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क्या गुजरात में ‘नोटा’ की वजह से 99 पर सिमट गई बीजेपी?

गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी 115 से 99 सीट पर सिमट गई है तो इसके पीछे सिर्फ कांग्रेस की मेहनत नहीं बल्कि नोटा भी है. बीजेपी की हार वाली कम से 13 सीटें ऐसी हैं जिनमें नोटा को हार के अंतर से अधिक वोट मिले हैं.

इस चुनाव में नोटा को 5,51,615 वोट मिले हैं. अगर निर्दलीयों को छोड़ दिया जाय तो यह तीसरी बड़ी ‘पार्टी’ साबित हुआ है. नेताओं को नकारने वाले इस सिस्टम में 1.8 फीसदी वोट पड़े. ‘नोटा भाई’ ने सबसे ज्यादा झटका बीजेपी को दिया है. उसने चार ऐसी सीटें खोई हैं जहां हार का अंतर 170 से लेकर एक हजार वोट तक है, जबकि वहां नोटा को 21 सौ से लेकर 38 सौ तक वोट मिले हैं.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

साल 2013 में उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद नोटा का बटन ईवीएम पर आखिरी विकल्प के रूप में जोड़ा गया था. यानी गुजरात विधानसभा के चुनाव में इसका इस्तेमाल पहली बार हुआ है. नोटा का मतलब यह है कि मतदाता किसी भी उम्मीदवार को योग्य नहीं पाने की स्थिति में नोटा का बटन दबा सकता है.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

हालांकि नोटा को मिले वोट की संख्या सभी उम्मीदवारों को प्राप्त मतों की संख्या से अधिक हो तब भी उस उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाएगा जिसे चुनाव मैदान में उतरे सभी उम्मीदवारों से अधिक वोट मिले हैं.

लूणावाणा और मोरवा हदफ में बीजेपी उम्मीदवार निर्दलीय से हार गए. लूणावाणा की बात करें तो निर्दलीय को 55,098 जबकि बीजेपी को 51898 वोट मिले. यहां जीतहार का अंतर 3200 वोट का था जबकि नोटा को 3419 वोट पड़े. मोरवा हदफ में नोटा को 4962 वोट मिले जबकि बीजेपी 4366 वोट से हारी. दासादा में जीत-हार का अंतर 3728 वोट रहा, जबकि नोटा ने उससे थोड़ा अधिक 3796 मत हासिल किया.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

डोनाल्ड ट्रंप के लिए कैंपेन कर चुकी कंपनी ‘कैंब्रिज एनालिटिका’ से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक अंबरीश त्‍यागी कहते हैं कि ” नोटा में तीन तरह के लोगों ने वोट डाला है. पहले वो लोग जिन्हें बीजेपी से नाराजगी थी, लेकिन वो कांग्रेस को वोट नहीं देना चाहते थे. दूसरे वे जिन्हें बीजेपी, कांग्रेस दोनों से नाराजगी है और तीसरे वे जो सभी दलों को चोर समझते हैं.” त्यागी मानते हैं कि निसंदेह नोटा से सबसे ज्यादा नुकसान बीजेपी को हुआ है.

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