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बाबरी मस्जिद- हिंदू संगठनों की बयानबाजी पर सुप्रीम कोर्ट ने जताया कड़ा ऐतराज

नई दिल्ली। अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद मामले की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि अदालत में मामला लंबित है लेकिन कोर्ट के बाहर हिंदू संगठनों की ओर से बयानबाजी की जा रही है और ये कंटेंप्ट की तरह है। हमने इस मामले में संयम बरता हुआ है और खुद को अनुशासित कर रखा है लेकिन हिंदू पक्ष की ओर से जजमेंट से पहले ही बयानबाजी हो रही है।

मुस्लिम पक्षकारों की ओर से राजीव धवन ने कहा था कि मामले को संवैधानिक बेंच रेफर किया जाना चाहिए। उन्होंने इस्माइल फारुखी जजमेंट का हवाला दिया और कहा कि उस जजमेंट को ध्यान में रखकर ही हाई कोर्ट ने फैसला दिया है। 1994 के जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है और नमाज कहीं भी पढ़ा जा सकता है।

मुस्लिम पक्षकारों का कहना है कि इस फैसले को पहले दोबारा देखा जाए उसके बाद ही जमीन विवाद मामले की सुनवाई की जाए। धवन की ओर से दलील पूरी कर ली गई। इस मामले में हिंदू पक्षकारों की ओर से सीनियर एडवोकेट के. परासरन ने दलील शुरू की और अगली सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली बेंच ने 17 मई की तारीख तय कर दी है।

मामले की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने दलील दी कि लोगों को कोर्ट के बाहर बयान देने से बचना चाहिए। हिंदू पक्ष की ओर से लगातार दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। जजमेंट से पहले इस तरह की बयानबाजी पर रोक होनी चाहिए। क्योंकि ये कंटेंप्ट का मामला बनता है। हमने इस मामले में कंटेंप्ट के लिए अर्जी दाखिल करने के लिए ड्राफ्ट तैयार किया था लेकिन अर्जी दाखिल नहीं की।

मामले में हिंदू संगठन की ओर से अयोध्या मामले में लगातार बयान दिया जा रहा है। कोर्ट के बाहर ऐसा नहीं होना चाहिए। उन्होंने इस्माइल फारुकी जजमेंट का हवाला दिया और कहा कि जजमेंट में कहा गया है कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है और इस जजमेंट के परिप्रेक्ष्य में ही हाई कोर्ट का फैसला आया है और इस पूरे मामले में इस जजमेंट का असर है।

ऐसे में पहले इस मामले को एग्जामिन करने की जरूरत है और इस्लाम में मस्जिद में नमाज पढ़ना अभिन्न अंग है या नहीं, इस मुद्दे को संवैधानिक बेंच भेजा जाना चाहिए। जब मस्जिद तोड़ा गया तब राज्य सरकार की जिम्मेदारी थी और उनके अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि मस्जिद को तोड़े जाने से बचाते।

धवन ने दलील दी कि इस्लाम में मस्जिद में नमाज पढ़ना अभिन्न अंग नहीं है, इस टिप्पणी के तुलनात्मक महत्व पर बहस जरूरी है। मामला कानूनी सिद्धांत का है और ऐसे में इसे संवैधानिक बेंच को देखना चाहिए। संविधान तमाम धर्मों को समान आदर की बात करता है। संविधान के अनुच्छेद-25 के प्रावधानों का भी उन्होंने हवाला दिया और कहा कि सबको धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। धार्मिक गतिविधियां, प्रैक्टिस, प्रोसेसन आदि की आजादी अनुच्छेद-25 में वर्णित है। सोचने का अधिकार और विश्वास का अधिकार भी इसी दायरे में है।

धवन ने कहा कि 1949 में विवादित स्थल पर मूर्ति रख दी गई। वहां नमाज इसीलिए नहीं पढ़ा जाता रहा और 1992 में मस्जिद को तोड़ दिया गया। अब आर्कियोलॉजिकल साक्ष्य लाना चाह रहे हैं लेकिन हिंदू पक्षकारों द्वारा इस स्टेज पर ये साक्ष्य नहीं लाए जा सकते। हरियाणा के सीएम ने हाल में कहा था कि सड़क पर नमाज नहीं पढ़ा जा सकता लेकिन ये उनका मत हो सकता है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत सोचने का अधिकार, विश्वास का अधिकार है जो धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में है।

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