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सुप्रीम कोर्ट का यू-टर्न, कहा- बहुविवाह और हलाला पर सुनवाई का रास्ता अब भी खुला है

तीन तलाक पर चल रही सुनवाई के चौथे दिन यू-टर्न लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बहुविवाह और हलाला पर सुनवाई का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ है।

मुख्य न्यायाधीश जे. एस. खेहार की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने कहा, “हमने केवल तीन तलाक पर निर्णय लिया है। लेकिन बहुविवाह और हलाला के मुद्दें पर सुनवाई आगे चलकर की जाएगी।”

इसी बीच केंद्र की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि केंद्र सरकार तीन तलाक पर कानून बनाने को तैयार है। इस मुद्दे पर कोई वैक्यूम नहीं है।

उन्होंने कोर्ट से अपील किया कि सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक, बहुविवाह और हलाला को रद्द कर दे। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि तलाक के तीनों तरीके- तलाक-ए-बिद्दत, तलाक-ए-हसना और तलाक-ए-अहसन को रद्द कर दिया जाए तो क्या होगा? इस पर अटार्नी जनरल ने कहा कि सरकार इस पर क़ानून लाने को तैयार है।

इससे पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि तलाक के मामले में मुस्लिम समाज में महिलाओं के अधिकार पुरुषों की तुलना में कम हैं। देश में अन्य समुदायों की महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार नहीं है।

लेकिन कोर्ट ने जब सरकार से पूछा कि अगर कोर्ट इनको रद्द कर देता है तो मुस्लिम पतियों के पास क्या विकल्प होगा?

तो इसके जवाब में केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल ने कहा कि शादी और तलाक का धर्म या धार्मिक प्रथा से कोई लेना देना नहीं। उन्होंने कहा कि किसी के जीवन को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है।

इसके बाद केंद्र के मतो तो रखते हुए उन्होंने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक, हलाला और बहूविवाह को रद्द कर देता है तो केंद्र इस पर कानून लाने को तैयार।

सरकार के तरफ से यह भी दलील दी गई कि तीन तलाक संविधान के विपरीत है और ये महिलाओं के समानता, लैंगिक समानता और मानवाधिकार के खिलाफ है। इसके अलावा केंद्र की तरफ से यह भी कहा गया कि यह मामला अल्पसंख्यकों के जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है इसलिए फिछली सरकारों ने इस पर कानून नहीं बनाया। रोहतगी ने कहा कि तीन तलाक की वजह से मुस्लिमों की आधी आबादी असहाय महसूस कर रही है।

वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड की तऱफ से पेश हुए वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि हर समुदाय में महिलाओं के साथ भेदभाव होता है।  हिंदू लॉ के मुताबिक पिता पर होता है कि वो बेटी को जायदाद में हिस्सा दे या नहीं।

लेकिन मुस्लिम लॉ में पिता को चौथाई हिस्सा बेटी को देना ही होता है। क्या ये भेदभाव नहीं है? इसके बाद उन्होंने कहा कि आप क्या चाहते हैं कि हिंदुओं में बेटी को बिना कोई पाई मिले वो सालों तक तलाक के लिए लड़ती रहें?

इसके बाद अदालत ने कहा, ‘‘हमारे पास जो सीमित समय है उसमें तीनों मुद्दों को निबटाना संभव नहीं है। हम उन्हें भविष्य के लिए लंबित रखेंगे।’’

अदालत ने यह बात तब कही जब मुकुल रोहतगी ने कहा कि दो सदस्यीय पीठ के जिस आदेश को संविधान पीठ के समक्ष पेश किया गया है उसमें तीन तलाक के साथ-साथ बहुविवाह और हलाला का मुद्दा भी शामिल हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बचे मुद्दों को वो भविष्य में निबटाएगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को चुनौती देने वाली एक याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। चार दिन पहले हुए सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कई बड़े सवाल उठाए थे।

कोर्ट ने कहा था कि तीन तलाक इस्लाम में शादी खत्म करने का सबसे बुरा और अवांछनीय तरीका है। कोर्ट ने पूछा था कि जो धर्म के अनुसार सबसे घिनौना काम है, उसे कानूनी तौर पर कैसे वैध ठहराया जा सकता है?

कोर्ट ने कहा था कि जो ईश्वर की नजर में पाप है वो शरियत का हिस्सा कैसे हो सकता है? अगर भारत में तीन तलाक विशिष्ट है तो दूसरे देशों ने कानून बनाकर क्यों तीन तलाक को खत्म कर दिया?

इस पर कोर्ट की मदद कर रहे पूर्व कानून मंत्री और कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद ने कहा था कि उनकी नजर में तीन तलाक पाप है। लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड का मानना है तीन तलाक भले ही धार्मिक तौर पर घिनौना है पर यह वैध है।

हालांकि मुसलमानों के सारे स्कूल ऑफ थॉट इस बात को मानते है कि तलाक-ए-बिद्दत हराम है और यह सही तरीका नहीं है।

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