राजस्थान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष को लेकर चल रही खींचतान से अमित शाह परेशान

राजस्थान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष को लेकर चल रही खींचतान से अमित शाह परेशान

हालाँकि अमित शाह अगले साल 2019 के चुनावों की लड़ाई के लिए पार्टी को मजबूत बनाने के मकसद से दोस्तों और दुश्मनों को लुभा रहे हैं मगर उनको राजस्थान में काफी असामान्य चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अमित शाह को 14 भाजपा शासित राज्यों में से किसी एक में भी ऐसी स्थिति देखने को नहीं मिली, जहां मुख्यमंत्री उनके पीछे दौड़ते नजर आते हों लेकिन वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस संबंध में झुकने से इंकार कर दिया।

उन्हें पिछले सप्ताह दिल्ली में पार्टी के नए प्रधान का चयन करने के लिए बुलाया गया था। अजमेर और अलवर उपचुनाव हारने के बाद अशोक परनामी ने इस्तीफा दे दिया था। यह दूसरी बैठक थी क्योंकि वसुंधरा राजे ने शाह द्वारा सुझाए गए केन्द्रीय मंत्री राजेंद्र सिंह शेखावत के नाम पर वीटो कर दिया था।

मुख्यमंत्री जाति मुक्त नेता प्रधान पद के लिए चाहती हैं। इसके विकल्प में उन्होंने एक सिंधी पंजाबी नेता श्रीचंद कृपलानी के नाम का प्रस्ताव रखा जिसे शाह ने नामंजूर कर दिया। अब ऐसी चर्चा है कि एक अन्य दलित केन्द्रीय मंत्री अर्जुन सिंह मेघवाल का नाम लिया जा रहा है लेकिन कुछ कारणों से मुख्यमंत्री ने इस नाम को भी नामंजूर कर दिया।

समझौते के तहत पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद भूपेन्द्र यादव के नाम पर चर्चा हो रही है। राजे इस नाम को स्वीकार करने की इच्छुक हैं मगर शाह का कहना है कि उनको दिल्ली में लोकसभा चुनावों के लिए उनकी सेवाओं की जरूरत है।

राजस्थान मामलों से जुड़े बीजेपी नेताओं ने कहा कि शाह राजे को संदेश भेज रहे थे। केंद्रीय नेतृत्व मुख्यमंत्री को बदलने से सावधान है, क्योंकि वह चुनाव से पहले पिच कर सकती है लेकिन वह उसे झुकाव के रूप में नहीं देखना चाहती।

भाजपा नेता ने कहा, ‘शाह का संदेश स्पष्ट है: राजे मुख्यमंत्री बनीं रहेंगी लेकिन मोदी के नाम पर वोट मांगा जाएगा। नेतृत्व के आंतरिक आकलन से पता चला है कि मतदाता राजे सरकार के प्रदर्शन से परेशान हैं और बीजेपी तब तक हार सकती है जब तक तत्काल उपाय नहीं किए जाते।

अब चर्चा यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शीघ्र ही शाह और वसुंधरा राजे के बीच मतभेदों को सुलझाने के लिए आगे आएंगे। अमित शाह ने फैसला किया है कि वह इस बात को यकीनी बनाने के लिए अपनी राजनीति के तहत जयपुर में डेरा जमाएंगे ताकि भाजपा राजस्थान विधानसभा के चुनाव जीत सके। वह यहां कोई परिसर किराए पर नहीं लेंगे और जयपुर में रहकर खुद चुनावों की निगरानी करेंगे।

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