Thursday , December 14 2017

यह सरासर झूठ है कि मुसलमान भाजपा को वोट देते हैं

दिल्ली नगर निगम के चुनावों में भाजपा ने शानदार जीत हासिल की है लेकिन उसके सभी पांच मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गए हैं। शुरुआती रुझानों से पता चला था कि भाजपा पुरानी दिल्ली के जामा मस्जिद और सीताराम बाज़ार जैसे इलाक़ों में अच्छा प्रदर्शन कर रही है। इसके फौरन बाद भाजपा समर्थकों ने ये अफवाह फैलाना शुरू कर दिया कि पार्टी ने मुस्लिम समुदाय में भी अपनी पैठ बना ली है। मगर जब चुनाव के नतीजे आए तो यह पूरी तरह साफ हो गया कि मुसलमानों ने भाजपा को खारिज कर दिया है।

एमसीडी चुनाव में कुल 14 मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत मिली है। इनमें से 7 आम आदमी पार्टी, 6 कांग्रेस और एक बहुजन समाज पार्टी से हैं। इन 14 पार्षदों में से 6 औरतें हैं। एमसीडी में मुसलमानों की हिस्सेदारी पहले के मुक़ाबले थोड़ी कम हुई है। साल 2012 में मुस्लिम पार्षदों की संख्या 15 थी। साल 2007 के एमसीडी चुनावों में भाजपा को जब 164 सीटें मिली थी, तब मुस्लिम पार्षदों की संख्या 11 ही थी। हालांकि इनमें से एक उम्मीदवार मोहम्मद इमरान भाजपा के टिकट पर कसाबपुरा से जीते थे।

हाल ही में पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद से बार-बार ये बात कही जा रही है कि भाजपा को मुस्लिम मतदाता भी वोट कर रहे हैं। लेकिन अगर एमसीडी के मुस्लिम बहुल इलाक़ों में पड़े वोटों पर नज़र दौड़ाई जाए तो ये साफ़ है कि मुसलमान मतदाता भाजपा को वोट नहीं दे रहे हैं। इसकी बजाय मुसलमान ‘धर्मनिरपेक्ष-दलों’ में भरोसा बनाए हुए हैं।

तीनों नगर निगमों के पार्षदों की संख्या मिला दी जाए तो मुस्लिम पार्षदों की संख्या 5 फीसदी है. इस प्रतिशत को इस नज़रिए से भी देखा जा सकता है कि कांग्रेस के 20 फ़ीसदी, आम आदमी पार्टी के 15 फ़ीसदी और बहुजन समाज पार्टी के तीन पार्षदों में से एक मुस्लिम पार्षद हैं।

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2017 के जो नतीजे आए हैं, उससे यह स्थिति अलग नहीं है। उत्तर प्रदेश के समाजवादी पार्टी के विधायकों में से 35 फीसदी, बसपा विधायकों में से 21 फीसदी और कांग्रेस के विधायकों में से 33 फीसदी एमएलए मुस्लिम हैं। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा नहीं किया था।

भाजपा की जीत से यह ज़ाहिर है कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के चलते भाजपा ‘धर्मनिरपेक्ष’ राजनीतिक दलों को दरकिनार करते हुए हिन्दुओं के वोट बैंक में अपनी स्थिति मजबूत करती जा रही है। दूसरी तरफ ये ‘धर्मनिरपेक्ष’ दल ज़िंदा रहने के लिए मुस्लिम वोटों पर निर्भर होकर रह गए हैं।

इस दौरान भाजपा हिन्दू वोटों को मज़बूत करती जा रही है जबकि मुसलमान उप्र, बिहार और अब दिल्ली में ‘मुस्लिम मूल’ के दलों जैसे कि ‘ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन और असम में एआईयूडीएफ को नज़रअंदाज़ करते हुए ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों में विश्वास बनाए हुए है।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन और एआईयूडीएफ का चुनावों में प्रदर्शन काफी कमज़ोर रहा है। सिर्फ ऑल इंडिया मुस्लिम लीग पिछले साल केरल में अपनी जमीन बरकरार रख सकी है।

आंकड़े बताते हैं कि मुसलमान भाजपा के अलावा ‘किसी को भी’ वोट दे सकते हैं। मसलन इस साल की शुरुआत में हुए मुम्बई नगर निगम के चुनावों में मुसलमानों ने शिवसेना को वोट किया था। शिवसेना भाजपा के खिलाफ चुनावी मैदान में थी. शिवसेना के टिकट पर दो मुस्लिम पार्षदों को मुम्बई नगर निगम में जीत भी हासिल हुई है।

इसमें कोई शक़ नहीं कि मुस्लिम मतदाताओं का भाजपा से पूरी तरह से अलगाव है। मुस्लिम वोटों के बिना सरकार बनाने की अपनी रणनीति के चलते भाजपा खुल्लमखुल्ला बेशर्मी कर रही है। केन्द्रीय मंत्री रविशंकार प्रसाद ने हाल में कहा था कि मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं देते लेकिन फिर भी मोदी सरकार ने उन्हें पूरी इज़्ज़त दी है।

ऐसा लगता है कि मोदी और शाह अपने उसी मॉडल पर काम कर रहे हैं जो रणनीति उन्होंने गुजरात में अख़्तियार की थी, ‘मुस्लिम वोटों को छोड़कर बाक़ियों के वोट हासिल करने की।’

ख़तरनाक ट्रेंड

उत्तर प्रदेश चुनावों और एमसीडी चुनावों में मुस्लिम बहुल इलाक़ों में अन्य क्षेत्रों में मुकाबले टर्नआउट से कहीं ज़्यादा था। इसके अलावा इन इलाक़ों में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी कहीं ज़्यादा दिखती है। मिसाल के लिए ओखला वार्ड में आप, कांग्रेस, राजद और भाजपा उम्मीदवारों के बीच लड़ाई बेहद क़रीबी रही। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तहादुल मुसलमीन और छोटे दल भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की होड़ में रहे।

मगर वोटिंग में ज़्यादा भागीदारी और अधिक राजनीतिकरण के बावजूद चुनावी नतीजे मुस्लिम समाज के लिए सुकून भरे नहीं होते हैं। यह एक ख़तरनाक तथ्य है। अगर इस हद तक राजनीतिकरण के बाद अगर मुसलमानों की चिंताएं नहीं दूर होती हैं तो कहीं ऐसा न हो कि आख़िर में वो इस राजनीतिक प्रक्रिया में ही दिलचस्पी लेना बंद कर दें।

विजयी मुस्लिम उम्मीदवार

उत्तरी (104 वार्ड्स)

मोहम्मद सादिक़—- आप

बल्लीमारान

शाहीन—आप

कुरैश नगर

सीमा ताहिरा—कांग्रेस

बाजार सीताराम

ए. मोहम्मद इकबाल—कांग्रेस

दिल्ली गेट

सुल्तान अब्द—कांग्रेस

जामा मस्जिद

पूर्वी (64 वार्ड्स)

अब्दुल रहमान—आप

चौहान बांगेर

साजिद —आप

करदम पुरी

मोहम्मद ताहिर हुसैन—-आप

नेहरू नगर

शाईस्ता—आप

श्रीराम कालोनी

परवीन—-कांग्रेस

मुस्तफाबाद

शाकिया बेगम—बसपा

सीलमपुर

साउथ (104 वार्ड्स)

अब्दुल वाजिद खान—आप

अबुल फज़ल एन्कलेव

यास्मीन क़िदवई —कांग्रेस

दरियागंज

शोएब दानिश—कांग्रेस

जाकिर नगर

  • आदित्य मेनन, कैच न्यूज़
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