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‘कैश लेस की बात करने वाली मोदी सरकार सौ फीसदी डिजिटल राजनीतिक चंदे की बात क्यों नहीं करती?’

मार्च में जब वित्त मंत्री लोकसभा में वित्त विधेयक पेश करते हुए यह कह रहे थे आज़ादी के सत्तर साल बाद भी देश राजनीतिक दलों के चंदों क लिए पारदर्शी प्रक्रिया विकसित नहीं कर सका है जो मुक्त और निष्पक्ष चुनावों क सिस्टम के लिए अनिवार्य है।

ज़्यादातर लोगों का ध्यान इसी नेक बात पर रहा कि सत्तर साल बाद कुछ नया और बेहतर हो रहा है लेकिन वित्त मंत्री जिस सिस्टम की बुनियाद रख रहे थे, उसके ही पारदर्शी होने पर सवाल उठने लगे हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने कहा है कि चुनावी चंदे में कोरपेरेट कंपिनयों की तरफ से चंदा देने की सीमा हटाने से पारदर्शिता को नुकसान पहुंचा है। नए कानून के अनुसार कारपोरेट कंपनियां अपने मुनाफ़े का कितना भी प्रतिशत किसी दल को चंदे के तौर पर दे सकती हैं। पहले वो 7.5 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं दे सकती थीं और उन्हें अपने बहीखाते में दर्ज करना होता था ताकि उसकी आडिट हो सके। अब उन्हें यह छूट होगी कि बहीखाते में भी दर्ज न करें कि किसे चंदा दिया है और कितना दिया है।

न भी दिमाग़ लगाकर सोचें तो पारदर्शी सिस्टम बनाने के नाम पर इससे बड़ा छल क्या हो सकता है। नमीस ज़ैदी साहब का जो बयान इंडियन एक्सप्रेस में छपा है, उसकी भाषा चिंता की है जबकि वे बात ख़तरे की कर रहे हैं। ज़ाहिर है उनकी अपनी सीमा या मर्यादा होगी मगर ख़तरे की भाषा ख़तरे की होनी चाहिए।

कंपनी एक्ट में बदलाव से अब होगा ये कि कोई कंपनी किसी पार्टी को चंदा देगी, बदले में उसे ठेका मिलेगा, ठेके का प्रोजेक्ट पांच सौ का हज़ार करोड़ कर दिया जाएगा ताकि उसे पचास की जगह तीन सौ करोड़ का मुनाफा हो सके और यह पैसा सीधे किसी पार्टी के खाते में चला जाएगा या किसी नेता का हो जाएगा।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा है कि इस सुधार से बहुत सी फर्ज़ी कंपनियां बन जाएंगी जिनके ज़रिये पार्टियों को चंदा दिया जाने लगेगा। इस वक्त सरकार फर्ज़ी कंपनियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रही है जिन्हें हम सेल कंपनी कहते हैं मगर इस कार्रवाई का ये मतलब नहीं है कि सेल कंपनी बनने की संभावना समाप्त कर दी गई है। जो पुरानी हैं उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई कर वाहवाही लूटी जा रही है। इन कंपनियों के ज़रिये विदेशी पैसा भी भारत के चुनावों में बहने लगेगा।

यह वक्त ही ऐसा है कि सरकार कुछ भी करती है, लोगों को संदेह कम होता है। यही इस सरकार की सबसे बड़ी कामयाबी है। वर्ना पहले 20,000 तक चंदा देने वाले का नाम दर्ज नहीं होता था। अब इसे घटाकर 2000 कर दिया गया है। सुनने में तो ये क्रांतिकारी कदम लगता है मगर साधारण दिमाग़ से समझा जा सकता है कि दो हज़ार के दस नोट अलग अलग नाम से दिये जा सकते हैं। सरकार हर बात में डिजिटल ट्रांसेक्शन की वकालत करती है, सबसे पहले वो तमाम राजनीतिक दलों के लिए सौ फीसदी डिजिटल चंदे की बात क्यों नहीं लाती है। 2000 की सीमा को भी ख़त्म कर देना चाहिए।

खुशी की बात ये है कि सभी राजनीतिक दल केंद्र सरकार के इस बदलाव का विरोध नहीं कर रहे हैं। आप पारदर्शी पारदर्शी का जाप सुनते रहिए।

 

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