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नेतृत्व के अभाव से जूझ रहा है देश का मुस्लिम समुदाय

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देश में आजादी के बाद से ही मुस्लिम नेतृत्व का अभाव रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक मुसलमानों का ऐसा कोई नेता नहीं है जिसको समुदाय के लोग एक आवाज में अपना नेता तस्लीम करते हों। बंगलौर के वरिष्ठ उर्दू पत्रकार अब्दुल ख़ालिक़ ने ‘मैं देखता चला गया’ कालम में इस ज्वलंत मुद्दे पर अपनी बात लिखते हुए कहा कि देश के अलग-अलग राज्यों में कई मुस्लिम नेता हुए हैं लेकिन मुल्क स्तर पर कोई भी रहनुमा नहीं है।

मुसलमानों के पास दुर्भाग्य से कभी भी ऐसा राजनीतिक नेतृत्व ही नहीं रहा। कहने को तो हमारे पास गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल, सलमान खुर्शीद, अब्दुल रहमान अंतुले, जाफर शरीफ, रहमान खान, सी एम इब्राहिम जैसे नेताओं का नाम लिस्ट में रहा है लेकिन यह सब नेता अपने-अपने दायरे तक सीमित रहे हैं। आज हमें एक परिपक्व मुस्लिम नेतृत्व की सख्त जरूरत है।

सरकारों और पार्टियों में मुस्लिम नेताओं को मुसलमानों की नुमाइंदगी के लिए उनको जगह दी जाती है। ऐसे में इन मुस्लिम नेताओं को जिम्मेदारी बनती है कि वह कौम के लोगों की समस्याओं की जानकारी के साथ उनका हल भी करें लेकिन हमारे यह नेता सरकारों और पार्टियों में नाम के लिए होते हैं, काम के लिए नहीं। देश में जैन, सिख आदि भी अल्पसंख्यक हैं जो मुट्ठी भर हैं लेकिन उनके पास राजनीतिक नेतृत्व के अभाव की बात कभी सामने नहीं आई है।

इन नेताओं ने देश और अपने मंत्रालय के लिए तो काम किए हैं लेकिन कौम के विकास के लिए काम नहीं किया। जाफर शरीफ ने केंद्रीय रेल मंत्री रहते काफी काम किये लेकिन मुस्लिम समुदाय के लिए कोई विशेष काम नहीं किया ताकि उनको याद रखा जाए। हां, बंगलौर के रहमान खान ने जरूर समुदाय के भले के लिए कुछ काम किए हैं जिनको भुलाया नहीं जा सकता।

आज वक्फ में नया बिल सिर्फ रहमान खान के प्रयासों की बदौलत है। दूसरे रहनुमाओं ने ऐसा कोई काम करने का प्रयास नहीं किया है जिससे पूरी कौम का भला हो। मुस्लिम नेतृत्व को अपनी सोच बदलनी होगी तभी मुसलमानों का उत्थान होगा। मुसलमानों में दुर्भाग्य से ऐसे नेता का हमेशा से अभाव रहा है जिसका मुस्लिम समुदाय द्वारा अनुसरण किया जाता हो और इसके लिए मुस्लिम समुदाय को एकजुट होना होगा।

(लेखक अब्दुल ख़ालिक़ वरिष्ठ उर्दू जर्नलिस्ट हैं)

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