Friday , July 20 2018

रविश कुमार का ब्लॉग – यह तो हद दर्ज़े का घोटाला चल रहा, एक किस्म की डकैती है

बैंक कर्मचारियों के सैंकड़ों मेसेज पढ़ गया. उनकी व्यथा तो वाकई भयानक है. क्या किसी को डर नहीं है कि दस लाख लोगों का यह जत्था उसे कितना राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है? कई दिनों से हज़ारों मेसेज पढ़ते हुए यही लगा कि बैंक के कर्मचारी और अधिकारी भयंकर मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं. उनके भीतर घुटन सीमा पार कर गई है.

आज जब बैंकों को बेचने की बात हो रही है तो याद आया है कि तब क्यों नहीं हो रही थी जब नोटबंदी हो रही थी. जब बैंक कर्मचारी रात-रात तक बैंकों में रूक कर देश के साथ किए एक राष्ट्रीय अपराध से लोगों को बचा रहे थे. कोरपोरेट का कप्तान तब क्यों नहीं बैंकों को बेचने की बात करता है जब वह दबाव बनाकर सरकारी बैंकों से लोन लेता है. तब बैंकों को बेचने की बात क्यों नहीं हुई जब प्रधानमंत्री के नाम से बनी योजनाओं को लोगों तक पहुंचाना था?

एक बैंक ने अपने कर्मचारियों से कहा है कि अपने बैंक का शेयर खरीदें. पहले भी बैंक कर्मचारियों को अपने शेयर देते रहे हैं, मगर इस बार उनसे जबरन खरीदने को कहा जा रहा है. कुछ मामलों में सैलरी की क्षमता से भी ज़्यादा शेयर खरीदने के लिए विवश किया जा रहा है. क्या इस तरह से बैंकों के गिरते शेयर को बचाया जा रहा है? ज़ोनल हेड के जरिए दबाव डाला जा रहा है कि शेयर खरीदे गए या नहीं.

उस बैंक कर्मचारी ने बताया कि सैलरी की क्षमता से तीन गुना ज़्यादा दाम पर शेयर खरीदने के लिए मजबूर किया गया है. इसके लिए उनसे ओवर ड्राफ्ट करवाया जा रहा है. उनकी एफ डी और एल आई सी पर लोन दिया जा रहा है ताकि वे एक लाख डेढ़ लाख रुपये का शेयर खरीदें. यहां तक कि 7000 कमाने वाले स्वीपर पर भी दबाव डाला जा रहा है कि वह 10,000 रुपये का शेयर खरीदे.

यह तो हद दर्ज़े का घोटाला चल रहा है. एक किस्म की डकैती है. किसी को शेयर ख़रीदने के विकल्प दिये जा सकते हैं, उनसे ज़बरन ख़रीदने को कैसे बोला जा सकता है. आज बैंक बैंक का काम नहीं कर रहे हैं. बैंक का काम होता है पैसों की आवाजाही को बनाए रखना. उन पर दूसरे काम लादे जा रहे हैं. इसे क्रास सेलिंग कहते हैं. इस क्रास सेलिंग ने बैंकों को खोखला कर दिया है.

बैंकों के काउंटर से insurance, life insurance, two wheeler insurance, four wheeler insurance, mutual fund बेचे जा रहे हैं. इन में 20% कमीशन होता है. जब तक कोई इन उत्पादों को नहीं ख़रीदता है, उसका लोन पास नहीं होता है. इसके लिए  ब्रांच मैनेजर से लेकर प्रबंध निदेशक तक का कमीशन बंधा है. कुछ मामलों में ऊपर के लोगों को कमीशन 10-20 करोड़ तक हो जाते हैं. ऐसा कई मेसेज से पता चला है.

एक महिला बैंक की बात सही लगी कि कमीशन का पैसा पूरे ब्रांच या बैंक के कर्मचारियों में बराबर से क्यों नहीं बंटता है? क्यों ऊपर के अधिकारी को ज़्यादा मिलता है, नीचे वाले को कम मिलता है? यही नहीं, इन उत्पादों को बेचने के लिए रीजनल आफिस से दबाव बनाया जाता है. डेली रिपोर्ट मांगी जाती है. इंकार करने पर डांट पड़ती है और तबादले का ख़ौफ़ दिखाया जाता है.

बैंक कर्मचारी प्रधानमंत्री के नाम से बनी बीमा योजनाओं को भी बेचने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं. किसान को पता नहीं मगर उसके खाते से बीमा की रकम काटी जा रही है. इसका सीधा लाभ किसे हुआ? बीमा कंपनी को. बीमा कंपनी कहां तो इन कामों के लिए हज़ारों को रोज़गार देती मगर बैंकों के स्टाफ का ही ख़ून चूस कर अपनी पॉलिसी बेच गईं. शुक्र मनाइये कि हिन्दू मुस्लिम की हवा चलाई गई वरना इन मुद्दों पर चर्चा होती तो पता चलता कि आपके खजाने पर कैसे-कैसे डाके डाले गए हैं.

बैंक शाखाओं में स्टाफ की भयंकर कमी है. नई भर्ती नहीं हो रही है. बेरोज़गार सड़क पर हैं. जहां 6 लोग होने चाहिए वहां 3 लोग काम कर रहे हैं. ज़ाहिर है दबाव में कर्मचारियों से गलती होती है. एक मामले में दो कर्मचारियों को अपनी जेब से 9 लाख रुपये भरने पड़ गए. सोचिए उनकी क्या मानसिक हालत हुई होगी.

बैंकों में नोटबंदी के समय कैशियर नहीं थे. सबको बिना काउंटिग मशीन के नोट लेने और देने के काम में लगा दिया गया. गिनती में अंतर आया तो बड़ी संख्या में बैंक कर्मचारियों ने अपनी जेब से भरपाई की. काश ऐसे लोगों की संख्या और रकम का अंदाज़ा होता तो इनका भी नाम एक फर्ज़ी युद्ध के शहीदों में लिखा जाता.

बैंक कर्मचारियों से कहा जा रहा है कि आप म्यूचुअल फंड भी बेचें. आम लोगों को समझाया जा रहा है कि एफ डी से ज़्यादा पैसा फंड में हैं. एक कर्मचारी ने अपने पत्र में आशंका जाहिर की है कि आम लोगों की बचत का अरबों रुपया शेयर बाज़ार में पंप किया जा रहा है. जिस दिन यह बाजार गिरा आम लोग लुट जाएंगे.

बैंकों के बुनियादी ढांचे ख़राब हैं. कई शाखाओं में शौचालय तक ढंग के नहीं हैं. महिलाओं के लिए अलग से शौचालय तक नहीं है. कूलर नहीं है. इंटरनेट की स्पीड काफी कम है. बैंकों को 64 केबीपीएस की स्पीड दी जाती है और डिजिटल इंडिया का ढिंढोरा पीटा जाता है. बैंक कर्मचारी भयंकर तनाव में हैं. वे तरह-तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. सर्वाइकल, स्लिप डिस्क, मोटापा, विटामिन डी की कमी के शिकार हो रहे हैं.

बैंक कर्मचारियों की सैलरी नहीं बढ़ाई जा रही है. हालत ये हो गई है कि केंद्र सरकार का चपरासी भी अब बैंकों के क्लर्क से ज़्यादा कमा रहा है. काम ज़्यादा क्लर्क कर रहे हैं. दिल्ली जैसे शहर में बैंक का क्लर्क 19000 में कैसे परिवार चलाता है, हमने तो कभी सोचा भी नहीं. भयावह है.

सैंकड़ों मेसेज में बैंक कर्मचारियों अधिकारियों ने लिखा है कि सुबह 10 बजे से रात के 11 बजे तक काम करते हैं. छुट्टी नहीं मिलती है. रविवार को भी सरकार का टारगेट पूरा करने के लिए आना पड़ता है. ऊपर से अब ज़िलाधिकारी भी टारगेट को लेकर धमकाते हैं. जेल भेजने की धमकी देते हैं.

एक बैंक कर्मचारी ने वाजिब बात बताई. सरकारी बैंक के कर्मचारी जो राष्ट्रीय सेवा करते हैं क्या कोई दूसरा बैंक करेगा. क्या कोई प्राइवेट बैंक किसी ग़रीब मज़दूर का मनरेगा अकाउंट रखेगा? क्या प्राइवेट बैंक स्कूल फंड का खाता खोलेंगे? इन खातों में 200-300 रुपये जमा होता है. वृद्धा पेंशन से लेकर आंगनवाड़ी वर्क की सैलरी इन्हीं बैंकों में आती है जो 200 से 2500 रुपये से ज़्यादा नहीं होती है. जो गरीब बच्चा 1000 रुपये स्कॉलरशिप के लिए हर रोज बैंक के चक्कर लगता है, क्या वो 500 रुपये हर साल ATM चार्ज कटवा पाएगा.

उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक RRBs में शाखाओ की संख्या की से दृष्टि भारत का सबसे बड़ा बैंक हैं और RRBs में व्यवसाय की दृष्टि से 8वां सबसे बड़ा बैंक है. लेकिन यहां मानव संसाधन की भयंकर कमी है. 1032 शाखाओं में से 900 के आसपास शाखों में सिर्फ 2 कर्मचारी मिलेंगे जिसमें एक कार्यालय सहायक दूसरा BM. जबकि हर शाखा में औसतन 12,000 खाते हैं. जिसमें ग्राहकों को सारी सुविधाएं देने की जिम्मेवारी अकेला कार्यालय सहायक का है BM KCC renewal और अन्य ऋण खाताओ के ऋण वसूली के नाम पर 10 से 5 बजे तक क्षेत्र भ्रमण में रहते हैं. जबकि बैंकिंग नियमानुसार सभी शाखाओं में makers-checker concept पर कार्य होनी चाहिये. इस प्रकार से पूर्णत इस नियम की धज्जियां उड़ाई जाती हैं. बिहार के हिन्दुस्तान अखबार में 20 फरवरी की खबर है कि युवा बैंक कर्मी ग्रामीण बैंक छोड़ रहे हैं. 15 ने इस्तीफा दे दिया है.

सरकार को तुरंत बैंकरों की सैलरी और काम के बारे में ईमानदारी से हिसाब रखना चाहिए. आवाज़ दबा देने से सत्य नहीं दब जाता है. वो किसी और रास्ते से निकल आएगा. बैंकों का गला घोंट कर उसे प्राइवेट सेक्टर के हाथों थमा देने की यह चाल चुनाव जीतवा सकती है मगर समाज में ख़ुशियां नहीं आएंगी. बहुत से लोगों ने अपने मेसेज के साथ बैंक कर्मचारियों की आत्महत्या की ख़बरों की क्लिपिंग भेजी है. पता नहीं इस मुल्क में क्या क्या हो रहा है. मीडिया के ज़रिए जो किस्सा रचा जा रहा है वो कितना अलग है. दस लाख बैंकरों के परिवार में चालीस लाख लोग होंगे. अगर चालीस लाख के सैंपल की पीड़ा इतनी भयावह है तो आप इस तस्वीर को किसानों और बेरोज़गार नौजवानों के साथ मिलाकर देखिए. कुछ कीजिए. कुछ बोलिए. डरिए मत.

नोट: यह लेख बैंकरों की बताई पीड़ा का दस्तावेज़ है. उन्होंने जैसा कहा, हमने वैसा लिख दिया. एक हिन्दू-मुस्लिम सनक के पीछे देश के लोगों को क्या क्या सहना पड़ रहा है.

साभार- khabar.ndtv.com

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