मतदाता का मौन प्रतिरोध : बढ़ रहा है ‘नोटा’ का प्रचलन

मतदाता का मौन प्रतिरोध : बढ़ रहा है ‘नोटा’ का प्रचलन

भारतीय राजनेताओं ने सियासी मानदंडों को जमींदोज कर दिया है। आज चाहे एनडीए हो या यूपीए, उनके अधिकांश सहयोगी कभी न कभी उनके विरोध में नारे बुलंद कर चुके हैं। निजी महत्वाकांक्षाओं और सियासी स्वार्थों की ईंटों से बनी गठबंधनों की ये अट्टालिकाएं जन-साधारण के प्रति जिम्मेदारी निभाने की जगह सिर्फ फरेबी तंत्र को पोस सकती हैं।

यही वजह है कि ‘नोटा’ का प्रचलन बढ़ रहा है। चार महीने पहले मध्य प्रदेश के चुनावों ने राजनीतिक दलों की आंखें खोल दी थीं। वहां के 5.05 करोड़ मतदाताओं में से 5.42 लाख ने ‘नोटा’ का प्रयोग किया था। यदि इतने वोट भारतीय जनता पार्टी को मिल गए होते, तो शिवराज सिंह चौहान चौथी बार भोपाल की राजगद्दी पर विराजमान होते। अगर कांग्रेस इन्हें हासिल करने में कामयाब हो जाती, तो यकीनन उसे स्पष्ट बहुमत मिल गया होता, क्योंकि 44 सीटों पर हार-जीत का अंतर पांच हजार से भी कम था।

क्या आपको नहीं लगता कि मौजूदा दलों, नेताओं और गठबंधनों के खिलाफ आम आदमी का यह लोकतांत्रिक प्रतिरोध मजबूत हो रहा है? अगर मौजूदा लोकसभा चुनावों में यह सिलसिला जारी रहा, तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।

ओडिशा में लगभग दो दशक से हुकूमत कर रहे बीजू जनता दल ने अपने ही सूबे के एक थाने में भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई है। पार्टी का आरोप है कि भाजपा ओडिशा के साढे़ चार करोड़ लोगों को विशेष राज्य के दर्जे के मामले में धोखा दे रही है।

बीजू जनता दल के इस करतब ने कुछ सवालों को जन्म दे दिया है। यह ठीक है कि भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के घोषणापत्र में ओडिशा को विशेष राज्य का दर्जा देने का वायदा किया था। निस्संदेह, इस आश्वासन को पूरा किया जाना चाहिए था। मगर घोषणापत्रों के आधार पर आपराधिक मामले चलने लगे, तो सभी दलों के प्रमुखतम नेता जेल में पाए जाएंगे। खुद नवीन पटनायक ने पिछले चार चुनावों के दौरान जो आश्वासन दिए हैं, क्या वे शत-प्रतिशत पूरे हो सके हैं? यदि नहीं, तो फिर क्या उनका यह कदम चुनावी तमाशे का हिस्सा नहीं है?
लगता तो यही है।

अगर नवीन बाबू भारतीय जनता पार्टी से इतने ही खफा थे, तो जब कुछ पार्टियां मौजूदा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाईं, तब उनकी पार्टी के सांसदों ने लोकसभा से बहिर्गमन क्यों किया? इससे तो केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का रास्ता हमवार हो गया था। यही नहीं, इससे पहले राज्यसभा के उप-सभापति और राष्ट्रपति के चुनाव में भी बीजद नई दिल्ली के सत्तानायकों के साथ खड़ा नजर आया था। सुविधानुसार रंग बदलने की यह नीति क्या मतदाताओं के साथ धोखा नहीं है?

आप गठबंधन की राजनीति का इतिहास उठाकर देख लीजिए। पता ही नहीं चलेगा कि पुराने दोस्त कब दुश्मन हो गए और दुश्मनी वक्त के साथ तिलिस्मी तरीके से कब दोस्ती में बदल गई? ओडिशा का पड़ोसी राज्य है आंध्र प्रदेश। वहां इस समय चंद्रबाबू नायडू हुकूमत कर रहे हैं। 2014 में नायडू की पार्टी तेलुगू देशम ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। 25 में से 18 सीटें जीतकर इस गठबंधन ने जन-साधारण के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित कर दी थी। नायडू साल भर पहले तक भाजपा के करीबी माने जाते थे। आंध्र प्रदेश की नई बनने वाली राजधानी अमरावती की नींव उन्होंने प्रधानमंत्री के हाथों रखवाई थी। राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव में भी तेलुगू देशम भाजपा के साथ खड़ी थी, पर मार्च 2018 में उन्होंने भी विशेष राज्य के मुद्दे पर एनडीए से नाता तोड़ लिया। नायडू का आरोप था कि इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को समझाने के लिए उन्होंने 29 बार नई दिल्ली के दौरे किए, पर उसके कान पर जूं तक न रेंगी।

यही नहीं, चंद्रबाबू नायडू ने पिछले नवंबर में तेलंगाना विधानसभा का चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा। दोनों पार्टियां चुनावी रणभूमि में खेत रहीं। अब टीडीपी और कांग्रेस लोकसभा का चुनाव अलग-अलग लड़ रही हैं। दोस्ती और दुश्मनी का यह कायांतरण सिर्फ सियासत में हो सकता है।

बीजू जनता दल और तेलुगू देशम के मौजूदा नेता पुराने दिग्गजों के वारिस हैं, पर क्रांतिकारी संघर्ष की भावना से उपजी असम गण परिषद तक इस संक्रामक रोग से अछूती नहीं रही। प्रफुल्ल कुमार महंत ने असम विधानसभा का पिछला चुनाव भगवा दल के गठबंधन से लड़ा था। वह एनडीए में भी सहयोगी थे, लेकिन नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करते हुए उन्होंने गई जनवरी में खुद को उससे अलग कर दिया था। लग रहा था कि महंत का पुराना तेवर लौट रहा है, परंतु नहीं! लोकसभा चुनाव आते ही भाजपा आलाकमान ने उनकी पीठ सहला दी और वह फिर एनडीए के हमराह बन गए। गठबंधन तोड़ते, मरोड़ते या जोड़ते समय हमारे क्षेत्रीय नेता ये क्यों भूल जाते हैं कि मतदाता के प्रति उनकी कोई नैतिक जिम्मेदारी भी है?

असम गण परिषद की तरह ही आम आदमी पार्टी भी वैकल्पिक राजनीति के नारे के नाम पर दिल्ली की हुकूमत में आई थी। उस वक्त देश में मोदी लहर उफान पर थी। ऐसे में केजरीवाल की जीत राजनीति की नई सोच रखने वालों को एक खुशनुमा आश्वासन की तरह लगी थी, पर चार बरस बाद वह उम्मीद मुरझाने लगी है। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में भले ही कुछ लोक-कल्याणकारी काम किए हैं, पर उसका सियासी चिंतन अब किसी अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक दल जैसा हो गया है। जिस कांग्रेस विरोध की नाव पर सवार होकर केजरीवाल यहां तक पहुंचे, अब उसी से गठबंधन की पींगे बढ़ाई जा रही हैं। इससे वैकल्पिक राजनीति का नारा खोखला नहीं साबित हो जाता? दूसरा सवाल, क्या हमारा लोकतंत्र आदर्शों को सरसब्ज होने की इजाजत नहीं देता?

साभार : हिंदुस्तान
लेखक : shashi shekhar

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