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भारतीय इतिहास और सांप्रदायिक राष्ट्रवाद का पुनर्लेखन : राम पुनियानी

भाजपा के सत्ता में आने के बाद से पाकिस्तान की तरह भारत में भी इतिहास का पुनर्लेखन किया जा रहा है। अब तक हम मध्यकालीन इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण के बारे में सुनते रहे हैं। हमें यह बताया जाता है कि दुष्ट मुस्लिम विदेशी आक्रांताओं ने भारत पर हमले किए, तलवार की नोंक पर इस्लाम फैलाया और हिन्दू मंदिरों को तोड़ा।

इस तरह के इतिहास का एक नमूना है राणा प्रताप का स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिन्दू राष्ट्रवादी के रूप में महिमामंडन। अब यह भी बताया जा रहा है कि राणा प्रताप ने अकबर की सेना को हल्दीघाटी के युद्ध में पराजित किया था। यह भी कहा जा रहा है कि आर्य, जो वर्तमान हिंदुओं के पूर्वज बताए जाते हैं, भारत के मूल निवासी थे और हड़प्पा व मोहनजोदाड़ो आर्य संस्कृति का हिस्सा थे।

इतिहास के हिन्दुत्ववादी संस्करण को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार ने एक समिति की नियुक्ति की है जिसकी रपट के आधार पर स्कूली पाठ्यक्रम बदला जाएगा। सरकार के शब्दों में इस समिति का उदेश्य आज से 12,000 वर्ष पूर्व भारतीय संस्कृति के उदय और उसके उद्भव और दुनिया की अन्य संस्कृतियों के साथ उसकी अंतःक्रिया का समग्र अध्ययन है।

इस समिति का मुख्य फोकस प्राचीन भारतीय इतिहास और विशेषकर आर्यों के उदय पर होगा। अब तक इस संबंध में अलग-अलग सिद्धांत प्रचलित हैं। ज्योतिराव फुले, आर्यों के भारत में आगमन को एक आक्रमण बताते हैं, जिसके कारण नीची जातियों का दमन शुरू हुआ। लोकमान्य तिलक ने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि आर्य आर्कटिक क्षेत्र से भारत आए थे।

आरएसएस के द्वितीय सरसंघचालक को यह अच्छी तरह से पता था कि अगर हिन्दुओं की श्रेष्ठता और भारत की धरती पर उनके स्वामित्व को सिद्ध किया जाना है तो यह साबित किया जाना होगा कि आर्य इस देश के मूल निवासी थे। परंतु वे लोकमान्य तिलक के सिद्धांत का खुलकर विरोध भी नहीं करना चाहते थे।

उन्होंने यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि आर्य निःसंदेह आर्कटिक से आए थे परंतु आर्कटिक पहले हमारे बिहार और उड़ीसा में था और बाद में भूगर्भीय परिवर्तनों के चलते वहां पहुंच गया जहां वह अब है, अर्थात उत्तरी ध्रुव पर।

आर्यों के भारत में आगमन के संबंध में जो भी सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं, वे हिन्द-आर्य भाषाओं के अध्ययन पर आधारित हैं। इस समय जो सिद्धांत सब से अधिक प्रचलित है वह यह है कि आर्य कई किश्तों भारत आए। हड़प्पा व मोहनजोदाड़ो सभ्यताओं के अवशेष बताते हैं कि वह मूलतः एक शहरी संस्कृति थी। वेदों के अध्ययन से यह लगता है कि आर्य घुमंतु और ग्रामीण थे।

संकीर्ण राष्ट्रवाद अपने इतिहास को पीछे ले जाना चाहता है ताकि देश की धरती पर उसके एकाधिकार का दावा मजबूत हो सके। पाकिस्तान की इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में से हिन्दू राजा गायब हैं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और गांधी व नेहरू के भारत की स्वाधीनता में योगदान को कोई स्थान नहीं दिया गया है।

हिन्दू राष्ट्रवादी सावरकर के इस सिद्धांत में विश्वास रखते हैं कि केवल वे ही हिन्दू हैं जो भारत को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों मानते हैं। इसलिए भारतीय इतिहास की शुरूआत हिन्दुओं से होनी चाहिए। यह इस तथ्य के बावजूद कि हिंदू शब्द आठवीं सदी में अस्तित्व में आया।

यह महत्वपूर्ण है कि भारतीय राष्ट्रवाद के पैरोकार गांधी (अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज‘) और नेहरू (अपनी उत्कृष्ट कृति ‘भारत एक खोज‘) में भारत को सभी धर्मों के मानने वालों का देश बताते हैं।

यही बात संयुक्त राष्ट्रसंघ के एक महत्वपूर्ण दस्तावेज ‘एलायंस ऑफ़ सिविलाईजेशन्स‘ (सभ्यताओं का गठबंधन) में कही गई है। संयुक्त राष्ट्रसंघ का दस्तावेज इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि सामाजिक प्रगति, संस्कृतियों की अंतःक्रिया का परिणाम होती है। यही समावेशी भारतीय राष्ट्रवाद का सिद्धांत भी है।

हिन्दू राष्ट्रवादी जिनमें मोदी और उनके साथी शामिल हैं, हमेशा से यह मानते रहे हैं कि हिन्दू इस देश के मूल निवासी हैं। यह समिति किस निष्कर्ष पर पहुंचेगी, पहले से ही स्पष्ट है। अपने राजनैतिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए देश का नेतृत्व अतीत को तोड़-मरोड़ रहा है।

वह चाहता है कि जो लोग हिन्दू की उसकी परिभाषा में नहीं आते, उन्हें या तो हाशिये पर धकेल दिया जाए या उन्हें इस बात के लिए मजबूर कर दिया जाए कि वे उन रीति-नीतियों को अपनाएं जिन्हें वह हिन्दू मानती है।

इतिहास में से चुनिंदा चीजों को लेकर उन्हें संकीर्ण राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है। इस देश का कौन सा निवासी कहां से आया था यह हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण होना चाहिए? महत्व इस बात का होना चाहिए कि आज हमारे देश में कौन-कौन रह रहा है। संकीर्ण राष्ट्रवाद से केवल देश विघटित होगा।

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