Sunday , November 19 2017
Home / Editorial / श्री श्री रविशंकर ने यमुना नदी का जो हाल किया है…दस साल लगेंगे ठीक होने में: रवीश कुमार

श्री श्री रविशंकर ने यमुना नदी का जो हाल किया है…दस साल लगेंगे ठीक होने में: रवीश कुमार

“I just have one question for those making hullaballoo over the event. Why are you not concerned about the environment at Batla House? Commonwealth Games village was also built … two wrongs can’t make one thing right but what I am saying is that there is some motive behind this sudden protest against the event. Some ulterior motives…,” Sri Sri said.( india today)

श्री श्री रविशंकर का यह बयान है। इसके एक एक शब्द का ध्यान से पढ़िये और ज़रा ख़ुद को रिवाइंड कीजिए। पिछले साल का मार्च महीना था। दिल्ली में यमुना नदी के किनारे श्री श्री रविशंकर का समूह विश्व संस्कृति समारोह का आयोजन कर रहा था। क्या आपको अब याद आ रहा है कि उस वक्त क्या हुआ, जिस संस्कृति के प्रचार का वादा किया गया वो तीन दिनों के प्रसारण के बाद कहां है। याद तो वे सवाल भी नहीं आएंगे जो आयोजन को लेकर हुए थे कि यमुना के तटों को नुकसान पहुंच सकता है। मगर तब पर्यावरण को लेकर सवाल करने वाले और आयोजन के आलोचकों को मोदी विरोधी या हिन्दू विरोधी खांचे में डालकर नदी से जुड़े सवालों को किनारे लगा दिया गया। आयोजन हुआ और प्रधानमंत्री तक गए।

आज उस आयोजन की न तो स्मृति बची है न कोई ठोस असर। क्योंकि उसके बाद टीवी, राजनीति और सरकार ने न जाने कितने ऐसे महाआयोजन कर दिये हैं। जिनके प्रसारण के वक्त लगा कि भारत अगर है तो इन्हीं चंद पलों में हैं। उसकी भव्यता का हम साक्षात दर्शन कर रहे हैं। दरअसल प्रोजेक्ट ही यही है कि इन महाआयोजनों से स्म-तियों को स्थायी नहीं रहने देना है। हर दिन कोई नया महाआयोजन होगा। जब चीन के प्रमुख आए तो साबरमति के किनारे झूला झूला गया। उस आयोजन की कितनी भव्यता थी। अभी आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री आए तो उससे बेहतर तरीके से अक्षरधाम मंदिर दर्शन को भव्य बनाया गया। मंदिर सिर्फ बैकग्राउंड का काम कर रहा था। थोड़ा इन सबसे अलग करके सोचिये कि ये महाआयोजन क्या हैं। अतीत की दैनिक भव्यता का भ्रम पैदा करना इन महाआयोजनों का मकसद होता है। आपको याद कुछ नहीं रहेगा मगर एक भव्यता से दूसरी भव्यता के बीच आपको लगेगा कि कुछ हो रहा है और जो हो रहा है वह अतीत की गौरव गाथा की वापसी का आधुनिक रुपांतरण है। सारे आयोजनों में तकनीकि और तरीका तो वर्तमान का है, एकदम नया मगर असर में अतीत का कोरस गान है।

आपने एक बार धार्मिक पहचान बना ली, संस्कृति के हर सवाल का सर्वाधिकार आपके पास ही रहेगा। आप उसे नुकसान पहुंचाते हुए भी संरक्षक कहलायेंगे। जब चाहो नदियों को मां-मौसी बता दो, जब चाहो उनके तटों पर आयोजन करके नुकसान पहुंचा दो। कह दो कि हम नदी से बड़ा काम कर रहे हैं। फीफा फुटबाल कम से भी बड़ा आयोजन कर भारत की संस्कृति को दुनिया में पहुंचा रहे हैं। नदी कब बड़ी प्रतीक हो जाती है और कब सहायक प्रतीक हो जाती है इसके चयन का सर्वाधिकार तो इन गुरुओं के पास ही है अब। नदियों और तालाबों को बचाने वाले तो चुपचाप यहां वहां अपना काम कर गए, मगर एक खास किस्म की धार्मिक आक्रामकता की आड़ में इसकी राजनीति करने वालों ने घाट साफ करने के अलावा क्या किया। पटना में छठ के वक्त लोग मिलकर घाटों को चकाचक कर देते हैं मगर उससे गंगा साफ हो जाती है, गहरी हो जाती है?

जब श्री श्री रविशंकर यमुना किनारे आयोजन कर रहे थे तो सभी सवालों को धार्मिक पहचान या राजनीति का सहारा लेकर खारिज कर रहे थे। अपनी जानकारी पर किसी को इतना विश्वास क्या सिर्फ इसलिए हो जाता है कि संस्कृति और धर्म का नाम लेंगे तो पूरी भीड़ उन्हीं के पक्ष में होगी? भीड़ के आ जाने से यमुना को लेकर जो सवाल उठाए गए थे क्या वे उखड़ गए?

बिल्कुल नहीं। इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर है कि नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई थी। उसकी रिपोर्ट कहती है कि श्री श्री के आयोजन से यमुना तट को जो नुकसान पहुंचा है, उसे ठीक करने में दस साल लग जायेंगे। इसे ठीक करना ही होगा तो 42 करोड़ रुपये ख़र्च होंगे। ये 42 करोड़ तो जनता के टैक्स से ख़र्च होंगे। यमुना के तट की पारिस्थितिकी नष्ट हो गई है। मतलब वहां के पेड़ पौधे, जीव जंतु सब। इस कमेटी के प्रमुख कोई हिंदू विरोधी नहीं हैं। केंद्र सरकार के जल संसाधन मंत्रालय के सचिव शशि शेखर हैं। मोदी सरकार के अंग हैं। इनकी रिपोर्ट कहती है कि यमुना तट को वापस अपनी स्थिति में लाने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर और बहुत जल्दी काम शुरू करने होंगे। एक्सप्रेस ने आर्ट आफ लिविंग के किसी का बयान छापा है जिनका कहना है कि रिपोर्ट मीडिया को लीक की गई है। बदनाम करने के लिए।

प्रधानमंत्री ने भी वहां पहुंच कर ऐसी आक्रामकता का प्रदर्शन किया था जैसे हिन्दू संस्कृति की आलोचना करने वालों को परास्त करके वहां पहुंचे हों। उन्होंने और राष्ट्रपति ने जाकर आयोजन को मान्यता ही दी। आस्था की इस होड़ में आम आदमी पार्टी भी साथ थी,अब भी है। कुलमिलाकर आस्था सबको कमज़ोर ही बना रही है। अब क्या श्री श्री इस रिपोर्ट को रिजेक्ट कर देंगे, मोदी सरकार के एक सचिव को हिन्दू विरोधी या बाटला हाउस का नागरिक बता कर खारिज कर देंगे? आर्ट आफ लिविंग की बात सही है कि रिपोर्ट सामने आने दीजिए। अगर मीडिया रिपोर्ट सही है तो फिर से इस पर पब्लिक में ही बहस होनी चाहिए।

श्री श्री रविशंकर ने तब बाटला हाउस का नाम लिया था। बाटला हाउस यमुना के तट से बहुत दूर है और अवैध जगह नहीं है। लेकिन एनकाउंटर के कारण उस जगह की पहचान एक समुदाय विशेष से जुड़ी है। मुसलमान से जुड़ी है। बाटला हाउस ने यमुना का अतिक्रमण नहीं किया है। उस इलाके की सामूहिक पहचान जामिया नगर की है मगर उसके भीतर तमाम मोहल्ले हैं जिनके अलग अलग नाम हैं। वो सारा इलाका जामिया नगर नहीं है। इन इलाकों के पीछे के लोगों ने यमुना का अतिक्रमण किया है। ट्राइब्यूनल को उसके बारे में भी सख़्त फैसला लेना चाहिए। यमुना के किराने अतिक्रमण सिर्फ बाटला हाउस ने नहीं किया है। दिल्ली में ही कई जगहों पर अतिक्रमण हुआ है। खेल गांव के नाम पर बने करोड़पतियों के मकानों ने भी किया है। अक्षरधाम को लेकर भी विवाद हुआ था। एक अदालत नुकसान बताती है, एक वैध बना देती है। अदालतों में ही इतना कंफ्यूजन हैं। फिर भी, ट्राइब्यूनल को ईमानदारी से यमुना तट के किनारे बन रहे तमाम अवैध अतिक्रमणों को तोड़ने का फैसला देना चाहिए। वर्ना सारे सवाल वहीं बाटला हाउस बनाम अक्षरधाम के फेर में पड़कर अनुत्तरित रह जायेंगे। अगर ग्रीन ट्राइब्यूनल को यमुना को बचाना है तो उसे फैसला यमुना के लिए देना चाहिए। लागू न हो तो अपनी दुकान बंद कर देनी चाहिए। कह देना चाहिए कि ट्राइब्यूनल छूट देता है कि यमुना के साथ जो करना है कीजिए, हमें कोई आपत्ति नहीं होगी। हम अपना वक्त बर्बाद नहीं करेंगे।

महत्वपूर्ण श्री श्री रविशंकर नहीं हैं। उनके आलोचक नहीं हैं। यमुना है। वो हमसे पहले से है इसलिए हम सबका दावा है। यमुना गाय नहीं है। गाय तो दूसरी आ जाएगी, यमुना नहीं आएगी। गाय के बचाने के नाम किसी आदमी को मार दो। वही हो रहा है यमुना को बचाने के नाम पर इस सवाल को हिन्दू मुस्लिम का सवाल बना दो, बाकी काम तो हो ही जाएगा। आप मथुरा वालों से पूछिये जिनका हर संस्कार यमुना से जुड़ा है। गुजरात में कृष्ण के बाल रूप को मानने की परंपरा है। इससे जुड़े समुदाय की भी ख्वाहिश है कि उनकी यमुना साफ हो जाएगा। उनके दैनिक स्मरणों में यमुना रोज़ बहती है। दिल्ली वालों से भी पूछिये, वो दूर चले गए हैं मगर हैं तो यमुना के किनारे ही।

हमने नदियों को बचाने का सबसे बड़ा प्रतीक गंगा को बनाकर सारे सवालों को दिल्ली से दूर शिफ्ट कर दिया है। नदियों को बचाने की राजधानी बनारस हो गई है, बनारस का हाल दिल्ली जैसा ही है। गंगा को बचाने के नाम पर गंगा किनारे की आरती का सीधा प्रसारण कर दो। आरती तो तब भी भव्य ही लगेगी। सुकून देने वाली लगेगी। क्योंकि उस वक्त गंगा का पानी तो दिखता नहीं है। यमुना को बचाने का हिन्दुत्व तो समझ आता है, यमुना को नुकसान पहुंचाने की ज़िद का हिन्दुत्व समझ नहीं आता है। नदी बच नहीं रही है, नदी को बचाने के लिए भव्य कार्यक्रम बन रहे हैं। जैसे जीवन की वास्तविकता जैसे सीरीयल में शिफ्ट हो गई है, संस्कृतियों और नदियों की वास्तविकता इन भव्य आयोजनों में शिफ्ट हो गई है। एक दिन आपको एकता कपूर के छोड़े हुए सेट के खंडहर ख़ूब दिखाई देंगे। उनके से कुछ खंडहर किसी और लाइव प्रोग्राम के सेट बनकर आयेंगे। आ भी गए हैं। आपने आई पी एल का सेट नहीं देखा जहां विशेषज्ञ क्रिकेट का ज्ञान देते रहते हैं। वही है हमारी भव्यता। क्रूर, भद्दी और विशालकाय।

 

TOPPOPULARRECENT