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पूंजीपतियों को छोड़ अब बैंक आम जनता की कमाई पर हाथ डाल रहे हैं ताकि ख़ुद को बचा सकें: रवीश कुमार

बिजनेस अख़बारों में एक चीज़ नोटिस कर रहा हूं। अर्थव्यवस्था में गिरावट की ख़बरें अब भीतर के पन्नों पर होती हैं। कोर सेक्टर में आई गिरावट की ख़बर पहने पन्ने पर छपा करती थी लेकिन इसे भीतर सामान्य ख़बर के तौर पर छापा गया था।

रोज़गार के लिए सभी की निगाहें मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर होती हैं। इस बार जो आंकड़े आए हैं उनसे पता चलता है कि मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की प्रगति आठ साल में सबसे कम है। जुलाई महीने का आकड़ा है। जी एस टी को कारण बताया गया है। निक्के के परचेज़िंग मैनेजर इंडेक्स से ये बात सामने आई है। इसके कारण नौकरियों में भी कटौती हुई है। बहुत ज़्यादा नहीं मगर हुई है। जून में पी एम आई(PMI) 50.9 था, जुलाई में घटकर 47.9 प्वाइंट हो गया। इसका मतलब है कि फैक्ट्री उत्पादन में संकुचन आया है। जीएसटी कारण है तो फिर आटोमोबाइल सेक्टर में 15 फीसदी का जंप कैसे आया। किसी एक सेक्टर में इतना उछाल आया फिर भी कुलमिलाकर आंकड़े में तीन प्रतिशत की गिरावट भी आ गई?

इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन इंडेक्स(IIP) भी मई में 1.7 प्रतिशत था। जबकि यह अप्रैल में 3.1 प्रतिशत था। जून के आंकड़ों के अनुमान में भी गिरावट की बात हो रही है।

जबकि कि खुदरा मुद्रास्फीति पांच साल में सबसे न्यूनतम स्तर पर है। सरकार कहती है कि महंगाई कम हो रही है। तब तो इसका मतलब यह हुआ कि लोगों के हाथ में पैसा आना चाहिए, जिसे वो खर्च कर सकते हैं, जमा कर सकते हैं। ऐसा तो नहीं हो रहा है। महंगाई न्यूनतम पर पहुंच जाने के बाद भी मांग में कमी की बात क्यों सामने आ रही है।

आप जानते हैं कि भारतीय स्टेट बैंक ने बचत खातों की ब्याज़ दर में कटौती की है। इन खातों में पेंशनधारियों का जीवन होता है। विचित्र शर्त है कि एक करोड़ से अधिक होगा तो चार फीसदी ब्याज़ मिलेगी और उससे कम होगा तो 3.5 प्रतिशत। बैंक आम जनता की कमाई पर हाथ डाल रहे हैं ताकि ख़ुद को बचा सकें। बैंकों की कमाई लोन देने से होती है। लोन का उठान घट गया है। उद्योग धंधों के लिए लोन नहीं लिए जा रहे हैं दूसरी तरफ नोटबंदी के कारण बैंकों में सारे नोट पहुंच गए हैं जिसके कारण उन्हें सब पर ब्याज़ देने पड़ रहे हैं। इस फैसले को मूर्खतापूर्ण कहने से हर कोई डरता है लेकिन इसके नतीजे अपने आप वही कह रहे हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि बैंकों को जमा राशि पर बहुत ब्याज़ देने पड़ रहे थे। कटौती की होड़ से उन्हें थोड़ी राहत मिलेगी। सरकारी बैंक ब्याज़ कम दे रहे हैं और प्राइवेट बैंक ज़्यादा ब्याज़ दे रहे हैं। या इलाही ये माजरा क्या है!

बैंक अपना एनपीए कम करने के लिए कंपनियों की संपत्ति नीलाम करने के लिए मुकदमे में चले गए हैं। मुकदमों का इतनी जल्दी नतीजा तो आने से रहा। बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि सरकारी बैंकों को मार्च 2019 तक करीब दो लाख करोड़ रुपये चाहिए। ताकि वे एन पी ए के तहत गायब हो चुके पैसे की भरपाई कर सकें। ये तो होने से रहा। एन पी ए को लेकर भी कुछ नहीं होने वाला है। जो पैसे लेकर गए हैं वो गए। एक दो केस में पकड़ा-पकड़ी होगी, बाकी कुछ नहीं।

डिजिटल पेमेंट का प्रचार खड़ा किया जा रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड के किसी कोने में छपी ख़बर बताती है कि जुलाई महीने में डिजिटल पेमेंट में 11 प्रतिशत की गिरावट आई है। जून में 113.9 लाख करोड़ रुपये का हस्तांतरण डिजिटल पेमेंट से हुआ। जुलाई में 100.9 लाख करोड़ ही हो सका। ये रिज़र्व बैंक का आंकड़ा है।

जब भी अर्थव्यवस्था में गिरावट के संकेत मिलते हैं सरकार राजनीतिक रूप से बड़े बड़े इवेंट रचने लगती है। हो सकता है कि अब यह बात हो कि वित्त वर्ष जनवरी से दिसबंर कर 150 साल की परंपार तोड़ी जाएगी। इसे लेकर कई महीने तक हंगामा चलेगा और हम सब साल भर से पहले फिर से टैक्स भरने लगेंगे। सी ए को फीस देने लगेंगे। या फिर राजनीति में आयकर विभाग या सीबीआई के लोग कुछ गुला खिला देंगे किसी विरोधी का गला धरकर। मेरी राय में सीबीआई और आईटी का बीजेपी में विलय कर देना चाहिए।

इस बीच अरविंद पनगढ़िया नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद छोड़ भारत से ही निकल लिए। वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी की शानदार नौकरी नहीं छोड़ पा रहे हैं। वहां की नौकरी में उन्हें आजीवन स्थायीत्व हासिल है। यहां वे वकालत करते हैं कि कंपनियों को निकलाने की छूट होनी चाहिए। सरकार में नौकरी कम होनी चाहिए। पेंशन कम होना चाहिए लेकिन हमारे आपके लिए वकालत करते हुए भाई साहब अपने लिए ठीक उल्टा बल्कि सबसे बढ़िया वाला जुगाड़ कर रहे थे।

बाकी कुछ और भावुक मुद्दे भी लांच हो रहे हैं ताकि नौकरी और बेरोज़गारी पर ध्यान जाए ही न।

 

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