Wednesday , April 25 2018

कुछ इस तरह ‘राम’ के मर्म को अपनी ग़ज़ल में समाया था अल्लामा इक़बाल ने

लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द ।
सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।
ये हिन्दियों के फिक्रे-फ़लक उसका है असर,
रिफ़अत में आस्माँ से भी ऊँचा है बामे-हिन्द ।
इस देश में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त,
मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द ।
है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़,
अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द ।
एजाज़ इस चिराग़े-हिदायत का है ,
यहीरोशन तिराज़ सहर ज़माने में शामे-हिन्द ।
तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था,
पाकीज़गी में, जोशे-मुहब्बत में फ़र्द था ।

अल्लामा इक़बाल की यह नज़्म ‘गागर में सागर‘ का एक बेहतरीन नमूना है। मसलन इसमें ‘शराबे हक़ीक़त‘ से हिन्दुस्तानी दिलो-दिमाग़ को भरा हुआ बताया गया है। अल्लामा इक़बाल ने कहा है कि पश्चिमी दार्शनिक सब के सब भारत के अधीन हैं। अल्लामा इक़बाल पूर्व और पश्चिम के सभी दार्शनिक मतों पर गहरी नज़र रखते थे।

‘राम ए हिन्द‘ वाक्य में उन्होंने एक अजीब लुत्फ़ पैदा कर दिया है क्योंकि यहां उन्होंने ‘राम‘ शब्द को एक फ़ारसी शब्द के तौर पर इस्तेमाल किया है। फ़ारसी में ‘राम‘ कहते हैं किसी को अपने अधीन करने को। इस तरह वे ‘राम‘ शब्द की व्यापकता को भी बता रहे हैं और यह भी दिखा रहे हैं कि ‘राम‘ केवल हिन्दी-संस्कृत भाषा और हिन्दुस्तान की भौगोलिक सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है।

अल्लामा हिन्दुस्तानियों के चिंतन को ‘फ़लक रस‘ अर्थात आसमान तक पहुंचने की ताक़त रखने वाला बता रहे हैं और इसी की वजह से वे हिन्दुस्तान के मक़ाम को आसमान से भी ऊंचा कह रहे हैं। हिन्दुस्तान की शोहरत की एक वजह वे यह बता रहे हैं कि हिन्दुस्तान में केवल ऊंचे दर्जे का दर्शन ही नहीं है बल्कि सदाचार की मिसाल क़ायम करने वाले ऐसे लोग भी इस देश में हुए हैं जिनका व्यक्तित्व फ़रिश्तों जैसा निष्कलंक और निष्पाप था और उनकी तादाद भी दो-चार नहीं बल्कि हज़ारों है।

अल्लामा इस भूमिका के बाद मर्यादा पुरूषोत्तम रामचन्द्र जी का परिचय कराते हैं। वे कहते हैं कि उनके वुजूद पर हिन्दुस्तान को नाज़ है। ‘अहले नज़र‘ उन्हें ‘इमाम ए हिन्द‘ समझते हैं। इस वाक्य को समझने के लिए आदमी को पहले ‘अहले नज़र‘ और ‘इमाम‘, इन दो शब्दों के अर्थ को समझना पड़ेगा। ‘अहले नज़र‘ का शाब्दिक अर्थ तो है ‘नज़र वाले आदमी‘ लेकिन यहां ‘नज़र‘ से तात्पर्य आंख की नज़र नहीं है बल्कि ‘रूहानी नज़र‘ है।

‘इमाम ए हिन्द‘ का अर्थ यह हुआ कि उनका आदर्श सारे हिन्दुस्तान को सच्चाई और नेकी का रास्ता दिखा रहा है। हक़ीक़त यह है कि रामचन्द्र को ‘इमाम ए हिन्द‘ केवल वही समझ सकता है जो ‘अहले नज़र‘ है। जो ‘अहले नज़र‘ नहीं है वह सही बात को ग़लत बात से अलग करके नहीं देखेगा और इसके दो ही नतीजे होंगे।

रामचन्द्र को ‘इमाम ए हिन्द‘ कहने के बाद ‘चराग़ ए हिदायत‘ भी कहा है। ‘हिदायत‘ का शाब्दिक अर्थ तो ‘मार्गदर्शन‘ है लेकिन यहां ‘हिदायत‘ से उनका तात्पर्य ‘ईश्वर के धर्म का मार्ग दिखाने‘ से है। वे कहते हैं कि यह रामचन्द्र के व्यक्तित्व का ही प्रभाव है कि आज जब भारत का वैभव पहले जैसा नहीं रहा तब भी हिन्दुस्तान की शाम भी ज़माने भर की सुबह की ज़्यादा से रौशन है, तेजोमय है।

अल्लामा इक़बाल रामचन्द्र जी को ‘फ़र्द‘ कहते हैं वीरता में, पाकीज़गी में और मुहब्बत में और वे उन्हें तलवार का धनी भी बताते हैं। ‘फ़र्द‘ उस आदमी को कहा जाता है जो किसी खूबी में अपनी मिसाल आप हो, वह खूबी उस दर्जे में उस समय किसी में भी न पाई जाती हो।

इनसान को अमर करने वाली चीज़ वास्तव में बलिदान ही है। प्रेम एक जज़्बा है, जो दिल में छिपा रहता है, दुनिया उसे देख नहीं सकती लेकिन दुनिया बलिदान को देख सकती है। देखी हुई चीज़ को भुलाना आदमी के लिए मुमकिन नहीं होता। यही कारण है कि रामचन्द्र के बलिदान को भुलाना हिन्दुस्तानियों के लिए आज तक मुमकिन न हो सका। उनका बलिदान कोई मजबूरीवश किया गया काम नहीं था क्योंकि अल्लामा इक़बाल उन्हें ‘तलवार का धनी‘ कहते हैं।

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