Friday , July 20 2018

मां-बाप रहें सुरक्षित, इसलिए पालकी में बैठाकर 1500 KM के सफर पर चल निकला रोहिंग्या मुस्लिम

म्यांमार में रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों पर किस तरह अत्याचार हो रहे हैं इसकी कहानी किसी से भी छुपी नहीं है। ऐसे में रोहिंग्या मुस्लिमों में डर और दहशत का माहौल होना स्वाभाविक सी बात है। डर और आतंक के साये तले ज़िन्दगी गुज़ार रहे लोग अपनी जान को दांव पर लगाकर भी इलाके से दूर बसेरा ढूंढ़ने के जाने से परहेज नहीं कर रहे।

बेताबी और डर इस कदर है कि लोग अपनी जरुरत के सामान जैसे कि पैसे, मोबाइल और खाने के सिवा अपने साथ कुछ भी नहीं लेकर जा रहे।

लेकिन इन मुश्किल हालात में जहाँ मरने का डर हर सांस के साथ रोहिंग्या मुसलमानों के जेहन तक पहुँचता है इस्लाम को मानने वाले ये लोग अपना फ़र्ज़ नहीं भूले हैं।

इस बात की जीती जागती मिसाल है एक नौजवान जिसका नाम कुछ भी हो मान्य नहीं रखता क्यूंकि उसके लिए उसका शरणार्थी होना ही उसके जीवन की असली पहचान है।

इस युवक ने अपनी जान बचाने की खातिर जब म्यांमार की जमीन छोड़ने का फैसला लिया तो वो अपने साथ अपनी ज़िन्दगी का सबसे कीमती तोहफा ले जाने का फैसला किया। वो तोहफा था इस्लाम की शिक्षाओं का जिसने उसे मां-बाप की हर हाल में सेवा करने की शिक्षा दी थी।

इसी शिक्षा के चलते इस युवक ने अपने माँ बाप को एक पालकी में बिठा अपना १५०० कि.मी. से भी ज्यादा का सफर तय कर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने की ठान ली। इस युवक की ये दास्ताँ बांग्लादेश बॉर्डर पर पहुँच कर लोगों के सामने आयी तो ये मंजर देखने वाली हर आँख नम हो उठी।

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