबुल हसन अली नदवी जैसे विख्यात इस्लामी विद्वान थे । इसका मुख्यालय सऊदी अरब में स्थित पवित्र मक्का में है। इसके सदस्य विभिन्न देशो के इस्लामी विद्वान व्यक्तियों को बनाया जाता है वर्तमान में इसके सदस्य पाकिस्तान के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान मौलाना तकी़ उस्मानी और भारत में मौलाना सैयद राबे हसनी नदवी आदि हैं ।

 

‘राब्ता आलम इस्लामी के सेक्रेट्री जनरल डॉक्टर मोहम्मद बिन अब्दुल करीम अल ईसा सऊदी शाही परिवार के क़रीबी व्यक्ति हैं जो 5 वर्षों तक सऊदी अरब के न्याय मंत्री भी रह चुके हैं ।ने ‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ को साल के मध्य में सऊदी अरब दौरे का न्योता दिया

 

‘अमेरिकन जीवेश कमेटी’ की स्थापना 11 नवंबर 1906 को वाशिंगटन के डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया में की गई इसके संस्थापक सदस्य अपने समय के प्रसिद्ध यहूदी पूंजीपति , विद्वान, साहित्यकार, जज , राजनीतिज्ञ , पत्रकार ,का़नूनविद , समाज विज्ञानी , सामाजिक कार्यकर्ता एवं महत्वपूर्ण धार्मिक महत्व रखने वाली व्यक्तियों ने किया ।

‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ का उद्देश यहूदियों के हित के लिए कार्य करना है

‘अमेरिकन जीवेश कमेटी’ के विश्व भर में कार्यालय हैं । संसार के 35 देशों में यहूदियों की प्रतिनिधि संस्थाएं स्थापित की गई जो अपने देशों में यहूदी समुदाय की प्रतिनिधि संस्थाएं समझी जाती है इसका वास्तविक वार्षिक बजट सैकड़ों करोड़ रुपए में है ।

 

‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ और अमेरिका की प्रसिद्ध इस्लामी संस्था ‘इस्लामिक सोसाइटी आफ नॉर्थ अमेरिका’ ने मिलकर 2016 में मुसलमान और यहूदी विरोधी भावनाओं का सामना करने के लिए मुस्लिम-जीविश एडवाइज़री काउंसिल की स्थापना की है ।

‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ ने अपने बाल्य काल में प्रसिद्ध अरबपति हेनरी फोर्ड की पुस्तक ‘दि इंटरनेशनल ज्यूज़- द वर्ड्स फोरमोस्ट प्रॉब्लम’ पर प्रतिबंध लगावाया । तथा पुस्तक की कॉपियों को ज़ब्त करवाया । पुस्तक अमेरिकी सत्ता एवं समाज में यहूदियों की अपराधिक छवि को दर्शाती थी। कमेटी द्वारा हेनरी फोर्ड को विवश किया गया । की वह यहूदी समुदाय से माफी मांगे ।

 

1950 की दहाई में ‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ के अध्यक्ष जॉब ब्लॉक स्टैंड और इज़राइली प्रधानमंत्री डेविड बिन गोरियान के बीच बहुत क़रीबी संबंध थे ।

‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ अपने आप को ज़ायनिस्ट नहीं मानती । लेकिन इज़राइल की स्थापना की पक्षधर थी। और स्थापना के अवसर पर इसने नवगठित देश की हर संभव सहायता की ।

‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ अमेरिका की पहली संस्था थी जिसने इज़राइल में अपना कार्यालय खोला और इज़राइल के लिए भी पहली ऐसी संस्था थी जिसने वहां अपना कार्यालय खोला ।

 

संयुक्त राष्ट्र में ‘ज़ायनिज़्म नस्लवाद है’ का एक प्रस्ताव आया था इस प्रस्ताव के विरुद्ध ‘अमरीकन जीविश कमेटी’ ने मुहिम चलाई लॉबिंग की जिसके फलस्वरूप यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में पारित नहीं हो सका ।

 

सोवियत यूनियन में यहूदी नागरिकों को देश छोड़कर इज़राइल में बसने की अनुमति नहीं थी । लेकिन ‘अमेरिकन जीविश काउंसिल’ के अभूतपूर्व प्रयासों के बाद ही संभव हो सका ।

 

विश्व का सबसे बड़ा ‘जीविश फिल्म फेस्टिवल’ जोकि अमेरिका के अटलांटा में होता है । उसका आयोजन प्रथम बार ‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ द्वारा किया गया ।

 

ईरान के परमाणु कार्यक्रम के विरुद्ध यूरोप और अमेरिका में ‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ में लॉबिंग की और व्याख्यान करवाए ।

 

यूरोपीय यूनियन द्वारा लेबनान के हिज़्बुल्लाह को आतंकवादी संगठन घोषित किया गया । इसके पीछे ‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ के प्रयासों का बड़ा दख़ल था ।

 

इज़राइल में फिलिस्तीनीयों की ज़मीन पर बलपूर्वक क़ब्ज़ा कर बनाई गई नई यहूदी बस्तियों में स्थित उत्पादन इकाइयों के उत्पाद का यूरोप की मंडियों में बहिष्कार किया गया। इस बहिष्कार को नाकाम बनाने के लिए ‘अमेरिकन जेविश कमेटी’ ने यूरोप में अपने प्रभावों का इस्तेमाल किया ।

 

‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ के खुले प्रयासों और इज़राइल की ‘इंस्टीट्यूट’ के छुपे प्रयासों द्वारा वेटिकन पर दबाव बनाया गया कि कैथोलिक ईसाई , यहूदियों के प्रति अपने पारंपरिक दृष्टिकोण में बदलाव लाएं । इसमें यह सफल रहे । वेटिकन द्वारा 1965 में ‘नोसत्रा ऐटेट’ जारी किया गया । जिसमें इसाई इतिहास में पहली बार अधिकारिक रूप से यहूदियों से संवाद स्थापित किया गया । तथा इसके लिए वेटिकन में एक अलग सचिवालय का गठन किया गया ।

 

‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ और ‘इंस्टीट्यूट’ के प्रयासों के आगे विवश होकर वेटिकन के संप्रभु पोप पॉल षष्ठम ने अभूतपूर्व, असाधारण, ऐतिहासिक निर्णय लिया।

 

ईसाइयत के आरंभ काल से चली आ रही परंपरा जिसके अनुसार ईसाइयों के धार्मिक प्रार्थना के अवसर पर यहूदियों पर लानत भेजी जाती थी क्योंकि ईसाइयों के अनुसार ईसा मसीह को यहूदियों द्वारा प्रताड़ित कर सूली पर चढ़ाया गया था। वेटिकन के पोप पाल षष्ठम द्वारा इस प्राचीन परंपरा को समाप्त करने की घोषणा की गई ।तथा धार्मिक प्रार्थना के समय पढ़े जाने वाले यहूदियों पर लानत के शब्दों को निकाल दिया गया ।

 

अब देखना यह है कि ‘अमेरिकन जीविश कमेटी’ और मक्का स्थित ‘राब्ता आलमे इस्लामी’ का पारस्परिक संबंध और निकटता मुसलमानों के वेटिकन पर क्या प्रभाव डालते हैं ?

 

लेखक- मिर्ज़ा शिबली बेग