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महज़ 500 रुपए न होने से अनपढ़ रह जाएंगे मुज़फ्फरनगर दंगा पीड़ित के मुस्लिम बच्चे

रुड़कली (मुजफ्फरनगर)

मुज़फ्फरनगर दंगे के चार साल बीत गए। कुछ ज़ख्म भर गए लेकिन दर्द अभी भी मौजूद हैं। लोग शरणार्थी बन कर रह गए। दंगे के दौरान यह लोग जान बचाकर भागे थे और दूसरी जगह शरण ली थी।

रुड़कली मुजफ्फरनगर जनपद के भोपा थाने के करीब एक गांव है जिसके आसपास दर्जन भर मुस्लिम बहुल गांव है। गांव के दोनो तरफ 18 -18 मकानों की दो बस्ती है और दोनो में मुज़फ्फरनगर दंगे के शरणार्थी रहते हैं।

घर तो जमीअत उलेमा ए हिन्द ने बनवा कर दिए हैं। लेकिन चार साल बाद भी हालात बदतर हैं। कहने को ये एक गाँव हो गया हैं लेकिन ये पूरी बस्ती तीन तरफ से 7/8 फ़ीट ऊंचे गन्ने से घिरी है पहली नज़र में ऐसा लगता है कि यह लोग जंगल मे आदिवासी लोग रह रहे है।

दिक्कतें जैसे रास्ता, बिजली पानी कुछ भी नहीं हैं। लेकिन इन सब के बीच अफ़सोस यहाँ के लडकियों पर आता हैं जो पढना चाहती हैं लेकिन जा नहीं सकती। सबसे बड़ी क्लास में इमराना पढ़ती है और यह 5वी है। नूर मोहम्मद यहां रुबीना नाम की एक लड़की के पिता है उनके 5 बेटियां है और एक बेटा उनको यहां आप सबसे ज्यादा जागरूक आदमी कह सकते है क्योंकि रुबीना यहां सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी लड़की है उसने 9 वी तक पढ़ाई की हुई हैं।

रुबीना की बहन बुशरा भी 8वी पढ़ी है। अब इन्हें स्कूल से हटा लिया गया है और इसका नूर मोहम्मद को बहुत मलाल है वो बताते है कि स्कूल का रास्ता बेहद खतरनाक है दोनों तरफ जंगल है और वो यहां खतरा नही उठा सकते। रुबीना कहती है सच यह है कि अब्बू के पास हमे पढ़ाने का पैसा नही है वो मजदूरी करते है और हम 6 भाई बहन है अब वो खर्च नही उठा सकते। बस एक भाई है उसे पढ़ा रहे हैं।

इन दंगों पीड़ितों के 36 परिवारो में बमुश्किल 5 बच्चे पढ़ने जाते है। यहां पास में ही मोलाना आज़ाद कॉलेज है जहां बारहवीं तक पढ़ाई होती है मगर वो 500 रुपए महीने की अपनी फीस से कोई समझौता नही करता।

सभी की राय हैं अगर नज़दीक का मौलाना आजाद स्कूल में फीस के रूप में मदद हो जाये तो ये बच्चे आगे पढ़ सकते हैं।

  • फैसल फ़रीद

 

 

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