वेदप्रताप वैदिक के लेख का वरिष्ठ पत्रकार क़ुरबान अली ने दिया जवाब

वेदप्रताप वैदिक के लेख का वरिष्ठ पत्रकार क़ुरबान अली ने दिया जवाब

12-13, जुलाई को दिल्ली में हुए समाजवादी समागम में आरएसएस समर्थक पत्रकार वेदप्रताप वैदिक भी पहुंचे लेकिन जब वहां उन्होंने आरएसएस की तारीफ़ों के पुल बांधने शुरू कर दिए तो मजबूरन मुझे उन्हें रोकना पड़ा। इतना ही नहीं बाद में उन्होंने इस प्रकरण पर एक लेख भी लिख दिया जिसका जवाब भी मुझे लिखना पड़ा। पेश है वैदिक जी का लेख और उसपर मेरा जवाब।

डॉ. वेदप्रताप वैदिक जी ,
मेरे एक मित्र ने आपकी एक लेख नुमा टिप्पणी मुझे भेजी है जिसमें आपने 13 जुलाई को राजेंद्र भवन में हुए समाजवादी समागम के दौरान अपने साथ हुई घटना का ब्यौरा दिया है।मैं आपकी इस बात के लिए तो तारीफ करूँगा की अपने इस इक़बालिया बयान में आपने यह तो माना की “5-6 साल पहले मैंने (आपने) नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए क्यों प्रस्तावित किया था और सारे देश में घूम-घूमकर उसके लिए समर्थन क्यों जुटाया था” पर साथ ही आपने अपने इस बयान में एक बेईमानी की है और यह नहीं बताया है की आप आरएसएस से जुड़े रहे हैं और उसका समर्थन लेते रहे हैं और उसका समर्थन करते भी रहे हैं। हालाँकि अपरोक्ष रूप से आपने अपने इक़बालिया बयान के आख़री पैराग्राफ में इस बात की पुष्टि भी कर दी है। आप लिखते हैं “अब के प्रौढ़ या नौजवान यदि मुझ पर किसी पार्टी या संगठन का बिल्ला चिपकाना चाहें तो यह उनकी नादानी है। ये मेरे नादान भाई मुझे तो क्या, जयप्रकाश नारायणजी को भी कोसते हैं, क्योंकि उन्होंने आपात्काल के विरुद्ध आरएसएस का सहयोग लिया था।” यानि जब जयप्रकाश नारायण तक ने आरएसएस का समर्थन ले लिया या उसका समर्थन कर दिया तो फिर आपको निशाना क्यूँ बनाया जाये !

मैं यह स्पष्ट करता चलूँ की आपसे मेरी कोई व्यक्तिगत रंजिश, शत्रुता या लेना-देना नहीं है, ना हीं आपके और मेरे बीच आपसी हितों को लेकर कोई विवाद हुआ है बल्कि प्राय: सार्वजानिक कार्यक्रमों या मेल मुलाक़ात के दौरान हम एक दूसरे का अभिवादन करते ही रहे हैं। मेरा आपसे और आपकी विचारधारा से बुनियादी मतभेद आरएसएस को लेकर है।मेरा मानना है की आरएसएस, भारत के अस्तित्व के लिए, इसकी सदियों पूरानी सभ्यता और संस्कृति के लिए तथा इस देश की एकता और अखंडता के लिए एक बड़ा खतरा है और यदि इस नासूर को वक़्त रहते ख़त्म न किया गया तो देश के टूटने की आशंका है।

दिल्ली में 12 -13 जुलाई को गांधी शांति प्रतिष्ठान और राजेंद्र भवन में हुए समाजवादी समागम की आयोजन समिति का मैं भी सदस्य था और जब मुझे पता चला की आपको आमंत्रित किया गया है तो मैंने लिखित रूप इसका विरोध किया था और कहा था की चूँकि आप आरएसएस की विचारधारा से जुड़े हैं और उसमें गहरा विश्वास रखते हैं इसलिए समाजवादी समागम में आपको आमंत्रित नहीं किया जाना चाहिए। इसपर आपको आमंत्रित करने वाले साथियों ने कहा की आप भाषा और विदेश नीति पर बोलेंगे और आरएसएस का समर्थन करने वाला कोई बयान इस मंच से नहीं देंगे। लेकिन जब आपने अपने शुरूआती प्रवचन के पहले पांच मिनटों में आरएसएस का स्तुतिगान किया और यह बताया की किस प्रकार आरएसएस के समर्थन से आपने समाजवादी आंदोलन को मज़बूत किया और आपके, संघ वा सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं से कितने मधुर सबंध थे तब मैने आपके भाषण का विरोध किया और तब तक करता रहा जबतक आप अपने मूल विषय पर नहीं आ गए।

साथ ही वैदिक जी, मैं यह भी स्पष्ट करना चाहता हुँ आइंदा भी अगर आपने या किसी अन्य व्यक्ति ने मेरी मौजूदगी में किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में आरएसएस का महिमा मंडन करने का काम किया तो मैं, फिर उसी तरह उसका विरोध करूंगा जैसा मैंने 13 जुलाई को राजेंद्र भवन में आपके सामने किया था। विरोध का यह तरीक़ा मैंने अपने नेता राजनारायण और मधुलिमये से सीखा है जिन्होंने आरएसएस की कारगुज़ारियों और उसके दोहरे चरित्र तथा उसकी दोहरी सदस्य्ता के सवाल पर 1979 में जनता पार्टी और उसकी सरकार को यह कहकर तोड़ दिया था की चूँकि “आरएसएस के लोगों ने जनता पार्टी, उसके संगठन और उसकी सरकार पर क़ब्ज़ा कर लिया है, इसलिए अब जनता पार्टी का टूटना ऐतिहासिक आवश्यकता हो गया है।”

आरएसएस क्या है ये भी हमें हमारे गुरु मधु लिमये ने समझाया था और 1979 में जनता पार्टी की टूट के बाद उन्होंने ‘रविवार’ में जो लेख लिखा था वह आपकी जानकारी के लिए संलग्न है की “आरएसएस क्या है? और क्यूँ उसे ख़त्म किया जाना चाहिए।

मुझे नहीं मालूम की आपने किन परिस्थितयों में और किन कारणों से “5-6 साल पहले नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया था और सारे देश में घूम-घूमकर उसके लिए समर्थन क्यों जुटाया था” लेकिन सन 2002 से मुझ समेत इस देश के लाखों करोड़ों लोगों का मानना है की नरेंद्र मोदी गुजरात में सैंकड़ों निर्दोष नागरिकों की हत्या के दोषी हैं और उनपर क़त्ल का मुक़दमा चलाया जाना चाहिए।

जहाँ तक डा. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण सहित अन्य समाजवादी नेताओं द्वारा आरएसएस का समर्थन लेने या उसे समर्थन देने का सवाल है तो इसे में समाजवादियों की ‘हिमालयन ब्लंडर’ भारी भूल मानता हूँ चाहे उसमें मेरे मरहूम वालिद ही क्यूँ न शामिल रहे हों।समाजवादियों की इन्हीं ग़लतियों के कारण केंद्र में सरकार बनाने का आरएसएस का सपना साकार हुआ है और देश भले ही संवैधानिक रूप से ‘डिजुरे’ हिन्दू राष्ट्र न बना हो लेकिन ‘डिफेक्टो'(वास्तव) में हिन्दू राष्ट्र तो बन ही चुका है।

जिस देश में अपने को तथाकथित रूप से बुद्धिजीवी कहने वाले लोग, अपने आप को धर्म, जाती, संप्रदाय, लिंग और भाषा या इलाक़े और सांप्रदायिक नज़रिए से ऊपर उठकर न सोच पाते हों वहां राष्ट्रीय एकता का सपना देखना और उसके लिए कोई “राष्ट्रीय मोर्चा” खड़ा करना महज़ एक ‘दिव्य स्वप्न’ ही हो सकता है।

आशा करता हूँ की आप मेरी तमाम बातों को व्यक्तिगत आक्षेप नहीं समझेंगे और लोकतान्त्रिक भावनाओं से मुझे असहमत होने का अधिकार देंगे जिसका वायदा भारतीय संविधान में भी किया गया है।

धन्यवाद।

क़ुरबान अली

नोट:इस पत्र की प्रति मैं ‘समाजवादी समागम’आयोजन समिति के उन सदस्यों को भी भेज रहा हुँ जिन्होंने आपको आमंत्रित किया था ताकि सनद रहे।

*डॉ. वेदप्रताप वैदिक* का लेख *‘‘सलाम करो, उस लड़के को!’’*
कल कुछ समाजवादी साथियों ने दिल्ली में दो दिन का समाजवादी समागम आयोजित किया था। देश भर से लगभग 150-200 ऐसे समाजवादी इकट्ठे हुए थे, जो देश की वर्तमान राजनीतिक दशा से चिंतित थे और कुछ पहल करने का विचार कर रहे थे। दूसरे दिन के सत्र में श्री रमाशंकरसिंह और श्री सुनीलम ने मुझे एक मुख्य वक्ता के रुप में बहुत ही आदर और आग्रह से निमंत्रित किया था। मैं जब बोलने खड़ा हुआ तो एक सज्जन खड़े होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगे कि आप आरएसएस के आदमी हैं। आप यहां क्यों बोल रहे हैं ?

उन सज्जन को यह शायद पता नहीं कि उनके पूज्य पिताजी के साथ भी, जो डाॅ. राममनोहर लोहियाजी के सहयोगी थे, मैंने कई बार प्रदर्शन, जुलुस और मंच साझा किया है। उनको सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि 5-6 साल पहले मैंने नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए क्यों प्रस्तावित किया था और सारे देश में घूम-घूमकर उसके लिए समर्थन क्यों जुटाया था ? उनको यह पता नहीं कि पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री और सरकार की मैंने जितनी कड़ी समीक्षा की है, किसी विरोधी दल के नेता ने भी इतना साहस नहीं किया है। लेकिन मैं न तो किसी दल और न ही किसी नेता का अंधभक्त हूं। मैं तो सिद्धांतों और विचारों पर कुर्बान जाता हूं। यदि मोदी अच्छे काम करें तो मैं उनका डटकर समर्थन क्यों नहीं करुंगा ?

अब से 62 साल पहले मैंने हिंदी आंदोलन में जेल काटी है। उसके बाद मैंने कई आंदोलन इंदौर और दिल्ली में चलाए। कई बार जेल गया। मेरे साथ जेल गए लड़के आगे जाकर राज्यों और केंद्र में मंत्री, मुख्यमंत्री सांसद और विधायक बने हैं। उनमें से एक दो कल की सभा में भी मौजूद थे। अब से लगभग 60 साल पहले मैंने इंदौर के क्रिश्चियन काॅलेज में डाॅ. लोहिया का भाषण करवाने का खतरा मोल लिया था। उन्होंने मुझे अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का बीड़ा उठाने की प्रेरणा दी थी।

मैंने 1977 में नागपुर में और 1998 में इंदौर में अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन आयोजित किए थे, जिनमें सर्वश्री राजनारायण, जार्ज फर्नांडीस, जनेश्वर मिश्र, कर्पूरी ठाकुर के अलावा भाजपा के कई मुख्यमंत्रियों और देश भर के हजारों समाजवादी, जनसंघी, कांग्रेसी, कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भाग लिया था। मैंने हमेशा पार्टीबाजी से ऊपर उठकर काम किया है, क्योंकि मेरा लक्ष्य मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बनना कभी नहीं रहा। इसीलिए मैं कभी किसी पार्टी का सदस्य नहीं बना और मैंने कभी चुनाव नहीं लड़ा। मेरा रास्ता तो बचपन से वह है, जो महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी, डाॅ. लोहिया और जयप्रकाश का रहा है। इसलिए जब मई 1966 में मेरे पीएच.डी. के शोधप्रबंध को हिंदी में लिखने के कारण संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ तो मेरा समर्थन मद्रास की द्रमुक पार्टी के अलावा सभी पार्टियों ने किया।

इंदिरा गांधी, डाॅ. लोहिया, आचार्य कृपालानी, मधु लिमए, भागवत झा आजाद, हीरेन मुखर्जी, हेम बरुआ, अटलबिहारी वाजपेयी, दीनदयाल उपाध्याय, गुरु गोलवलकर, चंद्रशेखर राजनारायण, डाॅ. जाकिर हुसैन, दिनकरजी, बच्चनजी- सभी ने किया। मैं द्रमुक के नेता अन्नादुराईजी से भी मिला। डाॅ. लोहिया ने ही मेरे समर्थन का बीड़ा उठाया था।

जब शिक्षा मंत्री छागलाजी ने मुझ पर हमला किया तो लोहियाजी ने संसद में कहा था, ‘‘सलाम करो, उस लड़के को।’’ डाॅ. लोहिया से उनके निवास, 7 गुरुद्वारा रकाबगंज पर रोज मुलाकात होती थी। उनके निधन के पहले जब वे विलिंगडन अस्पताल में भर्ती हुए तो मैं उन्हें बंगाली मार्केट रसगुल्ले खिलाने ले गया था, जहां मप्र के मंत्री आरिफ बेग, रमा मित्रा और उर्मिलेश झा (डाॅ. लोहिया के सचिव) भी साथ थे। मेरी ही पहल पर दीन दयाल शोध संस्थान ने ‘गांधी, लोहिया और दीनदयाल’ पुस्तक प्रकाशित की थी।

अब के प्रौढ़ या नौजवान यदि मुझ पर किसी पार्टी या संगठन का बिल्ला चिपकाना चाहें तो यह उनकी नादानी है। ये मेरे नादान भाई मुझे तो क्या, जयप्रकाशनारायणजी को भी कोसते हैं, क्योंकि उन्होंने आपात्काल के विरुद्ध आरएसएस का सहयोग लिया था। मैं यह मानता हूं कि आज देश नेतृत्वविहीन है। ऐसी स्थिति में सत्तालोलुपता की बजाय हमें ऐसा राष्ट्रीय मोर्चा खड़ा करना चाहिए, जिसमें लोग दलों, जातियों, संप्रदायों से ऊपर उठकर देश की सेवा करें। जन-जागरण करें।

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