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छेड़खानी की मानसिकता का इलाज अगर थाने से होता तो निर्भया कांड के बाद बने कानून से ही सब रूक जाता

आदरणीय और संस्कारी यूपी की जूलियटों,

मैं जानता हूँ तुम जूलियट नहीं हो। तुम राधा हो, अनुराधा हो, पुष्पा हो, कमला हो, सुंगधा हो,चंपा हो, बेला हो, वंदना हो, पूजा हो, अर्चना हो, आरती हो,मँगला हो,संध्या हो,गरिमा हो,प्रतिमा हो। ये मत सोचना कि मैं पूजा सामग्री की सूची बना रहा हूँ। तुम कल्पना भी हो,तुम्हीं सपना भी हो। तुम कविता भी हो, तुम छवि भी हो। तुम्हीं भाग्यश्री हो और तुम्हीं भैरवी। तुम क्या नहीं हो जो तुम नहीं हो। तुम हो तो भी तो नहीं हो।

तुम गोंडा की हो या बहराइच की, जालौन की हो या खीरी की, मिर्ज़ापुर की हो या जौनपुर की। मैं नहीं जानता यूपी में तुम कहाँ की हो। जहाँ की भी हो मगर तुम सबमें कोई ख़ास अंतर नहीं है। तुम पर निगाह रखने वाली नज़र एक ही है। तुम शीशा तोड़ सकती हो, दिल तोड़ सकती हो मगर परंपरा नहीं तोड़ सकती हो। तुम दोस्त नहीं हो सकती। एक प्रिंसिपल ने कहा है कि लड़कियों के ब्वायफ्रैंड नहीं हो सकते। आलोचकों को छोड़ों, अपने घरों में पता करो, सब प्रिंसिपल के समर्थक निकलेंगे। मेरी नज़र में तो ऐसे लोग घोंचू होते हैं मगर समाज जैसा है वैसा है। इसे लेकर तुम्हें भ्रम नहीं होना चाहिए बल्कि तुममें से भी ज़्यादातर ऐसी बातों की समर्थक निकल सकती हैं। इसलिए तुम देविका, वेदिका, दीपिका, गीतिका हो सकती हो,तुम जूलियट नहीं हो। जो तुम नहीं है मैं उसी नाम से ये पत्र लिख रहा हूँ।

तुम्हारे यूपी में पार्क बहुत अच्छे हैं। पुरुष महापुरुष, विचारक- प्रचारक, शहीद-सांसद, वन-उपवन, जीव-जंतु, देवी-देवता हर कोटे के लोगों के नाम से पार्क बने हैं। दयानंद सरस्वती उद्यान, दीनदयाल पार्क, गांधी पार्क, नेहरू पार्क, इंदिरा पार्क, लोहिया पार्क, अंबेडकर पार्क, चंद्रशेखर आज़ाद पार्क, भगत सिंह पार्क। नींबू पार्क,हाथी पार्क, दिलकुशा पार्क, शिव पार्क, दुर्गा पार्क,विंध्यवासिनी पार्क, विक्टोरिया पार्क और आगरा का कुत्ता पार्क। राजनीतिक विचारों और पर्यावरण को बचाने के लिए ये पार्क बनाए गए मगर इनके पेड़ों के नीचे परंपराएँ टूटने लगीं। इस हद तक ही टूटीं कि तुम कुछ देर के लिए अपने दोस्त को जानने समझने का प्रयास किया। सहचर के आनंद का अहसास किया जो इस धरती पर आए हर प्राणी का जैविक और दैविक(!) अधिकार है। उस छोटे से लम्हें में तुमने कितना जीया होगा, तुम्हें पता होगा। हमारा समाज लड़का लड़की को देखकर सेक्स क्रिया की कल्पना से आगे नहीं सोच सकता। तुम अपने दोस्त के साथ ऐसे ही देखी जाती रही हो और देखी जाओगी। यह तो तुम्हें पता ही होगा, तब भी कुछ ने इन बंदिशों को तोड़ अपने लिए दोस्त बनाए होंगे। बराबरी से जीने का स्वाद चखा होगा। तुममें से बहुत आगे चलने की हिम्मत न जुटा सकी होगी तो कोई बात नहीं। एक सफल प्रेम के पीछे अनेक असफल प्रेम की दुआयें होती हैं।

वनों-उपवनों में बिताये याद उन पलों को याद करो, दोनों कितना डरी सहमी रहती होते होगे। क्या तब तुमने अंबेडकर और लोहिया के विचारों को जानने का प्रयास किया? गांधी और दयानंद सरस्वती को भी जानने का प्रयास नहीं किया होगा। तुम और तुम्हारे ‘सो कॉल्ड’रोमियो राजनीति को खेल समझते रहे होंगे। मगर समझ नहीं सके कि यही राजनीति तुमसे खेल रही है। जब तुमने इसे बदलने की कोशिश नहीं की तो शिकायत किस बात की। क्या पता तुम सब एंटी रोमियो दस्ते की समर्थक निकल जाओ। विरोध करोगी तो समाज और परिवार आवारा कहेगा। वैसे ही जैसे नोटबंदी का विरोध भ्रष्टाचार का समर्थन करना होता है। क्या पता छेड़खानी से तुम त्रस्त भी हो। इसमें सच्चाई तो है। मगर छेड़खानी की मानसिकता का इलाज अगर थाने से होता को निर्भया कांड के बाद बने सख्त कानून से ही सब रूक जाता। समझो गेम को। तुम्हें मार खाने लायक बनाया जा रहा है। कोई अपने घर को ख़राब नहीं कहना चाहता। ज़माने को सब ख़राब कहना चाहते हैं।

सबको पता है कि पार्क या मॉल में घर, स्कूल और कालेज से भागकर आए तुम बस एक प्रेमी हो। नागरिक नहीं हो। नागरिक होते तो पुलिस पूछने से पहले सोचती। हमारी पुलिस संस्कृति की भी रक्षा करेगी। संविधान की तो नहीं कर पाई। प्रेमी होना इस समाज में अपराध है। भक्ति प्रेम ठीक है। तुम्हारे दोस्त बनाने के अपने फैसले मासूमियत से भरे हो सकते हैं मगर उनमें प्रेम की संभावना विकसित न हो जाए इसे लेकर समाज मासूम नहीं है। आज से नहीं दस साल से यूपी के पार्कों में बैठे जोड़ों पर पुलिस और प्रेम विरोधी राजनीतिक दलों के हमले हो रहे हैं। प्रेमियों को पार्क और थाने में मुर्गा बनाने का चलन अपने हिंदुस्तान में हैं। फ्रांस में नहीं। तभी तो हम खुशहाली के मामले में 121 वें नंबर पर हैं। जिस मुल्क में प्रेम करना इतना मुश्किल हो वह खुशहाली के मामले में नंबर वन नार्वे जैसा कैसे हो सकता है।

तुम्हें जब पार्कों में पीटा जा रहा था, चैनलों पर पीटते हुए दिखाया जा रहा था तब समाज इसे मौन सहमति दे रहा था। भले ही टीवी का एंकर पीटने वालों का विरोध कर रहा था मगर समाज उन दृश्यों को देखकर आश्वस्त हो रहा था। इसलिए दिल्ली वालों के चक्कर में मत आओ। अपने समाज को पहचानों। वो कब से एंटी रोमियो बना बैठा है। यह पूछो कि एंटी जूलियट क्यों नहीं बना। क्योंकि वो पुलिस को छूट नहीं देना चाहता कि उसकी बेटियों को मारे। उन्हें थाने में बिठाया जाए। अब एंटी रोमियो के नाम पर सिर्फ लड़के थाने लाए जाएंगे। तुम्हारा किसी से दिल टूटे या किसी से ऊब जाए तो आराम से छेड़खानी का आरोप लगा देना, बाकी काम पुलिस कर देगी। तुम्हारी डायरी,शायरी, कविताएं, इनबॉक्स में लिखे तुम्हारे सपने अब सब थानों की ज़द में हो सकते हैं। सब सबूत होंगे कि तुमने भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़ जाकर ब्वायफ्रैंड बनाने की कोशिश की। पता नहीं तुम कब किसके साथ पकड़ी जाओ और ये सब सबूत के तौर पर निकाले जाने लगे। तुम्हें अब हर समय साबित करना होगा कि तुम किसी रोमियो की जूलियट नहीं हो। तुम देवी हो। जूलियट नहीं हो।

मुंबई के समंदर के किनारे तमाम जोड़े छाते लेकर लहरों को गिनते रहते हैं। ज़माने की तरफ पीठ किये इन जोड़ों को लेकर मुंबई भी परवाह नहीं करती है। वहां वहाँ बीजेपी शिवसेना की हुकूमत है। मुंबई में प्रेमियों का पीछा करने वाला एंटी रोमियो दल नहीं है। क्योंकि इसमें वहाँ के समाज की सहमति नहीं है। अपने यूपी से पूछो कि मुंबई में एंटी रोमियो दस्ता क्यों नहीं है। पूरे देश में क्यों नहीं है?

प्रेम की संभावनाएं दीवारों के पार जाती है। जातियां टूटने लगती हैं। रोमियो के नाम पर दहेज़ से कमाने का सपना ध्वस्त हो जाता है। इसके कारण एक दब्बू दुल्हन और अपार दहेज़ की संभावनाएं ध्वस्त हो रही थीं। अगर यूपी की जूलिएटें किसी से भी प्यार कर अपना फैसला लेने लगेंगी तो रोमियो के मां बाप के सपने ध्वस्त हो जाएंगे। कार, पलंग, आलमारी, यहाँ तक कि चार हज़ार की चिरकुट घड़ी तक का नुक़सान हो जाएगा। इसलिए लड़कों के माँ बाप नहीं चाहते कि उनका बेटा तुमसे दोस्ती कर नुक़सान कर दे। तुम चाहो तो जहाज़ उड़ा लो मगर दहेज़ नहीं मिटा सकती हो।

इसलिए यह जान लो कि एंटी रोमियो दल यूपी के समाज की मौन सहमति का परिणाम है। यकीन न हो तो अपने घरों में पता कर लो। इसके लिए तुम किसी दल या किसी सरकार को दोष मत दो। उसने सबको बताकर यह काम किया है। बकायदा होर्डिंग लगा था कि एंटी रोमियो दल बनेगा। इसके जवाब में सपा बसपा और कांग्रेस का कोई होर्डिंग नहीं लगा था। जबकि सपा और बसपा पार्क बनाने वाली पार्टियाँ हैं। क्या पता वे भी सहमत हों! तभी तो वे आज भी चुप हैं।

आलोचक भी ज़रा यूपी में पता कर लें कि कौन एंटी रोमियो दस्ते का विरोधी है। इस एक दस्ते से परिवारों के भीतर लड़कियों पर नियंत्रण को राजनीतिक मंज़ूरी मिल गई है। कोई भी थाने जाकर शिकायत कर देगा कि मेरी बेटी का दोस्त रोमियो है। बस पुलिस अपने काम पर लग जाएगी। अभी तो पुलिस को पार्कों से रोमियो उठाने हैं, जल्दी ही घरों से लोग अपने अपने रोमियो की लिस्ट लेकर आएंगे।

इस बात के प्रमाण किसके पास है कि छेड़खानी करने वाले रोमियो ही होते हैं। घरों में यौन हिंसा का रिकार्ड देख लो। पार्कों से निकल रहे घबराये जोड़े ख़ुद के साथ हो रही छेड़खानी से तंग रहते हैं। वे दूसरों को क्या छेड़ेंगे। छेड़ने वाला बल्कि उसी पार्क में घूम रहा होता जहां जोड़े बैठे मिलते हैं। पकड़ना उन्हें था मगर निशाने पर तुम आ गई। जल्दी ही पुलिस को बुलाने वाला एक गैंग भी बन जाएगा तो जोड़ों से वसूली करेगा। मां बाप को पता चलेगा कि उनका बेटा रोमियो, एंटी रोमियो दस्ते के हाथों पकड़ा गया है तो वे इज़्ज़त बचान के लिए नज़रानों की रकम मोटी करते चले जाएंगे। इससे नौजवानों के दिल दिमाग पर क्या असर पड़ेगा, इसकी परवाह किसी को भी नहीं है। यूपी की जवानी से भी ख़ास उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वो कोई क्रांतिकारी आदर्शवादी दस्ता है। उसे मालूम है कि इज़्ज़त के नाम पर क्या क्या बर्दाश्त किया जा सकता है। हो सकता है कि यूपी के नौजवान भी एंटी रोमियो दस्ते के समर्थक निकलें। ये और बात है कि वे पूरे दिन बालकनी में किसी जूलिएट के दीदार के लिए खड़े नज़र आएंगे।

राजनीति में जिस कथित रूप से जिस जातिवाद के टूटने का जश्न मनाया जा रहा है कि यूपी से कोई न्यू इंडिया निकल आया है, वो न्यू इंडिया ही तो है जहाँ एंटी रोमियो दस्ता बना है ताकि जातियाँ बनी रहें। तुम्हें किसी ने पार्क में जाने से नहीं रोका है। बिल्कुल जाओ। वहां रिटायरमेंट के बाद तोंद पिचकाने के लिए सामूहिक रूप से अट्टाहास कर रहे बुजुर्गों की सेवा करो। उन्हें प्रणाम करो। उनके पांव दबाओ। उनसे सीखो। वही तुम्हारे संभावित ससुर हैं। वहीं तुम्हारे मौजूदा पहरेदार हैं। उनकी निगाह में तुम जूलियट उनके अच्छे समाज को बिगाड़ रही हो। तुम आजकल की ‘वो’ लड़कियां हो जो कल वाली लड़की की तरह सहनशील नहीं हो। पतनशील हो। यह बात उनमें से कइयों ने तुम्हें ठीक से घूर लेने के बाद ही कही होगी।

यूपी की जूलिएटो, तुम पार्क में बेशक जाओ। वहां के पेड़ों से प्रेम करो। पक्षियों से प्रेम करो। घासों और पत्तियों से प्रेम करो। अशोक से प्रेम करो, यूकिलिप्टस से प्रेम करो। प्रेम करने के लिए कितना कुछ है। ज़रूरी नहीं है कि तुम ‘प्रेम’ ही करो। मेरी बात मानो तो तुम यूपी के रोमियो को आज़ाद कर दो। उनमें आवाज़ उठाने का दम नहीं है। वे तुमसे चोरी चुपके अपराधी की तरह मिलने आएंगे। जो मुलाकात तुम्हें अपराधी बनाए या तो उसका विरोध करो या फिर छोड़ दो। प्रेम में एक बात का ख़्याल रखना। रोमिया चाहे कितना भी स्मार्ट क्यों न हो, उसकी अंग्रेज़ी चाहे कितनी अच्छी क्यों न हो वो अगर बुज़दिल है तो वो प्रेमी नहीं है। वो अगर बाग़ी नहीं है तो प्रेमी नहीं है। वो मूर्ख है। वाहियात है। ऐसी जवानी पर लानत भेजो। अपनी जवानी पर भी तोहमत भेजो।

तुम्हारा

रवीश कुमार

 

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