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क्या हुआ, तेरा वादा: हर साल एक करोड़ रोजगार के वादे की हकीकत

केंद्र की एनडीए सरकार का तीन चौथाई वक्त बीत चुका है। जल्द ही इस सरकार का अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर जनता के दरबार में जाना होगा। नरेंद्र मोदी जब 2014 के चुनाव में मैदान में उतरे थे तो उन्होंने खूबसूरत नारों, वन लाइनर, जुमलों और वादों की झड़ी लगा दी थी। अब वक्त है उन वादों को हकीकत के आईने में देखने का। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, हर शख्स के लिए मकान, 200 नए स्मार्ट सिटी और हर साल एक करोड़ रोजगार देने जैसे वादों को जमीनी हकीकत की कसौटी पर कसने का। सबरंगइंडिया की पड़ताल की पहली कड़ी में पेश है हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने के वादे की हकीकत।

साल 2013। आगरा में नरेंद्र मोदी की रैली। बेजीपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी यूपीए-2 के कथित भ्रष्टाचार और पॉलिसी पैरालिसिस का जिक्र करते हैं और कहते हैं कि देश की 65 फीसदी आबादी की उम्र 35 फीसदी से कम है। यूपीए सरकार ने इन नौजवानों के लिए हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा किया लेकिन इसे पूरा करने में बुरी तरह नाकाम रही। अगर केंद्र में बीजेपी की सरकार आई तो हम हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करेंगे।

वोटरों को मोदी के लंबे-चौड़े वादों ने बेहद प्रभावित किया। यूपीए-2 सरकार के आखिरी दिनों में भ्रष्टाचार के मामले उछलने, विकास दर में कमी और नीतिगत फैसले लेने में देरी के माहौल की वजह से जनता निराश थी. मोदी के वादों में उन्हें एक उम्मीद नजर आई।

2014 के चुनावों में बीजेपी को इस उम्मीद में बहुमत मिला कि आने वाली सरकार अर्थव्यवस्था को बीजेपी पटरी पर ले आएगी। आर्थिक विकास दर को नई रफ्तार मिलेगी और देश में रोजगार में काफी इजाफा होगा। वोटर यूपीए-1 के दौर के तेज आर्थिक विकास दर की उम्मीद कर रहे थे। हालांकि यूपीए-2 सरकार की आखिरी तिमाही में भी आर्थिक विकास दर 5.7 फीसदी रही थी। योजना आयोग को खत्म कर बनाए गए नीति आयोग ने भी माना कि जीडीपी की गणना के लिए तैयार की गई नई सीरीज के मुताबिक भी यूपीए-2 के आखिरी दो साल में आर्थिक विकास दर क्रमशः 5.6 और 6.6 फीसदी रही थी।

यूपीए शासन के उस दौर में, रोजगार में जिस तेजी से बढ़ोतरी होनी थी वह नहीं हो रही थी। इसके लिए 2008 का सबप्राइम संकट काफी हद तक जिम्मेदार था। इस संकट की वजह से अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार ध्वस्त हो गया था और इसने ग्लोबल आर्थिक विकास दर को रोक दिया था। इस अभूतपूर्व संकट का असर पूरी दुनिया की तरह भारत पर भी पड़ा और इसकी भी आर्थिक विकास दर धीमी हो गई।

यूपीए-1 के वक्त लगभग 9 फीसदी की दर को छू लेने वाली आर्थिक विकास दर अचानक नीचे लुढ़कने लगी। हालांकि यूपीए-2 के दौरान कांग्रेस सरकार और आरबीआई ने मिल कर बखूबी इस हालात का सामना किया और राहत पैकेजों और ब्याज दरों में कटौती के जरिये घरेलू बाजार में आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार बरकरार रखने की कोशिश की।

बीजेपी ने ग्लोबल आर्थिक संकट की वजह से घरेलू अर्थव्यवस्था में पैदा हुए संकट और कांग्रेस सरकार की ओर से आखिरी दिनों में फैसले लेने में नाकामी को भुनाना शुरू किया। 2014 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान उसने बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा बनाया। नरेंद्र मोदी ने अपनी जनसभाओं में बीजेपी के सत्ता में आने पर हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा किया।

आखिर बीजेपी किस आधार पर हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा कर रही थी? क्या उसके अंदर आर्थिक विकास दर को पूरी रफ्तार देने का भरोसा था या फिर वह तत्कालीन ग्लोबल और घरेलू आर्थिक हालातों का गलत आकलन कर रही थी?बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में साफ कहा कि देश कांग्रेस नीत यूपीए सरकार द्वारा 10 सालों से रोजगारविहीन विकास में घसीटा जा रहा है। व्यापक आर्थिक पुनरुत्थान के तहत भाजपा रोजगार सृजन और उद्यमिता के अवसरों को उच्च प्राथमिकता का वादा करती है।

2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने काम करना शुरू किया तो उसे रोजगार में इजाफा करना आसान काम लग रहा था। सरकार ने एक के बाद एक कई महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों की घोषणा की। इनमें मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, स्मार्ट सिटी मिशन, स्वच्छ भारत मिशन, गंगा सफाई के लिए नमामि गंगा मिशन जैसे बड़े कार्यक्रम शामिल थे।

किसानों की आय दोगुना करने और इन्फ्रास्ट्रक्चर में बड़े निवेश का ऐलान किया गया। भारत को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने का ऐलान किया गया। पहले साल इज ऑफ डुइंग बिजनेस इंडेक्स रैंकिंग में शीर्ष 50 देशों में लाने का वादा किया गया।

बुरे दौर की शुरुआत 
लेकिन इन सारी योजनाओं को बहुत कम सफलता मिली और तीन साल बीतते-बीतते देश में हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने के वादे और इरादे बुरी तरह नाकाम होते दिखने लगे। बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के पीएम नरेंद्र मोदी ने 2013 और 2014 के शुरुआती महीनों की चुनावी रैलियों और सभाओं में यूपीए-2 में रोजगारविहीन ग्रोथ को कोसा था।

अब मोदी सरकार दोहरे संकट में फंसी गई है। न तो आर्थिक विकास दर में बढ़ोतरी हो रही है और न ही रोजगार में इजाफा। जीडीपी गणना की नई सीरीज के मुताबिक आर्थिक विकास दर घट कर 5.7 फीसदी पर पहुंच चुकी है और बीजेपी के ही पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के मुताबिक मानना है कि यह वास्तव में 3.7 फीसदी के हिंदू ग्रोथ रेट पर पहुंच चुकी है। 27  सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिख कर उन्होंने सरकार को हिला दिया। इस लेख में उन्होंने लिखा कि नोटबंदी और जीएसटी की वजह से लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं।

हालांकि यह बात किसी से छिपी नहीं है कि एक तो मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां काम नहीं कर रही हैं और उस पर उन्होंने कथित ब्लैक मनी को वापस लाने के नाम पर नोटबंदी लागू कर अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर दिया। नोटबंदी से अर्थव्यवस्था अभी उबरी भी नहीं थी कि एक देश, एक टैक्स का नारा देते हुए जीएसटी को इस बुरे तरीके से लागू किया कि इकोनॉमी को रफ्तार मिलने की बची-खुची उम्मीदें भी जाती रहीं।

सरकार के इन कदमों से औद्योगिक उत्पादन में भारी गिरावट आ गई। जुलाई 2017 में औद्योगिक उत्पादन में सिर्फ 1.2 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी दर्ज की गई। मैन्यूफैक्चरिंग ग्रोथ का हाल बताने वाला परचेजिंग मैनेजर इंडेकस यानी पीएमआई जुलाई 2017 में आठ साल के न्यूनतम स्तर यानी 47.5 पर पहुंच गया। इस गिरावट में जीएसटी का बड़ा हाथ रहा। इसकी जटिलता और अस्पष्टता की वजह से उद्योग ने अपनी गतिविधियां रोक दी हैं।

सवा तीन साल बीत जाने के बाद रोजगार सृजन के मोर्चे पर मोदी सरकार अब बिल्कुल पस्त दिखाई दे रही है। यह एनडीए-2 सरकार की सबसे बड़ी नाकामी मानी जा रही है। 

रोजगार में भारी गिरावट का दौर 
देश में इस वक्त हर साल 1.30 करोड़ से 1.50 करोड़ युवा जॉब मार्केट में आ जाते हैं। जमीनी स्थिति यह है कि यूपीए-2 के वक्त से ही रोजगार सृजन की रफ्तार में गिरावट का दौर शुरू हो चुका था। लेबर ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार में इसमें भारी गिरावट आ चुकी है और अब औसतन हर सालसिर्फ 3.4 लाख रोजगार पैदा हो रहा है। यह यूपीए-2 सरकार (2009-2014) तक की अवधि में रोजगार सृजन की दर से आधी है।

मोदी सरकार की ओर से तीन साल में जितना रोजगार पैदा किया गया है, उतना रोजगार यूपीए-2 सरकार के दौरान एक साल में पैदा हो रहा था। हालांकि टेक्सटाइल, आईटी- बीपीओ सेक्टर ने पिछले तीन साल के दौरान अच्छा प्रदर्शन किया है (वैसे ऑटोमेशन, अमेरिका और यूरोप में संरक्षणवादी नीतियों और आईटी-बीपीओ सेक्टर की अंदरुनी दिक्कतों की वजह से यहां भी रोजगार में माकूल इजाफा नहीं हो रहा है। कंपनियों में छंटनी बढ़ गई है) लेकिन एनडीए-2 सरकार में लेदर, ऑटोमोबाइल, जेम्स एंड ज्वैलरी, परिवहन, खनन और हैंडलूम, पावरलूम सेक्टर में रोजगार सृजन की दर लगातार घट रही है। 2015 में टेक्सटाइल सेक्टर में रोजगार सृजन की रफ्तार में तेजी आई थी लेकिन नोटबंदी के बाद यहां बेहद तेजी से रोजगार घटा है।लेबर ब्यूरो के रोजगार और बेरोजगारी के पांचवें वार्षिक सर्वे के मुताबिक बेरोजगारी पांच फीसदी की दर से बढ़ रही है। जुलाई से सितंबर, 2015 में रोजगार में सिर्फ 1.34 फीसदी की बढ़ोतरी हुई ।

हकीकत बयां करते आंकड़े 
श्रम और रोजगार मंत्रालय जिस नई सीरीज के तहत तिमाही रोजगार सर्वे कराता है, उसकेमुताबिक जनवरी से मार्च 2017 में इसकी पिछली तिमाही के तुलना में सिर्फ 1.23 लाख रोजगार बढ़े हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कंस्ट्रक्शन सेक्टर में रोजगार घट गए। यह सीधे तौर पर नोटबंदी का असर था। बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार देने वाला कंस्ट्रक्शन सेक्टर में नकदी की कमी की वजह भारी बेरोजगारी पैदा हुई। शहरों में कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करने के लिए आए लोगों की भारी तादाद में अपने गांवों की ओर लौटना पड़ा।

मौजूदा मोदी सरकार के शासन में अगर हर तिमाही में 1.23 लाख रोजगार पैदा होते रहे तो एक करोड़ रोजगार पैदा करने में 28 से 30 साल लग जाएंगे। 

नौकरियों पर नोटबंदी की गाज  
पिछले साल 8 नवंबर ( 8 नवंबर 2016) में नरेंद्र मोदी सरकार ने देश में काले धन को खत्म करने, टेरर फंडिंग को नेस्तनाबूद करने और नकली नोटों के प्रसार पर रोक लगाने के लिए 500 और 1000 के पुराने नोट बंद करने का ऐलान किया था। सरकार के इस फैसले पूरे देश में हाहाकार मच गया था। अर्थव्यवस्था को सरकार से इस कदम से करारी चोट पहुंची और इसका सबसे ज्यादा असर लोगों के रोजगार पर पड़ा।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी यानी सीएमआईई की जुलाई में जारी रिपोर्ट में कहा गया कि जनवरी-अप्रैल, 2017 में इसके पिछले चार महीने यानी सितंबर से दिसंबर 2016 की तुलना में 15 लाख नौकरियां कम हो गईं। सितंबर से दिसंबर 2016 के दौरान देश में कुल रोजगार का 40 करोड़ 65  लाख रोजगार था लेकिन जनवरी से अप्रैल 2017 में रोजगार की संख्या घट कर 40 करोड़ 50 लाख रह गए।

सीएमआईई ने बताया कि कुल 1,61,167 घरों के सर्वे किए गए और लगभग 5,19,285 वयस्कों से बात की गई। यह सर्वे जनवरी से अप्रैल 2017 के दौरान किए गए। यह नोटबंदी के बाद का एक पूरा चक्र समाप्त होने का समय था। यह सर्वे पूरी तरह रोजगार पर नोटबंदी के असर को दिखा रहा था। सर्वे में साफ कहा गया है कि जनवरी से अप्रैल, 2017 के बीच रोजगार बाजार में आने वाले (चौदह साल से ऊपर के व्यक्ति) लोगों की तादाद 97 लाख बढ़ कर 96 करोड़ हो गई लेकिन रोजगार पाने वालों की तादाद नहीं बढ़ी। इसमें गिरावट आई। इसका मतलब यह है कि रोजगार चाहने वालों की तादाद बढ़ी।
नोटबंदी की सबसे ज्यादा मार अनौपचारिक सेक्टरके रोजगार पर पड़ी। इस सेक्टर के विभिन्न उद्योगों में काम कर रहे हजारों लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा। बड़ी तादाद में मजदूर घर लौटे और उन्हें रोजगार के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं का सहारा लेना पड़ा।

निर्यात सेक्टर के रोजगार पर असर
मोदी सरकार के दौरान पिछले तीन साल से निर्यात सेक्टर भारी संकट में है। पिछले 33 महीनों में से 22 महीनों को दौरान निर्यात में गिरावट दर्ज की गई है। दरअसल भारतीय निर्यात में जेम्स ज्वैलरी, लेदर और टेक्सटाइल की बड़ी हिस्सेदारी है। नोटबंदी की वजह से इन तीनों सेक्टरों की हालत और खराब हो गई। ये सेक्टर रोजगार सघन हैं। यानी इनमें बड़ी तादाद में लोगों का रोजगार मिलता है। नोटबंदी की वजह से इन उद्योगों की हालत खराब होने से मजदूरों को बड़े पैमाने से रोजगार से हाथ धोना पड़ा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के फुटवियर और वस्त्र निर्यात की हिस्सेदारी में लगातार गिरावट आई है।

पशुवध निरोधक कानून की मार 
इस साल गोरक्षा के नाम पर यूपी समेत पूरे देश के बूचड़खानों में पशु वध पर रोक लगा दी गई। यह सब पर्यावरण संरक्षण कानून के तहत किया गया। इससे देखते ही देखते चमड़े और मांस आधारित उद्योगों में खलबली मचा दी। मीट दुकानों और बूचड़खानों के लिए लाइसेंस लेने की अनिवार्यता ने मीट और लेदर उद्योग की कमर तोड़ दी। लेदर उद्योग के लिए प्रसिद्ध कानपुर में कई टैनरियों को आरएसएस और बीजेपी कार्यकर्ताओं के दबाव में बंद करना पड़ा।

इसका सबसे ज्यादा असर दलितों और मुसलमानों के रोजगार पर पड़ा, जिनकी बड़ी आबादी इस उद्योग से जुड़ी है। इस कानून से दलितों में रोजगार की स्थिति और खराब हुई है। पहले ही उनमें बेरोजगारी अन्य समुदायों की तुलना में ज्यादा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक अनुसूचित जाति-जनजाति में बेरोजगारी की दर 18 फीसदी, जबकि आम आबादी में यह दर 14 फीसदी है।

सरकार ने खुद अपने आर्थिक दस्तावेजों में मानना है कि रोजगार की दृष्टि से टेक्सटाइल और लेदर उद्योग काफी महत्व रखते हैं। टेक्सटाइल सेक्टर के छोटे और मझोली कंपनियों के लिए सरकार की योजनाएं बड़े लचर ढंग से चल रही हैं। 2016 में शुरू हुई प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना के तहत टेक्सटाइल सेक्टर में भर्तियां बढ़ाने के लिए सरकार ने कर्मचारियों के ईपीएस योजना में कंपनियों के योगदान में 8.33 और ईपीएफ में 3.67 फीसदी अपनी ओर देने का फैसला किया। लेकिन अभी तक यह वादा पूरा नहीं हुआ है। तिरुपुर में अब तक 160 यूनिटों ने इस योजना के लिए आवेदन किया है लेकिन यह योजना अभी शुरू नहीं हो पाई है। इस तरह की नीतियों से रोजगार कैसे बढ़ेगा। और एक करोड़ रोजगार देने का मंसूबा कैसे पूरा होगा।

नोटबंदी के बाद जीएसटी का आतंक 
श्रम बाजार पर नोटबंदी की करारी चोट के बाद सरकार को जीएसटी के मोर्चे पर हड़बड़ी न दिखाए जाने की सलाह दी गई थी। लेकिन जिद पर अड़ी सरकार ने 1 जुलाई को एक देश, एक टैक्स के नाम पर इसे लागू कर दिया। लेकिन इसका असर यह हुआ कि इसने रही-सही औद्योगिक गतिविधियो को भी ठप कर दिया। इसका असर आर्थिक विकास दर पर साफ दिखा और यह घट कर 5.7 फीसदी हो गई। लगातार कई रेटिंग एजेंसियों ने विकास दर कम करने का अनुमान लगाया। हाल में तीन रेटिंग एजेंसियों में से एक फिच रेटिंग ने भी वार्षिक विकास दर का अनुमान घटा दिया।

टेक्सटाइल से टेक कंपिनयों तक छंटनियां ही छंटनियां
3 अक्टूबर को इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि आर्थिक विकास दर धीमी होने का रोजगार पर चौतरफा असर पड़ा है। देश के उद्योगों मे बड़े पैमाने पर छंटनियां हो रही हैं और उद्योग बंद हो रहे हैं। जिन कंपनियों के रोजगार पर मार पड़ी है उनमें कैपिटल गुड्स कंपनियों से लेकर बैंकिंग, आईटी,  स्टार्ट अप और एनर्जी कंपनियां शामिल हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2015 से लेकर वित्त वर्ष 2017 तक टेक्सटाइल सेक्टर की 67 इकाइयां बंद हो गईं। इन यूनिटों में 17,600 लोगों की छंटनियां हुईं। कैपिटल गुड्स कंपनी एलएंडटी वित्त वर्ष 2017 की दो तिमाहियों में 14000 कर्मचारियों को निकाल दिया एचडीएफसी ने वित्त वर्ष 2017 में 3230 लोगों को निकाला। वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही में टीसीएस ने 1414 कर्मचारियों को हटाया। इन्फोसिस ने इस दौरान 1811 और टेक महिंद्रा ने 1713 लोगों को निकाला। सुजलॉन एनर्जी लिमिटेड और रीजेन ने पिछले छह महीनों में 1500 कर्मचारियों की छुट्टी की। न्यू इकोनॉमी की कंपनियों का भी बुरा हाल है। जिस स्टार्ट-अप को मोदी रोजगार देने के बड़े साधन मानते हैं उनमें से 212, पिछले साल बंद हो गए।

नाउम्मीदी का नया दौर 
देश के युवाओं, किसानों और मध्य वर्ग ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी को जिस उम्मीद में सत्ता सौंपी थी, वह बड़ी तेजी से बेमानी साबित हो रही है। अपनी नीतियों की वजह से अर्थव्यवस्था को दलदल में फंसा चुकी एनडीए सरकार अब इसे उबार पाएगी, इसमें संदेह है । खेती-किसानी से लेकर मैन्यूफैक्चरिंग तक और टेक्नोलॉजी से लेकर सर्विस सेक्टर तक की बेहतरी के लिए सरकार को जो उपाय करने के चाहिए थे उन्हें करने में वह बुरी तरह फेल साबित हुई है। इसलिए सरकार की ओर से हर साल एक करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा एक बुरे ख्बाव में तब्दील हो गया है।
2019 में नरेंद्र मोदी देश के युवाओं को शायद ही यह कह पाएंगे कि बीजेपी में सत्ता में आ गई तो हर साल एक करोड़ रोजगार देगी!

साभार: सबरंग इंडिया

 

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