Friday , December 15 2017

‘नेहरु ने कुरान देने से इंकार किया, लेकिन सेक्युलर मुल्क के मोदी ने गीता देकर राज्य और धर्म का घालमेल कर दिया’

भारत की मौजूदा सरकार ने राज्य और धर्म के अलगाव का फर्क़ पूरी तरह मिटा दिया हैै। संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक में जय श्री राम के नारे इसी उत्साह में लगाए गए हैं। देश और देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के लिए ऐसी हरकतें ठीक नहीं हैं, ख़ासकर तब जब सरकार का मुखिया इस काम में शामिल होै।

जापान जाकर वहां के राष्ट्रप्रमुख को गीता भेंट करना, नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर मे रुद्राभिषेक करना, मंदिर संचालकों को ढाई हजार किलो चंदन की लकड़ी और 2,400 किलोग्राम घी भेंट करना, भारत आए ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल को अक्षरधाम मंदिर घुमाना, चुनावों के दौरान मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना करना आदि ऐसे उदाहरण हैं कि नरेंद्र मोदी ने राज्य और धर्म के घालमेल की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। और यह प्रवृत्ति ख़तरनाक है। अभी नारे लग रहे हैं, कल संसद के भीतर भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग उठेगी।

आज़ाद भारत में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जब महात्मा गांधी से लेकर पहले प्रधानमंत्री ने राज्य और धर्म का घालमेल होने से रोका है।

सोमनाथ मंदिर का निर्माण होने पर जब राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाना चाह रहे थे, तब उन्हें ऐसा करने से रोका गया था। नेहरू ने तब कहा था कि धर्मनिरपेक्ष मुल्क के राष्ट्रपति को ऐसे कार्यक्रम में भाग नहीं लेना चाहिए और आख़िरकार राजेंद्र प्रसाद को उस कार्यक्रम में एक साधारण नागरिक की हैसियत से शामिल होना पड़ा था।

नरेंद्र मोदी को भी अगर ये सब करना है तो कम से कम भारत के प्रधानमंत्री की हैसियत से ना करें। वो एक नागरिक के रूप में किसी भी कार्यक्रम और पूजा स्थल पर आने-जाने के लिए स्वतंत्र हैं।

ख़ैर, नेहरू की एक और मिसाल है।

नेेहरू जब तुर्की जाने को हुए तब मौलाना आजाद ने उन्हें कुरान की एक प्रति सौंपी और कहा कि वे उसे तुर्की के राष्ट्रप्रमुख को भेंट करें। नेहरू ने आजाद का शुक्रिया अदा किया और कहा कि ‘एक सेक्युलर मुल्क का राष्ट्रप्रमुख होने के नाते मेरे लिए यह मुनासिब नहीं होगा कि मैं खास धर्म की किताब किसी को भेंट करूं। धर्मनिरपेक्षता का मतलब है राज्य और धर्म का पूर्ण अलगाव। मेरी निजी मान्यताएं हो सकती हैं मगर पद की जिम्मेदारी का तकाजा है कि मैं उन्हें अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों को प्रभावित न करने दूं।’

मगर मौजूदा सरकार में ना किसी पद की गरिमा बची है और ना ही उसकी ज़िम्मेदारी का तक़ाज़ा रह गया है।

राष्ट्रपति भवन में धर्मविशेष के आराध्य के लिए नारे लगना भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बुरा दिन है।

इसपर चुप नहीं रहना चाहिए।

  • शाहनवाज़ मालिक

 

TOPPOPULARRECENT