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सोहराबुद्दीन मामले में न्यायाधीश लोया कि मृत्यु को लेकर नायापालिका और मीडिया की खामोशी चिंताजनक

सोमवार और मंगलवार द कारवां द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ने जजों और उनकी सुरक्षा और नायपालिका से जुड़े कई अहम सवाल को उजागर किया किया है।

यह रिपोर्ट बृजगोपाल हरकिशन लोया के परिवार के बयान पर आधारित है, जो मुंबई विशेष केंद्रीय ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन कोर्ट की अध्यक्षता में एक न्यायाधीश है जो सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे। सोहराबुद्दीन शेख को  2005 में एक घटना के दौरान पुलिस ने कथित तौर पर मार डाला था।

सीबीआई ने दावा किया था कि शेख हत्या की साजिश के लिए जिम्मेदार अधिकारी में तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह का भी हाथ है , जो उस समय गुजरात के गृह मंत्री थे ।

पूर्व न्यायाधीश के ट्रान्सफर होने के बाद लोया का  2014 में सीबीआई अदालत में ट्रान्सफर किया गया था और लोया सोहराबुद्दीन केस पर सुनवाई कर रहे थे उन्होंने अमित शाह को लगातार दिए जा रहे छूट और कोर्ट में पेश होने पर सवाल उठाया था।

लोया ने खुद शुरू में शाह को अदालत में  हाज़िर होने के मामले की छूट दी थी लेकिन जब भाजपा नेता मुंबई में थे तब उन्होंने शाह को अदालत में हाज़िर ना होने पर जवाब मांगा था क्योंकि तब अदालत बहुत दूर नहीं था

31 अक्टूबर 2014 को लोया ने यह पूछा था कि शाह को अदालत में पेश क्यों नही किया गया और अदालत ने अगली तारीख 15 दिसम्बर को शाह को अदालत में हाज़िर होने को कहा था इसी बीच एक दिसम्बर को लोया कि मौत हो गई थी उनके परिवार को बताया गया दिल का दौरा पड़ा था

उनके परिवार ने कारवां लेख में आरोप लगाया है कि उनकी मृत्यु की परिस्थिति संदिग्ध थी, हालांकि उनका दावा है कि उन्हें समय पर बताया गया था कि वे अपनी चिंताएं सार्वजनिक न करें

उन्होंने उनकी मौत को लेकर कई अहम सवाल उठाए है जो उनकी मौत को लेकर संदेह पैदा करते हैं

लोया के मौत के समय से लेकर लोया के शरीर की स्थिति तक संदेह का कारण है जबकि उनके मोबाइल फोन को दो दिन बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता ने वापस कर दिया था। ये सब कुछ ऐसे सवाल हैं जिनकी फिर से जांच होनी चाहिए  कारवां के रिपोर्ट के अनुसार, लोया के परिवार ने लोया की मौत की जांच करने के लिए एक जांच आयोग की मांग की, लेकिन उनकी मांग पूरी नही की गई।

 

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