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एक मुस्लिम हस्ती का दर्द : गोधरा दंगों के बाद आज तक अकेला हूं

Godhra carnage: Burnt bogies of Sabarmati Express train. *** Local Caption *** Godhra carnage: Burnt bogies of Sabarmati Express train. Express archive photo

एक मुस्लिम हस्ती ने गोधरा दंगों के बाद के दर्द को बयां किया है जिसने अपने घर, पड़ोसियों और समुदाय को भी खो दिया था। वो बताते हैं कि पन्द्रह साल पहले मेरे जीवन ने एक मोड़ लिया और यह सब गोधरा में ट्रेन जलने से एक दिन पहले शुरू हुआ। मैं 26 फरवरी को शाम 8 बजे वीर सावरकर के सम्मान में वड़ोदरा में आयोजित कार्यक्रम का अतिथि था। मैंने अंडमान जेल में सावरकर के बलिदान को याद किया था। मेरी टिप्पणी यह ​​थी कि देश में केवल दो विकल्प हैं, गांधी, या सावरकर।

इन टिप्पणियों के बारह घंटे बाद साबरमती ट्रेन जलाई गई। सांप्रदायिक तनाव भयावह स्तर तक पहुंचा। वडोदरा में, पहला हमला मेरी कार पर हुआ जिसे जला दिया गया था। दूसरे दिन पुलिस की मौजूदगी में मेरे घर में संगठित लूट और विनाश हुआ। भीड़ को कहा गया था कि आपके पास 15 मिनट हैं, जो आप चाहते हैं, वह कर लें। एक चमत्कार ने मेरी बेटी और मेरे जीवन को बचाया। अजीबोगरीब तरह से मेरी बेटी जल्द ही वह गुजराती हिंदू सज्जन से शादी करनी चाहती थीं।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तीव्रता डरावनी थी। मेरे अपने मामले में एक गुजराती लेखक के साथ दोस्ती अचानक शत्रुता में बदल गई। एक ऐसा व्यक्ति जो मेरी एक आदर्श मुस्लिम के रूप में प्रशंसा करता था, एकदम बदल गया। उसकी पागल टिप्पणियों पर मुझे हंसी आई। मेरा घर को खोने के बाद मैंने अपने विश्वविद्यालय से कर्मचारियों के आवास के लिए अनुरोध किया उन्होंने मुझे विश्वविद्यालय में कोने पर एक फ्लैट दिया था पर मेरे तीन पड़ोसी जल्द ही वहां से चले गए। फिर पूरे ब्लॉक में मैं अकेले रह गया। कोई भी मेरे पास रहना नहीं चाहता था।

2002 के दंगे ने मेरी आंख खोल दी फिर मुझे भारत में एक मुस्लिम होने के दर्द का एहसास हुआ। उदाहरण के लिए हमारे दिवंगत राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलम जैसे एक विशिष्ट हस्ती को 10 साल पहले वड़ोदरा के मुस्लिम स्कूल एक राज्य स्तरीय विज्ञान मेले का उद्घाटन करने के लिए कहा और तर्क दिया कि इस स्कूल के लिए एक अच्छा संदेश होगा जहाँ मुस्लिम और हिंदू छात्र और कर्मचारियों बराबर अनुपात में हैं। डॉ. कलाम ने अपने सचिव के माध्यम से इनकार कर दिया कि वे गुजरात में बार-बार नहीं आ सकते। मेरे सदमे की कल्पना करो जब उन्होंने राजकोट में स्वामीनाथ के समारोह में एक पखवाडे बाद भाग लिया।

एक और अजीब बात विशेष रूप से गुजरात की जेलों में मुसलमान का उच्च अनुपात है। हम इस तथ्य की व्याख्या कैसे करते हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि पुलिस संरचना मुसलमानों के खिलाफ पक्षपातपूर्ण है? या क्या यह हो सकता है कि अदालत मुसलमानों की दुर्दशा के प्रति संवेदनशील नहीं है? सिर्फ एक हफ्ते पहले, मुसलमानों के एक समूह को आपराधिक आचरण के लिए निर्दोष पाया गया, लेकिन जेल में 10 साल से अधिक रहने के बाद। इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? संयोग से, 2002 में मेरे घर पर हमले के लिए कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। आखिर यह स्पष्ट भेदभाव क्यों है?

(लेखक भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर और वडोदरा में मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं)

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