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गुजरात में राजधर्म को भुला दिया गया था, उम्मीद है कि उस इतिहास को UP में दोहराया न जाए

अपने 44 काबीना और राज्य मंत्रियो के साथ योगी राजधर्म की शपथ लेकर प्रदेश की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने निकल पड़े हैं। योगी की इस टीम में अपने और पराये सभी का ध्यान रखा गया है। कोई भेदभाव नहीं बरता गया है। मुस्लिमों को एक भी टिकट ना देने वाली भाजपा ने एक मुसलमान को भी मंत्री बनाया है। पिछड़ों को खास तवज्जो दी गयी है। पोस्टर से कभी गायब किये गए अजय सिंह बिष्ट यानी योगी आदित्यनाथ राजयोग के प्रबल दावेदार उत्तर प्रदेश का ताज छिनने में सफल हो गए हैं। कठिन डगर पोलिटिक्स की पार कर गए हैं योगी। लगभग एक दर्जन दावेदारों को योगी ने धूल चटा कर यह कुर्सी हासिल की है।

यह संघ सरकार है या भाजपा की सरकार है, बहस जारी है। राजनीतिक पंडित इस फैसले पर अपने-अपने तरीके से इसकी व्याख्या भी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में शून्य भागीदारी के बावजूद ममता और पटनायक ने संघ के इस फैसले पर मिश्रित एवं घोर प्रतिक्रिया व्यक्त की है। बोलने के लिए कांग्रेस की भी चुप्पी टूटी है। कांग्रेस के द्वितीय श्रेणी के लीडर की प्रतिक्रिया सामने आ रही है।

भाजपा विकास के सवाल को लेकर चुनावी समर में उतरी थी और फतह भी हासिल कर ली। इस दौरान ना तो राम की चर्चा की ना ही समान नागरिक संहिता की। धारा 370 जैसे सवाल भी दरकिनार कर दिए गए। इसी कुर्सी पर कभी गोविन्द बैठे थे और आज इसी कुर्सी पर भगवाधारी योगीनाथ बैठ गए हैं। शिक्षा के भगवाकरण पर बहुत बहस हो चुकी है। इस बीच सरयू और गोमती का पानी बहुत बह चुका है। गोविन्द वल्लभ से गोरखपुर के महंथ तक पहुंची भाजपा की यह यात्रा क्या कुछ कहती है। यह सत्ता का केवल भगवाकरण है या इतिहास का भी, इसकी पड़ताल जरुरी है।

क्या भगवा ही विकास का पैमाना है? क्या भगवा के बिना विकास की बात संभव नहीं है? आखिर योगीनाथ के कंधे पर उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी क्यों? हिन्दुवाद और विकासवाद के सिद्धांत के बीच क्या कोई सामंजस्य है? हार्ड कोर हिन्दुइज्म क्या बाजार के पक्ष में है? बढ़ते बाजार और विकसित होते नए जीवन-मूल्य के बीच हिदुत्व आखिर कैसे जिन्दा रहेगा? त्याग पूर्वक भोग करो के सिद्धांत में जीव, जगत और जगदीश की चिंता के लिए जगह कहां होगी? मुलायम हिंदुत्व और कठोर हिंदुत्व के द्वंद्व के बीच आज संघ कहां है? एक कंधे पर धरमध्वज और दूसरे कंधे पर राष्ट्र-ध्वज कबतक फहड़ता रहेगा?

संघ की स्थापना का शताब्दी वर्ष निकट है। 2025 में संघ सौ साल का हो जाएगा। 2019 में लोकसभा के चुनाव होंगें। केंद्र की सत्ता वापसी जरुरी है। शायद तबतक देश की बदल दिया जाएगा। इस बदलाव में गंगा-जमुनी तहजीब तिजारत बनी रहेगी यह तिरोहित हो जायेगी कि स्वाभाविक चिंता व्याप्त है। यह संसदीय इतिहास की नयी धारा है। मुसलमान के बिना भी सत्ता पायी जा सकती है यह सिद्ध हो चुका है।

यह पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए सिद्ध सत्य बन चुका है। मुसलमान अब सत्ता की चाभी नहीं रहे। उसकी ताकत समाप्त हो चुकी है। बिना मारे ही मुसलमान मर गए हैं। बिना कहीं भगाए ही ये भाग चुके हैं। मुसलमान केवल मतदाता सूची है, यह इतिहास अब खारिज हो रहा है। अब कभी फतवा और फरमान असरदार नहीं साबित होंगें। कुछ और ही कहानी बांकी है पढने के लिए। यह योगी सरकार स्क्रिप्ट का एक हिस्सा भर ही है। जहां तक दलित, वंचित और पिछड़ों का सवाल है वह केवल भीम-एप के सहारे साधा जायेगा। बापू, बाबासाहेब और उनकी वंचित विरासत अब हिंदुत्व का झंडा ढोने को अभिशप्त होगी। समता के सवाल अब समरसता की खिचड़ी में नमक की तरह घुलमिल जायेंगे। यथास्थितिवाद के बदले रंग समाज में कितना रंग भरेगा या बदरंग करेगा, यह तो अभी भविष्य के गर्भ में है।

गोरखपुर की सीमा बिहार को छूती है। इस बदलाव से बिहार भी अछूता नहीं रहेगा। बिहार में होने वाला विद्रोह इस बदलाव का आधार बनेगा और इसकी झलक दिखाई भी पड़ने लगी है। भगवा सन्यासिन उमा अभी गंगा सेवा ही करेगी। यह भगवाधारी भी कभी मुख्यमंत्री थी। इस शिवकन्या के बाद शिवपुत्र साधक योगीनाथ? जो भगवा की बात करेगा वही देश पर राज करेगा’ यह सन्देश अब निर्गुण से सगुण रूप धारण करेगा? संघम शरणम गच्छामि और सत्ता शरणम् गच्छामि के नए स्वर आप भी सुन ही रहे होंगें?

यह मांगलिक वेला है। मुझे भी शुभ-शुभ सोचना चाहिए। यह हिंदुत्व केवल हिन्दुहित ही नहीं वल्कि सम्पूर्ण चराचर जगत की हित की बात करे तो इससे बड़ा शुभ क्या हो सकता है। यह भावधारा का हिस्सा है, विचारधारा का नहीं। किसी विचारधारा से मुख्यमंत्री बना जा सकता है पर वक्त का महानायक नहीं। योगी को अब नयी साधना शुरू करनी पड़ेगी अन्यथा ये मुख्यमंत्री बने रह सकते हैं पर वक्त के महानायक नहीं हो सकते। सबका साथ न भी मिला हो पर सबका विकास अवश्य ही होना चाहिए।

योगी अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, केवल भाजपा के नहीं। दुराग्रह से मुक्त होना इस वक्त की एक बड़ी जरुरत है। राजधर्म की अवहेलना गुजरात में भी हुई थी वह इतिहास यहां नहीं दुहराया जाय। जिन चंगू मंगुओं के बल पर योगी राजयोगी बने उनसे पीछा छुड़ाना पड़ेगा। इनके ये असली असुर कहीं भश्मासुर न बन जाय, इसकी सावधानी इस नयी योगी सरकार को रखनी ही होगी।

अन्यथा समाज को ये भश्मासुर श्मसान बनायेंगें। उद्योगों का कब्रिस्तान बन चुके इस सूबे में जान फूंकनी होगी। श्मसान और कब्रिस्तान वे सब चुनावी मंडप के मंगल-गान थे, उसे अब दुहराने का वक्त नहीं है। उस मंगलगान को विकास का मंगलयान न बनायें योगी। शेष शुभ हो और इस नए निजाम के बेहतर इंतजाम की अपेक्षा में इस राजयोगी को बहुत बहुत बधाई!

  • बाबा विजयेंद्र
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