Wednesday , December 13 2017

अपार्टमेंट में रहने वाले हम नागरिक न तो भारत के हैं न अमरीका के हैं: रवीश कुमार

“मैं पुत्रविहीन, संपत्तिविहीन,सुखविहीन, समाजविहीन व्यक्ति हूं। मेरे पांच बेटे थे। सभी मर गए। मैं और मेरी बुढ़िया है बस। न दुख होता है न सुख की कल्पना है। इन सबसे ऊपर उठ चुका हूं। आपसे मिलने मेरठ से आया हूं। पूर्व जन्म का कुछ तो है कि मुझे लगता था कि आपके मेरे संस्कार एक हैं। आपसे मिलने का सपना पाल लिया। आज मिल लिया आपसे। मेरा काम हो गया। 91 साल की उम्र है। लीवर में कैंसर का फोड़ा है। बस मुझे लगा कि आपसे मिलना चाहिए। क्या आप मुझसे गुस्सा हैं?”

विहीनता से कोई परिचय दे सकता है, मैं तो इसी में गुम हो गया था, ध्यान ही नहीं रहा कि कमरे में आ चुके इस शख़्स ने मुझसे एक सवाल भी किया है कि क्या आप मुझसे गुस्सा हैं। ऊंची और खनकदार आवाज़ में फिर बोल उठे कि क्या आप मुझसे गुस्सा हैं? नहीं, अब मैं गुस्सा नहीं हूं। बस रात ठान कर सोया था कि रविवार को देर तक सोऊंगा। मुझे हफ्तों नींद नहीं आती है। कम सोता हूं लेकिन आप गेट पर ज़िद करने लगे कि मैं बूढ़ा हूं। मिलकर ही जाऊंगा। अब आपको बुला लिया है तो गुस्सा जा चुका है। मेरी किस्मत में सोना नहीं लिखा है तो इसमें आपका दोष नहीं। उनकी बातें जैसे दिल में नहीं रेटिना में धंस गई हों। मैं बस देखे जा रहा था। 91 साल की काया पर निर्मलता तैर रही थी। जैसे सारे दुख छू कर जा चुके हों। पीड़ा पहुंचाकर अपनी अपनी हार समेट कर दुख किसी और की काया की तरफ़ प्रस्थान कर चुके हैं।

चौबीस घंटा पहले अपने एक मित्र सुशांत झा से कह रहा था। मुझे हर दिन कई चिट्ठियां आती हैं। लोग मिलने आते हैं। कोई कविता भेजता है कोई किताब भेजता है। ये वो लोग हैं जो भारत कैसा हो, इसकी कल्पना करते हैं। ख़ुद किसी स्थिति में नहीं होते मगर इनके सपनों का भारत अजीब और अद्भुत लगता है। मैं इन्हें भारत विचारक कहता हूं। बीस बीस पेज लिखना, अपने भारत की कल्पना में। यह कोई साधारण बात नहीं है। उनके भीतर उस मिट्टी से कितना प्यार होगा जिसे वे किसी पत्रकार को पत्र लिखकर बदलने की कामना भेजते रहते हैं। भारत की कल्पना में लिखी गईं कुछ पुस्तकें पहचान बनाने की धूर्तता में लिखी गई होती हैं लेकिन कई पुस्तकों में वाकई भारत का सपना होता है। उनका भारत कैसा हो। ये चिंता सिर्फ धार्मिक कथावाचक नहीं करते, समाजशास्त्री नहीं करते, प्रधानमंत्रियों में प्रधानमंत्री मोदी नहीं करते, सेकुलरिस्ट ही नहीं करते, कम्युनल ही नहीं करते, कम्युनिस्ट ही नहीं करते बल्कि आम जन भी अपने भारत के कुछ और होने की निरंतर कल्पना करता रहता है। हम ऐसे कल्पनाकारों को मूर्ख समझकर भुला देते हैं मगर इनके भीतर एक पीड़ा होती है। एक कीड़ा होता है। यकीन होता है। काश उनके विचार अगर लोगों तक पहुंचे तो समाज बदल जाएगा। उनका भारत अच्छा हो जाएगा। ऐसे सभी चिन्तन यात्रियों को मेरा प्रणाम।

मेरा नाम आर एस शर्मा है। 1950 में बी आई एम एस किया था। आर्यवेद पढ़ा है। मगर कोई क्लिनिक पर नहीं आता है। मैं और मेरी बुढ़िया बैठे रहते हैं। बातें करते रहते हैं। वो अपने पांचों बेटे को याद कर रोती रहती है। पांच पांच बेटे मर गए हमारे। शर्मा जी ये बात हंसते हंसते ही बता रहे थे। मर गए। तो हमारा कोई नहीं। हमीं एक दूसरे के हैं। बस वो रोती है,रात को रोती है तो मैं कांप जाता हूं। देखो बेटो,संसार में पीड़ा तो होती है। यही तो प्रवृत्ति है। हम अकेले हैं। कोई नहीं आता। रिश्तेदार भी नहीं आते हैं। बेटियां हैं। वो आती हैं? मेरे इस सवाल का जवाब नहीं दिया। यही कहा कि मैं अपेक्षा और उपेक्षा से ऊपर उठ चुका हूं। रात दो बजे मेरी बुढ़िया रोने लगी। कहने लगी कि अगर तुम मर गए तो मेरा क्या होगा। मैं कहने लगा कि तुम मर गई तो मेरा क्या होगा। हम दोनों में से कोई तो पहले जाएगा, जो रह जाएगा उसे पानी कौन देगा। दो बुजुर्ग अपने एकांत में मौत की ही बात करते होंगे, यह सोच कर हाड़ कांप रहा था। उनके बीच पहले मर जाने का भय मृत्यु का भय नहीं लगा। अकेले जीवन जीने का भय मौत से भी बड़ा भय है।

रविवार देर तक सोने का ख़्याल कब का धुआं हो चुका था। मेरी नियति ही मेरी दुश्मन है। अब मैं आर एस शर्मा से दोस्ती करने लगा। मेरठ के माधवपुरम में रहते हैं। आपातकाल में जेल गए थे। इस कारण मुलायम सिंह यादव ने पेंशन बांध दी। मायावती की सरकार में पेंशन ख़त्म हो गई। अखिलेश यादव ने पेंशन शुरू कर दी। अब योगी जी देखो क्या करते हैं। मुझे नहीं लगता कि बंद करेंगे क्योंकि आपातकाल का पेंशन तो संघ के लोगों को भी मिलता है। और बंद हो गया तो बेटे हम भूखे मर जाएंगे। इसके अलावा हमारे पास कुछ नहीं है। 91 साल की उम्र में क्या होगा। पेंशन के पैसे से मैंने किताबें छपवाईं हैं। कालेजों में जाकर बांटता रहता हूं मगर कोई पढ़ता नहीं है। मुझे कोई क्यों पढ़ेगा। मुझे अफसोस भी नहीं होता है। कोई अवार्ड भी क्यों देगा। सारी ज़िंदगी झंझावातों में बीती है। निर्धनता अभिशाप है।

शर्मा जी ने बताया कि अस्सी साल तक एक पन्ना भी नहीं लिखा। उसके बाद काव्य रूप में पंद्रह किताबें लिख डालीं। इनमें से छह किताबें आपके लिए लाया हूं। एक आख़िरी किताब लिख रहा हूं। जीवन संध्या। उसमें मैं बुढ़ापे के बारे में लिखूंगा। वो जल्दी भेज दूंगा आपको। मेरी बुढ़िया की आंख ख़राब हो गई है, वो मेरी ग़लतियों को ठीक कर देती थी। पता है बेटे, चार क्लास पास थी जब शादी हुई। मैंने एक दिन कहा कि तू बता, पढ़ेगी। उसने हां कह दी। बेटे होते रहे, बेटे मरते रहे। वो इम्तहानों में पास होती रही। उसमें दसवीं पास की, बीए किया, अर्थशास्त्र में एम ए किया, मैंने बीएड भी करा दिया। मेरे प्रूफ में बहुत ग़लतियां होती हैं मगर उसकी भाषा एकदम ठीक है। मेरी ग़लतियां वो ठीक करती है, जबकि मैं उसका प्रोफेसर हूं। मेरी किताब में मिस्टेक बहुत होगी मगर भाव सही होंगे।

बुढ़िया वो हिकारत से नहीं कह रहे थे। गहरा प्रेम था जो इसी तरह से बाहर छलक रहा था। जीवन साथी का ज़िक्र बार बार आ रहा था। हम अपने घर में बैठा, उनके जीवन के एकांत को महसूस करने लगा। वे किसी दार्शनिक की तरह बात किये जा रहे थे। ऊंची आवाज़ से पूरा घर गूंजने लगा। कहने लगे प्रकृति मेरी मां है। त्रिभुवन मेरा देश है। मैं दुनिया का नागरिक हूं। मैं कैपिटलिज़्म के ख़िलाफ़ हूं। इसका नाश नज़दीक है। मैं मार्क्स का समर्थक नहीं हूं। उसने एक ग़लती की। वो निवृत्ति में चले गए। ईश्वर को नहीं माना। संसार तो प्रवृत्ति है। धर्म से कहां कोई बाहर है। मगर ये जो आप हिन्दू मुसलमान सुनते हैं ये सब धर्म नहीं है। ये उप-धर्म है। धर्म और विज्ञान में एडजस्टमेंट होना चाहिए। बेटा ये समाज बदलने जा रहे हैं। धर्म के सारे आडंबर टूट जायेंगे। मन की व्याकुलता में जो लिखा जाए वही साहित्य है। एसी कमरे से साहित्य नहीं निकलता है।

आर एस शर्मा को सुनता रहा। मुझे सुनना अच्छा लगता है तब जब सामने वाला सुनाने के प्रति ईमानदार हो। कहने लगे कि मेरठ में कई लोगों से आपका पता पूछा। जिससे पूछता वही कहता कि मुझे भी ले चलना। आपको लोग बहुत प्यार करते हैं। ये मैंने देखा। कुछ लोग आपसे नफ़रत भी करते हैं। उन्हें लगता है कि आप मोदी विरोधी हो। ये भी मैंने देखा। मुझे आप ठीक लगते हैं। आपकी बातों से लगता है कि आपने इस पूंजीवाद का संकट देख लिया है। मैं सबसे कहता हूं मोदी योगी सब सही हैं मगर ये भी फेल होंगे क्योंकि पूंजीवाद फेल हो चुका है। मैंने नई कल्पना की है। फिर वो नए विकल्प पर आ गए। उस पर फिर कभी। मगर कोई अपनी ग़रीबी अपना अकेलापन लेकर मेरठ से मुझसे मिलने आया हो, मैं भर गया। जाते जाते सर पर हाथ रख गए, बोले कुछ भी नहीं है मेरे पास। आशीर्वाद देकर जा रहा हूं। वो न डबडबाए न सकपकाए। जैसा कहा था वैसा ही हो चुके हैं। सुख और दुख से पार। मैं रोज़ रात को नौ बजे जब सुनता हूं तो इसी तरह आशीर्वाद देता हूं कि मेरा छठा बेटा आ गया है। घर जाकर बुढ़िया को बताऊंगा कि आपने मुलाकात की। घर में बिठाया। आप वैसे ही निकले जैसा हमने सोचा था।

अपार्टमेंट में रहने वाले हम नागरिक न तो भारत के हैं न अमरीका के हैं। इस तरह की नागरिकता में अब ऐसी आत्मीयता झूठी लगती है। क्या पता दुनिया अब भी उतनी ही आत्मीय है। हमीं अब उतने आत्मीय नहीं रहे। डा रामविलास शर्मा ने अपनी किताब फूट फूट कर मरघट रोया के पिछले पन्ने पर लिखा है- जहां तक मेरे परिचय की बात है, मेरा कोई परिचय नहीं है। फूट फूट कर मरघट रोया, शानदार है। शर्मा जी ने इसमें मरघट की व्यथा व्यक्त की है। श्मशान भी तंग आ गया है लाशों को जलाते जलाते। वो अपने यहां आने वाली लाशों की कहानी कहता है और फिर शिव से कहता है कि उसे भी जला दे। उनकी काव्य रचना का अंश दे रहा हूँ ।

शायद चौदह वर्ष उम्र थी,
वह भी तो जलने आई थी।
सुना गया मिट्टी में दबकर,
होश गंवाकर चिल्लाई थी।

लिटा उसे भैंसा बुग्गी में,
अस्पताल की ओर चले थे।
लगता था यह बच जाएगी,
सब ही ऐसे आस लिये थे।

देखा तभी सड़क के ऊपर,
बड़ा भयानक जाम लगा था।
चक्का जाम किया था ऐसा,
पूर्ण मार्ग अवरूद्ध हुआ था।

बुग्गी में लेटी वह लड़की,
दारूण दुख को भोग रही थी।
मैं मरने वाली हूं उसकी,
मूक वेदना फूट रही थी।

हाथ जोड़कर कहा पिता ने,
बुग्गी ले जाने दो भाई।
तुम ही इसके भाई बाप हो,
ईश्वर की सौगन्ध दिलाई।

जाम लगाने वालों ने बस,
इतना कहकर टाल दिया था।
नहीं जायेगी बुग्गी आगे,
गर्व भरा आदेश दिया था।

सुना गया फिर इसी बीच में,
लक्की ने दम तोड़ दिया था।
मात पिता ने पीट पीट कर,
अपना माथा फोड़ लिया था।

क्यों ये जाम लगे रहते हैं,
क्यों लड़की ने जीवन खोया।
यही सोचकर अनायास ही,
फूट-फूट कर मरघट रोया।

मरघट रो रहा है। उसके पास मृत्यु के अनेक किस्से हैं। आर एस शर्मा की इस किताब को पढ़कर लगेगा कि कोई साधारण कवि है। मगर आप ही बताइये मरघट की वेदना किसने सोची। अपने यहां आने वाली लाशों की कथा किस मरघट ने कही है। शर्मा जी के सुनाने का अंदाज़ भी अच्छा है। कवि सम्मेलनों में जाने लायक भी हैं। आपमें से कोई इनके एकांत को बांटना चाहे तो मैं फोन नंबर दे रहा हूं। 09421684671 । मदद करना चाहें तो आपका स्वागत है। ऐसे लोग ज़िंदगी में आकर किस्सों से भर देते हैं। राजनीति के सूखाड़ में जीवन नहीं है। जहाँ जीवन है वहाँ हम नहीं हैं।

 

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