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जन्मदिन विशेषः एक थे मुख्तार अंसारी

अपने जमाने के बड़े डॉक्टर और राष्ट्रवादी, जिन्हें लोग भूल गये नाम में बहुत कुछ होता है. सार्थक भी और निरर्थक भी. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की चुनावी राजनीति के मोहरे पर एक नाम उभरा है. वह मुख्तार अंसारी का है. एक और मुख्तार अंसारी हुए हैं. वे उसी परिवार से थे, जिससे ये हैं. पहले के मुख्तार अंसारी बागी थे और ये दागी हैं. परिवार एक है. कसबा वही है, जिसे युसूफपुर कहते हैं.
पहले के मुख्तार अंसारी ने युसूफपुर और अपने जिले गाजीपुर को अखिल भारतीय नाम और धाम दिया. कह सकते हैं कि दुनिया में भी उसे राेशन किया. उस मुख्तार अंसारी को भुलाया जा चुका है. उन्हें जानने और याद करने का यही उचित समय है. वे अपने जमाने के बहुत बड़े डॉक्टर थे. राष्ट्रवादी नेता थे. उन पर महात्मा गांधी पूरा भरोसा करते थे. जवाहर लाल नेहरू के आदर्श थे. उन मुख्तार अहमद अंसारी का जन्म 25 दिसंबर,1888 को हुआ था. गाजीपुर जिले के युसूफपुर में स्थित अंसारी परिवार में जन्मे थे. उनके पूर्वज अंसार थे. जो बिगड़ कर अंसारी बना. उनके पिता ने उन्हें इलाहाबाद के म्योर कॉलेज में पढ़ाया. अलीगढ़ नहीं भेजा.
उसके बाद वे बीएससी की पढ़ाई के लिए हैदराबाद गये और वहां से एक स्कॉलरशिप पर लंदन में डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की. वहां वे पहले भारतीय थे, जिसका चयन रेजिडेंट अफसर के रूप में हुआ. उस चयन पर कुछ नस्लवादी अंग्रेजों ने बहुत हो-हल्ला मचाया.
तब मेडिकल काउंसिल ने स्पष्टीकरण दिया कि उनका चयन योग्यता के आधार पर किया गया है. लेकिन, जो विवाद उठाया गया उससे डॉक्टर मुख्तार अंसारी उन दिनों वहां बहुत लोकप्रिय हो गये. वह उनके जीवन में नयेेे अध्याय के सागरमाथा पर बने रहे. उन्हीं दिनों जवाहर लाल नेहरू से उनकी भेंट हुई. जिसका उल्लेख उन्होंने अपनी जीवनी में किया है.
डॉक्टर मुख्तार अंसारी 1910 में भारत लौटे. वे सुख-सुविधा से ऊपर उठे. देश-प्रेम ने उन्हें लंदन से निकलने के लिए प्रेरित किया. यहां आने पर उन्हें अनेक जगहों पर बसने और विभिन्न पदों के प्रस्ताव आये. पर उन्होंने दिल्ली में बसने का इरादा बनाया. फतेहपुरी मसजिद में दवाखाना खोला और मोरीगेट के निकट निवास बनाया. बाद में दरियागंज में रहने के लिए आये.
उन्होंने लाल सुलतान सिंह से जो मकान खरीदा उसका, नाम रखा- दर-उस-सलाम (शांति गृह). वह मकान उसी तरह की राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना, जैसे इलाहाबाद में आनंद भवन था. उन दिनों दिल्ली में दो ही भारतियों के पास अपनी कार थी. उनमें एक डॉक्टर अंसारी थे.
वे जहां मशहूर डॉक्टर थे, वहीं राष्ट्रीय नेता भी थे. गरीबों का मुफ्त इलाज करने के लिए भी उन्हें जाना जाता था. उनकी कीर्ति पताका दूर-दूर तक फहराती थी. तुर्की की लड़ाई में उन्होंने मेडिकल मिशन का नेतृत्व किया. वापसी पर उनका जगह-जगह बहुत सम्मान हुआ. शुरुआती राजनीति में उन पर मौलाना मुहम्मद अली का प्रभाव था. लेकिन, जब उन्होंने देखा कि वे विघटन की राजनीति कर रहे हैं, तब वे महात्मा गांधी की ओर मुड़े. उनके सत्याग्रह में हिस्सा लिया. दिल्ली की सत्याग्रह सभा के वे अध्यक्ष बनाये गये. वे हिंदू-मुसलिम भाईचारे के पक्षधर थे.
उनकी पहल पर 1920 में जामिया मिलिया की स्थापना हुई. वे आजीवन उसके संरक्षक थे. जामिया मिलिया ने मुसलिम लीग के भारत विभाजन का कभी समर्थन नहीं किया. उनके विचारों का ही प्रभाव था कि जामिया मिलिया ने इसलाम और राष्ट्रवाद में समन्वय का रास्ता अपनाया.
इस पर कुछ कट्टर मुसलमानों ने उनकी आलोचना भी की, जिसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की. वे स्वराज के बड़े प्रवक्ता थे. उनकी कल्पना में राष्ट्रीयता का भाव था, जिसमें वर्ग, वर्ण और पंथ विलीन हो जाता है, इसीलिए वे उस समय की कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता थे. जिन्हें 1927 में अध्यक्ष चुना गया. उनकी लोकप्रियता का ही प्रमाण है कि 17 में से 14 प्रांतीय समितियों ने उनका समर्थन किया. तब हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा- ‘ इतिहास के इस संकटपूर्ण दौर में कांग्रेस ने एक शानदार फैसला किया है. अध्यक्ष पद के लिए डॉ अंसारी से बेहतर दूसरा नहीं हो सकता था. ‘
वे मद्रास कांग्रेस में अध्यक्ष बने. उनके भाषण से प्रेरित होकर पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ. उनके ही प्रयास से कुछ साल बाद स्वराज पार्टी को फिर से जिंदा किया गया. कारण यह था कि गांधी का सविनय अवज्ञा आंदोलन अंतिम सांसें गिन रहा था. उससे कांग्रेस को निकालने के लिए नयी राजनीतिक पहल की जरूरत थी. जिसके पुरोधा बने डॉक्टर अंसारी.
महात्मा गांधी ने सहमति भी उनके कारण ही दी. इस तरह अप्रैल, 1934 में फिर से स्वराज पार्टी बनी. डॉक्टर अंसारी के प्रयास से ही डॉ राजेंद्र प्रसाद और जिन्ना में बातचीत हुई. लेकिन, वह प्रयास विफल रहा. इससे डॉक्टर अंसारी को धक्का लगा. वे उसके भयानक नतीजे को देख सके थे.
उनकी सेहत गिर रही थी. इस कारण भी उन्होंने कांग्रेस के विभिन्न पदों से इस्तीफा दे दिया. नेतृत्व चकित था. उन्हें फुरसत के कुछ क्षण मिले. एक किताब लिखी. उसे खूब पढ़ा गया. दूसरी तरफ जामिया मिलिया पर वे ध्यान देने लगे. उनके प्रयास से सौ एकड़ जमीन खरीदी गयी.
जिसका 1935 में उन्होंने बच्चों से शिलान्यास कराया. वे उसके अमीर-ए-जामिया (कुलाधिपति) रहे और डॉक्टर जाकिर हुसैन को कुलपति बनाया. उनकी सेहत सुधर नहीं रही थी. इसलिए उस जिम्मेदारी से भी मुक्ति ली. रामपुर के नवाब के निमंत्रण पर मसूरी गये. लौटते समय ट्रेन में उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया. उनका तीन दशक लंबा स्वाधीनता सेनानी का जीवन शानदार रहा. वे अपने जमाने के शलाकापुरुष रहे.
प्रेरणा के स्रोत थे. उनके विचार और कर्म से देश-समाज को समाधान की राह मिलती थी. इसके लिए ही वे याद किये जायेंगे. जरूरी है कि उन्हें नयी पीढ़ी जाने. वे कम उम्र में गये, लेकिन अपनी अमिट छाप हमेशा के लिए छोड़ गये. उनके निधन पर महात्मा गांधी ने कहा- ‘ शायद ही किसी मृत्यु ने इतना विचलित और उदास किया हो जितना इसने.’
    रामबहादुर राय
(लेखक हिंदी के प्रसिद्ध पत्रकार एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष हैं.)
(समाचार पत्रिका ‘यथावत’ से साभार)
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