Tuesday , September 25 2018

कासगंज रिपोर्ट : आईसीयू में मौत से जूझ रहा मुस्लिम, बेकसूर जेल में बंद

ऑल इंडिया पीपल्स फोरम की जाँच टीम ने कासगंज का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट जारी की। जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कासगंज में दंगा नहीं हुआ बल्कि अल्पसंख्यकों पर योजनाबद्ध राजनीति प्रेरित साम्प्रदायिक हमला था। दंगे के दोषी खुलेआम घूम रहे हैं जबकि दोनों समुदाय के निर्दोष जेल में हैं। पुलिस और प्रशासन पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और उसकी कार्रवाई एकतरफा है। धर्म और जाति के आधार पर कार्रवाई की जा रही है।

चन्दन गुप्ता की हत्या में कई लोगों को आरोपित बनाया गया और गिरफ्तार किया गया लेकिन गरीब मजदूर छोटन पर जानलेवा हमला करने वाले और अकरम सिद्दीकी की आंख फोड़ने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। छोटन अलीगढ में आज भी अस्पताल में पड़ा मौत से जूझ रहा है लेकिन उसे न कोई सरकारी मदद दी गई और न कोई हाल पूछने आया।

जाँच दल ने नई दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस में अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए कासगंज में हिंसा की न्यायिक निगरानी में न्यायिक जाँच की मांग की। जाँच टीम ने भड़काऊ भाषण देने वाले भाजपा सांसद और अन्य नेताओं को गिरफ्तार करने, बाइक पर हथियारबंद होकर हिंसा करने वाले एबीवीपी-संकल्प से जुड़े लोगों पर एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तार करने और जेल में बंद दोनों समुदायों के निर्दोष लोगों को रिहा करने की मांग की।

जाँच दल ने जोर देकर कहा कि कासगंज की स्थिति अभी भी तनावपूर्ण है और अल्पसंख्यक अब भी बहुत डर में जी रहे हैं, फिर भी कासगंज में मुसलमानों की रक्षा के लिए हिंदुओं द्वारा सहायता के कई उदाहरण मौजूद हैं। कासगंज की स्थिति सामान्य हो सकती है अगर हिंसा करने वाले एबीवीपी और संकल्प के लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाए और हिन्दू और मुसलमानों को शांतिपूर्वक एक दूसरे के साथ बातचीत करने के लिए ठोस प्रयास किए जाएं।

एआईपीएफ की जाँच दल में वरिष्ठ पत्रकार और कार्यकर्ता जॉन दयाल व किरण शाहीन, कार्यकर्ता लीना दबीरू, एपवा की सचिव कविता कृष्णन, किसान महासभा के उपाध्यक्ष प्रेम सिंह गहलौत (सभी एआईपीएफ के केंद्रीय अभियान दल के सदस्य हैं) के साथ ही आइसा (जेएनयू ) के कार्यकर्ता विजय कुमार और तबरेज़ अहमद शामिल थे। जाँच टीम ने 5 और 6 फ़रवरी को कासगंज जिला का दौरा किया था।

पुलिस ने टीम को स्वतंत्र रूप से काम करने में रुकावट डाली और 6 फरवरी को कासगंज जिला जेल के पास टीम को रोक दिया तथा धारा 144 के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए एक घंटा तक सभी लोगों को महिला पुलिस थाने में हिरासत में रखा। इसके बाद अपने घेरे में रखते हुए जिले के बाहर भेज दिया गया। इसके बाद टीम ने अलीगढ़ जाकर अकरम से मुलाकात की, जो भीड़ हमले में अपनी एक आँख गँवा चुके थे और छोटन जो 28 जनवरी से जेएन मेडिकल कॉलेज अस्पताल अलीगढ़ में बेहोश पड़े हैं।

45 वर्षीय छोटन 28 जनवरी की दोपहर को कासगंज के पास गंज दंडवारा में अपनी साइकिल से निकला था। वह चिकन स्टॉल लगाकर जीविकोपार्जन करता था। कासगंज में अशांति के कारण दो दिन से वह अपना रोजगार नहीं कर पा रहा था। उसके पास पैसे खत्म हो गए थे और परिवार की रोजमर्रा की जरूरत के लिए उसे अपना ठेला लगाना जरूरी था ताकि कुछ पैसे जुटा सके। वह घर में एकमात्र कमाने वाला सदस्य है। घर में पत्नी शहनाज, छोटे बेटे और बेटी हैं. अपने मरहूम भाई के तीन बच्चों की जिम्मेदारी भी उसी पर है।

जब वह रात बीतने पर भी नहीं लौटा, तो उसकी पत्नी ने पड़ोसियों से सहायता माँगी, जिन्होंने उसके लिए छोटन को खोजने के लिए एक जीप की व्यवस्था की। छोटन छितेरा में सड़क के किनारे झाड़ियों में पड़ा मिला। हमलावर जीप को पुलिस की जीप समझकर भाग गए। छोटन के सिर पर गंभीर चोट थी और वह बेहोश था। वह इस वक्त जेएन मेडिकल कॉलेज अस्पताल, अलीगढ़ के आईसीयू में है।

उसे सिर की सर्जरी करानी पड़ी और वह वेंटिलेटर पर था। अब वह वेंटिलेटर पर नहीं है लेकिन अभी भी गंभीर हालत में है और बेहोश है। इस मामले में एक प्राथमिकी दर्ज की गई है लेकिन छोटन पर इस जानलेवा हमले के आरोपियों को खोजने के लिए पुलिस ने कोई प्रयास नहीं किया। जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश की सरकार ने छोटन और उनके परिवार की कोई मदद नहीं की है।

टीम ने कासगंज जिला जेल का दौरा किया, जहां जेलर और जिला प्रशासन ने टीम को कैदियों से मिलने यहाँ तक कि बात करने से भी मना कर दिया। टीम ने उन परिवारों के सदस्यों से मुलाकात की जो जेल में बंद रिश्तेदारों से मिलने के लिए बाहर प्रतीक्षा कर रहे थे। जाँच टीम के सदस्य कई हिंदू और मुस्लिम परिवारों से मिले, जिनके रिश्तेदारों को पूरी तरह निर्दोष और हिंसा की घटना से दूर-दूर तक कोई रिश्ता न होने के बावजूद जेल में रखा गया।

आलोक तोमर ने टीम को बताया कि उनके भाई अनुज तोमर को 27 जनवरी 2018 की दोपहर केनरा बैंक लेन, लवकुश नगर में उसके घर के पास से उठाया गया था। उस वक्त वह अपने बीमार पिता के लिए दवा खरीदने के लिए निकले थे। वह 27 जनवरी को नजदीकी मेडिकल स्टोर पर दवा लेने गया। पुलिस ने उनसे कहा कि सभी दुकानों को बंद कर दिया गया है इसलिए वह वापस लौट आओ, जैसे ही वह जाने के लिए मुड़ा पुलिस की कई गाड़ियाँ वहां आयीं और उसे पकड़ ले गईं।

राजवीर सिंह यादव ने रोते हुए बताया कि उनका बेटा डॉ नवीन गौर की क्लिनिक में कंपाउंडर है। 27 जनवरी को वह और एक अन्य कंपाउंडर, इस चेतावनी के बाद कि दुकान खोलना सुरक्षित नहीं होगा, क्लिनिक का शटर बंद कर रहे थे। इसी समय पुलिस आई और दोनों को गिरफ्तार कर लिया।

फ़िरोज़ ने रोते हुए बताया कि उनके बेटे इमरान खान, जो बिलराम गेट पर मीट शाप और होटल चलाते हैं, को पुलिस ने सड़क से उठा लिया। फिरोज गुजरात में मजदूरी करते हैं। बेटे की गिरफ्तारी की खबर मिलने पर वह वहां से लौट आये। फिरोज कहते हैं कि इमरान न तो अब्दुल हमीद चौक में झंडारोहण की घटना में और न ही किसी भी तरह की हिंसा में शामिल था।

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