Wednesday , September 19 2018

समूचे मुस्लिम समुदाय ने पीएफआई की झारखंड इकाई पर प्रतिबन्ध को लोकतंत्र की हत्या करार दिया

नई दिल्ली। झारखंड सरकार द्वारा पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफआई) की झारखंड इकाई पर प्रतिबन्ध लगाने की निंदा करते हुए देश के मुस्लिम समुदाय के अनेक महत्वपूर्ण मुस्लिम संगठनों के प्रमुख नेताओं ने इस प्रतिबंध को लोकतंत्र की हत्या के समान बताया है।

मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने एक संयुक्त बयान में कहा कि पीएफआई देशव्यापी सामाजिक संगठन है जो पूरे देश में शैक्षणिक और सामाजिक सेवाएं मुहैया कराता है और पीड़ितों को भारतीय संविधान और कानून की सीमा में मदद करता है। कश्मीर के भूकंप पीड़ितों और पोर्ट ब्लेयर के सुनामी पीड़ितों के पुनर्वास कार्य में यह संगठन सक्रिय रहा है।
पीएफआई झारखंड में पुनर्वास कार्य में सक्रिय रहा है और उसने भीड़ के शिकार लोगों के लिए कानूनी मदद भी की है।

इससे पहले, पीएफआई के आईएसआईएस के साथ संबंधों के आरोप गलत साबित हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पीएफआई के तथाकथित ‘लव जिहाद’ में शामिल होने के आरोपों को खारिज कर दिया है। केरल और कर्नाटक के मुख्यमंत्रियों ने स्पष्ट किया है कि पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोई सबूत नहीं हैं।

राज्य और केंद्र सरकार हर स्तर पर उनकी विचारधारा को कुचलने का प्रयास करती हैं, जो लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। इन सभी मुस्लिम नेताओं ने मांग की कि झारखंड में पीएफआई पर प्रतिबंध को तुरंत वापस लेना चाहिए।

यह वक्तव्य ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी और इमारत-ए शरिया बिहार-झारखंड और उड़ीसा के प्रमुख मौलाना वली रहमानी द्वारा जारी किया गया है जिसमें मौलाना महमूद मदनी, महासचिव जमीयत उलेमा-ए हिंद; अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना मोहम्मद सज्जाद नोमानी; मौलाना मुफ्ती मुकर्रम अहमद, शाही इमाम और खतीब, फतेहपुरी मस्जिद, दिल्ली; मौलाना असरारूल हक कासमी, मौलाना तौकीर रजा खान, प्रोफेसर अख्तरुल वसी, डॉ. जफर महमूद, डॉ. जफरुल-इस्लाम खान; और डॉ. तस्लीम रेहमानी शामिल हैं।

मुस्लिम नेता मुश्ताक अली ने झारखंड में पीएफआई प्रतिबंध पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि दुर्भाग्य से भाजपा मुसलमानों की भयावहता से पीड़ित है।

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