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धर्मांतरण कर चुके लोगों की ‘घर वापसी’ पर काम करते थे असीमानंद

हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुए धमाके में अदालत से बरी हुए स्वयंभू धर्मगुरु स्वामी असीमानंद वह चेहरा हैं, जिनके बारे में संघ परिवार के लोग खुलकर बात नहीं करना चाहते। खासतौर पर उन दिनों के बारे में जब असीमानंद आरएसएस से जुड़े संगठनों के करीब थे। नवभारत टाइम्स के अनुसार गुजरात के आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों के मतांतरण के अभियान’ को रोकने के लिए उन्होंने प्रयास किए थे।

हिंदू संगठनों से जुड़े रहे असीमानंद ने पश्चिम बंगाल, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, असम, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम में काम किया। लेकिन गुजरात, झारखंड और अंडमान द्वीप के सुदूर इलाकों में असीमानंद ने प्रमुख रूप से काम किया और यहीं से उनकी पहचान बनी। एक बंगाली परिवार में जन्मे असीमानंद ने शुरुआत से ही आदिवासियों के बीच काम किया। आरएसएस के एक सीनियर लीडर ने बताया, ‘एक गुरु से संन्यास लेने के बाद उन्होंने अपना नाम बदल लिया था और फिर आदिवासियों के बीच काम करने लगे।’

एक संघ नेता ने कहा, ‘असीमानंद का रामकृष्ण मिशन से मोहभंग हो गया था, लेकिन उनके स्वामी विवेकानंद और हिंदुओं के प्रति उनके योगदान को लेकर उनके मन में गहरी श्रद्धा थी।’ उन्होंने कहा, ‘वह साफ कहते थे कि अधिक हिंदुओं को अपने साथ जोड़ो, लेकिन यह ध्यान रहे कि कोई भी हिंदू छोड़कर न जाए। असीमानंद को 1990 के दशक के आखिरी में गुजरात के आदिवासी बहुल डांग जिले में भेजा गया था।

यहा उन्होंने खासतौर पर ईसाई मिशनरियों की ओर से मतांतरण पर नजर रखी और उसे रोकने का प्रयास किया। यही नहीं जहां भी उन्हें संभावना दिखी, वहां उन्होंने ईसाई बने हिंदुओं को वापस हिंदुत्व से जोड़ने का प्रयास किया। वीएचपी के एक सीनियर लीडर ने कहा, ‘आदिवासी समाज के जीवन स्तर को सुधारने के लिए संघ हर साल अपने स्वयंसेवकों की आहुति देता है।

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