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‘छँटनी के नाम पर तुम्हें सिर्फ़ रवीश की नाक काटनी है, ताकि वह भी तुम्हारी तरह दिखे’

कुछ लोग एनडीटीवी में छँटनी को लेकर रवीश कुमार से हिसाब बराबर करने में जुट गए हैं। वैसे, ना उन्हें गुड़गाँव में मारुति के मज़दूरों पर हुए भीषण दमन से कोई परेशानी हुई और ना ही टीसीएस समेत तमाम बड़ी-बड़ी कंपनियों में हो रही छँटनी से कोई परेशानी है। बस उन्हें एक मौक़ा मिला है रवीश कुमार को घेरने का और वे पिल पड़े हैं।

साफ़ बात यह है कि छँटनी एनडीटीवी प्रबंधन का फ़ैसला है ना कि रवीश कुमार का। रवीश कुमार यूनियन लीडर नहीं हैं और ना ही किसी पार्टी के नेता। वे एक पत्रकार हैं और उनको इस कसौटी पर कसा जाएगा कि पर्दे पर वे जो बोलते या दिखाते हैं, वत सच है या झूठ।

अगर कोई यह उम्मीद करता है कि वे अपनी कंपनी के ख़िलाफ़ कार्यक्रम करेंगे तो वह दरअसल, रवीश कुमार को एनडीटीवी या कहें कि पत्रकारिता से बाहर करने की इच्छा से भरा हुआ है । कोई भी पत्रकार, चाहे जितना भी बड़ा तुर्रमख़ाँ रहा हो, नौकरी करते हुए अनपी कंपनी के ख़िलाफ़ नहीं लिख-बोल सकता। ऐसा करने से पहले उसे नौकरी छोड़नी होगी। यह नैतिकता का भी तक़ाज़ा है।

इस बात में किसी को भ्रम नहीं होना चाहिए कि एनडीटीवी एक कॉरपोरेट कंपनी है और यह संयोग ही है कि वह ज़्यादातर मीडिया कंपनियों की तरह सरकार के सामने दंडवत नहीं है, अभी तक। रवीश कुमार को वहाँ अपने तरीक़े से काम करने का मौक़ा है। जिस दिन यह मौक़ा उनसे छीन लिया जाएगा उस दिन देखिएगा कि रवीश कुमार क्या करते हैं। अगर वे चारण-भाट या जंगख़ोर ऐंकर की भूमिका में आ जाएँगे तो मैं भी बाक़ी की तरह उन्हें गरियाऊँगा। लेकन आज की स्थिति तो यह है कि रवीश उन गिने-चुने लोगो में हैं जिन्हें टीवी में रहते हुए भी पत्रकार कहा जा सकता है।

तो क्या इस छँटनी का विरोध नहीं होना चाहिए ?…बिलकुल होना चाहिए। लेकिन कैसे ? मैं दावे से कह सकता हूँ कि एनडीटीवी की छँटनी के ख़िलाफ़ जो पत्रकार रवीश कुमार पर पिले पड़े हैं, वे इस छँटनी के ख़िलाफ़ किसी भी आंदोलन में शामिल नहीं होंगे। सड़क पर आंदोलन तो छोड़ दीजिए, इस मुद्दे पर क़ानूनी लड़ाई के लिए कोई कमेटी बनाई जाए, तो अपना नाम भी नहीं देंगे।

वैसे भी, छँटनी के विरोध करने वालों को यह भी पता करना चाहिए कि जो निकाले गए हैं, वे लड़ने को तैयार हैं या नहीं। मुझे शक़ है कि कोई लड़ने को तैयार होगा। तकनीकी रूप से वे निकाले माने भी नहीं जाएँगे अगर उन्होंने कंपनी से मिलने वाले मुआवज़े को स्वीकार कर लिया होगा।…और जो अपनी लड़ाई ख़ुद नहीं लड़ सकते, उनकी लड़ाई कोई नहीं लड़ सकता। मुद्दई सुस्त और गवाह चुस्त नहीं हो सकता।

इसलिए रवीश की चुप्पी पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों, अपनी आँखें खोलो !मीडिया संस्थानों में छँटनी वग़ैरह का मसला मज़ूदर यूनियनों के कमज़ोर होने और सरकार की मज़दूर विरोधी और कॉरपोरेट हितैषी नीति में है। अभी तो तकनीकी स्टॉफ़ के नाम पर छँटनी हुई है, लेकिन कल पत्रकार भी शिकार बनेंगे क्योंकि श्रमजीवी पत्रकार एक्ट में ना टीवी वाले पत्रकार आते हैं और ना डिजिटल। सच तो ये है कि प्रिंट के पत्रकार भी अब कॉन्ट्रैक्ट के मकड़जाल में फँस चुके हैं।

इसलिए रवीश के नाम पर जुगाली करने के बजाय उस सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलो जो श्रम सुधारों के नाम पर बचे-खुचे अधिकारों को भी लील जाना चाहती है। अपने-अपने संस्थानों में यूनियन बनाने का दम दिखाओ और तमाम दलों के नेताओं से मिलकर माँग करो कि श्रमजीवी पत्रकार एक्ट का विस्तार करके उसमें टीवी और डिजिटल पत्रकारों को शामिल किया जाए।

सबसे बड़ी बात..ख़ुद को मज़दूर मानो और देश भर के मज़दूरों के सुख-दुख को साझा करना सीखो। एनडीटीवी जितना बुरा हो, रवीश कम से कम वहांँ मज़दूरों-किसानों की व्यथा-कथा कहने की गुंजाइश बनाए हुए हैं। यह नकटों के गाँव में नाक वाले की तरह रहना है। तुम्हारी परेशानी भी यही है। तुम्हें ना सरकार से परेशानी है और ना उसकी कॉरपोरेटपरस्त नीति से जो छँटनी का अधिकार देती है। तुम्हें सिर्फ़ रवीश की नाक काटनी है ताकि वह भी तुम्हारी तरह दिखे।

रवीश की चुप्पी के बहाने दरअसल तुम उसका आखेट करना चाहते हो। बात समझ ना आ रही हो तो आईना देखो !

  • पंकज श्रीवास्तव

 

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