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जस्टिस लोया केस- मेडिकल रिकॉर्ड और दस्तावेज में विरोधाभास, मामला संदिग्ध लग रहा है- वकील

नई दिल्ली। जस्टिस बी.एस. लोया की मौत के मामले में एसआईटी जांच की मांग कर रही याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि मेडिकल रिकॉर्ड और पेश दस्तावेज में विरोधाभास है।

कोर्ट में साथ ही कहा गया कि जजों के बयान में भी विरोधाभास है जिस कारण मौत संदिग्ध लग रही है लिहाजा मामले की एसआईटी जांच कराई जानी चाहिए। बता दें कि जस्टिस लोया सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस पर सुनवाई कर रहे थे।

बॉम्बे लॉयर्स असोसिएशन की ओर से पेश सीनियर वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि जिस तरह से अस्पताल के रिकॉर्ड और पेश दस्तावेज में विरोधाभास है उससे मामला संदिग्ध लग रहा है। एक दिसंबर 2014 को जज लोया की मौत हुई थी।

उनकी सुरक्षा 24 नवंबर 2014 को हटा ली गई थी । सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सोहराबुद्दीन केस की सुनवाई कर रहे थे। आदेश ये भी था कि ट्रायल जज का ट्रांसफर नहीं किया जाए और सुनवाई जल्दी पूरी की जाए।

दवे ने कहा कि लोया को जब हार्ट अटैक आया तो उन्हें नागपुर में बेहतर अस्पताल में भर्ती नहीं कराया गया। लोया के परिजनों को घटना के तुरंत बाद सूचना नहीं दी गई।

जजों का बयान था कि वह हार्ट अटैक से लेकर अस्पताल ले जाने तक हर समय मौजूद थे, लेकिन पुलिस की रिपोर्ट में मौके पर अन्य जज के होने की बात नहीं है। ऐसे में चारों जजों को हलफनामा देकर कोर्ट को बताने को कहा जाए कि वे मौके पर मौजूद थे या नहीं।

दुष्यंत दवे ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने लोया की मौत के मामले में जो दस्तावेज पेश किए हैं उनमें काफी विरोधाभास है। चारों जज मौके पर थे ऐसा बताया गया है लेकिन पुलिस रिपोर्ट इस बात की पुष्टि नहीं करता। राज्य सरकार इस मामले में क्या कर रही है ये देखना जरूरी है।

अगर मौत पर सवाल उठा है और संदेह की अंगुली उठी है तो मामले की जांच में हर्ज क्या है? तब महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सीनियर वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि जब लोया को अटैक आया था तब तीन जज उसी कमरे में थे।

उन्हें तीनों अस्पताल ले गए थे। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने खुद दो जजों को मामले की देखरेख के लिए तैनात किया था। तीन साल पहले की घटना है और एक मैग्जीन में स्टोरी छपने के बाद मामला उठाया जा रहा है।

इस पर दुष्यंत दवे ने कहा कि यह जरूरी है। मामले में राज्य सरकार की ओर से पेश होने वाले वकील बीजेपी नेता अमित शाह के लिए पेश हो चुके हैं। सोहराबुद्दीन केस में सीबीआई ने अमित शाह को भी आरोपी बनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने खुद मामले को गुजरात से महाराष्ट्र भेजा था। और आदेश दिया था कि ट्रायल करने वाले जज जल्दी सुनवाई पूरी करें और जज का ट्रांसफर नहीं किया जाए।

जो दस्तावेज पेश किए गए हैं उसमें कहा गया है कि तड़के जज लोया को हार्ट अटैक हुआ था लेकिन उन्हें नागपुर के अच्छे अस्पताल नहीं ले जाया गया। रिपोर्ट कहता है कि सुबह 6.15 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया था। साथ ही ये भी रिपोर्ट है कि इलाज के दौरान मेडिसिन दिया गया और न्यूरो सर्जरी के लिए ले जाया गया। अगर मौत हो चुकी थी तो फिर इलाज किस बात का चल रहा था।

दवे ने कहा कि मौत की खबर किसने पत्नी को बताई ये पता नहीं है। पोस्टमॉर्टम 11 बजे के आसपास हुआ। घर वालों को मौत की खबर देर से दी गई। जो भी दस्तावेज हैं वह सब संदिग्ध हैं। जिस चार जजों के बारे में कहा जा रहा है कि वे वहां थे और अंतिम संस्कार में भी गए थे उनका हलफनामा लिया जाना चाहिए।

लोया के पिता और बहन ने विदेशी चैनल को इंटरव्यू भी दिया था और कहा था कि लोया पर दबाव बनाया गया था। उन्हें रिश्वत ऑफर किया गया था। मामला संदिग्ध है और ऐसे में एसआईटी जांच की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में मामले पर अगली सुनवाई सोमवार को होगी। नागपुर में एक दिसंबर 2014 को लोया की मौत हो गई थी जब वह अपने एक सहकर्मी की बेटी की शादी में शामिल होने गए थे।

ये मामला तब दोबारा प्रकाश में आया है जब मीडिया में उनकी बहन ने बयान दिया कि मौत रहस्यमय परिस्थिति में हुई है। लोया सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे थे । मामले में अमित शाह सहित अन्य पक्षकार थे।

सौजन्य- नवभारत टाइम्स

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