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मौका लगे तो इटावा जाइए!

अगर आप लोग कभी इटावा नहीं गए हों तो जाइए जरूर। कानपुर को जाने वाली अधिकांश ट्रेनें यहां रुकती हैं और सड़क मार्ग से एनएच-२ इस शहर से होकर गुजरती है। इटावा सिर्फ इसीलिए न जाएं कि वह सपा का अपना घर है या मध्य उत्तर प्रदेश का सबसे संपन्न जिला है अथवा वहां के गांव शहर से ज्यादा शिक्षित हैं। भले वह कभी डाकूग्रस्त रहा हो लेकिन वहीं पर बीहड़ को सबसे पहले उपजाऊ बनाया गया और वहां के किसानों ने सबसे पहले अपनी फसल को बिना बिचौलियों के सीधे बाजार तक ले जाने में पहल की।

प्रसिद्ध पत्रकार और आजकल सीएसडीएस में संपादक अभयकुमार दुबे इसी इटावा के हैं और उनके पिता ने इटावा शहर से जो अखबार देशधर्म निकाला था वह सीमित साधनों के बावजूद अपनी गुणवत्ता में उस समय यूपी के सर्वश्रेष्ठ दैनिक अखबारों में से था। उस जमाने में देशधर्म में लेख छप जाना शान की बात हुआ करती थी। मैं 1980-82 के दौरान दैनिक जागरण, कानपुर में घुमंतू संवाददाता के तौर पर जिलों के दौरे पर भेजा जाता था। उस वक़्त दस्यु प्रभावित जिलों पर स्टोरी करने मैं अक्सर इटावा, मैनपुरी और एटा जाता रहता। तब इसी अखबार के लोग मुझे डाकुओं के बाबत तमाम सारी सूचनाएं देते। मुझे लगा करता था कि बेहतर रहे कि मैं जागरण छोड़कर देशधर्म ही ज्वाइन कर लूं। पैसा भले कम मिलेगा लेकिन एक पत्रकार के नाते अपने काम से संतुष्टि तो मिलेगी। और जल्द ही मैने दैनिक जागरण को राम-राम कह दिया और सीधे दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस के हिंदी अखबार जनसत्ता में आ गया।

पर जब भी कानपुर जाता हूँ तो इटावा रास्ते में पड़ता ही है। इटावा पर गाड़ी रुकते ही मेरा मन मचलने लगता था कि कुछ दिन तो इटावा प्रवास किया जाए। मेरा मन किया करता कि इटावा रुक कर मैं यहाँ के बीहड़ों, किसानों और यहाँ की सामाजिक संरचना को समझूँ। बाबर जब 1526 में हिंदुस्तान आया तो इटावा भी गया। बाबरनामा में उसने इटावा का ज़िक्र किया है और इसे अच्छा शहर बताया है। हालाँकि कांस्य युग में भी इस शहर का अस्तित्त्व पाया गया है। महाभारत काल में जिस पांचाल साम्राज्य का वर्णन मिलता है, वह इटावा ही है। गुप्त साम्राज्य के बाद कन्नौज के सम्राट नागभट्ट द्वितीय ने इसे गुर्जर-प्रतिहार क्षत्रिय राजवंशों के हवाले कर दिया था। फिर सुल्तान काल और मुग़ल काल में यह मुस्लिम शासकों के पास रहा। बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इसे अपने अधीन कर लिया।

इटावा जिले की आबादी करीब 16 लाख है और साक्षरता दर 83 प्रतिशत। इटावा शहर में भी ढाई लाख के करीब लोग रहते हैं। लेकिन शिक्षा की स्थिति गाँवों में बेहतर है। दो बड़े साहित्यकार इसी इटावा से रहे हैं विश्वंभरनाथ उपाध्याय और दिनेश पालीवाल। साहित्यकार प्रियंकर पालीवाल भी इसी इटावा-कानपुर की सीमा पर स्थित कंचौसी के हैं। यहाँ सैफई में एयरपोर्ट है और शहर के बीच से दिल्ली-हावड़ा रेल लाइन। रेल लाइन के पैरलल एनएच-2 गुजरता है, जो दिल्ली शहर को कोलकाता से जोड़ता है।

इटावा इसलिए भी जाइए कि अकेले इसी शहर से पूरे यूपी की राजनितिक भी नब्ज पकड़ी जा सकती है। इतनी लंबी कथा के बाद मेरे यह लिखने का मेरा आशय भी यही है। पिछले दिनों मैं इटावा गया और रुका भी। यहाँ पर सैफई, जसवंत नगर, इकदिल, बिजौली और बकेवर में मैं गया लोगों से मिला भी। इसके अलावा जमना किनारे के और उस पार के गाँवों में गया। एक दिन करहल रुका। यादव, कुर्मी, शाक्य, राजपूत, मुसलमान व ब्राह्मण चौधरियों से मिला। आए। सब ने एक सुर से बताया कि अब नेताजी यानी कि मुलायम सिंह सर्व समाज तो दूर यादव समाज को भी नहीं साध पा रहे। उनके अनुसार नेताजी के लिए अब यादव का मतलब उनके भाई, भतीजे, पुत्र और पुत्रवधुएं ही हैं। और अब इन सबके बीच यादवी जंग छिड़ी है। उन लोगों ने कहा कि अगर अखिलेश-शिवपाल और नेताजी के बीच तलवारें खिंची रहीं तो 2019 में समाजवादी पार्टी मुंह धो रखे। यह चेतावनी थी। उन्होंने जितनी वितृष्णा मुलायम और शिवपाल के प्रति जताई उतनी ही अखिलेश और रामगोपाल की जुगल जोड़ी के प्रति भी।

मालूम हो कि इटावा समाजवादी पार्टी के आंदोलन की जन्मभूमि व कर्मभूमि है और यादव समाज उसकी धुरी। लेकिन जब यादव ही बिदक गया तो पार्टी क्या कर पाएगी! इसलिए गैर भाजपा दलों के लिए वह एक अच्छा क्षेत्र हो सकता है। पर बहुजन समाज पार्टी की नेता न तो इटावा को अपना मानती हैं न यादवों को। उधरकांग्रेस यहां साफ है। अगर ऐसी ही हालत रही तो अगले लोकसभा चुनाव तक कहीं यह यादवी गढ़ी भी विपक्ष के लिए साफ न हो जाए! भले अब इटावा में सपा का विधायक/सांसद न हो लेकिन मैनपुरी, एटा, फिरोजाबाद, फर्रुखाबाद, कन्नौज और बदायूं की धुरी तो इटावा ही है।

  • शम्भूनाथ शुक्ल

 

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