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‘अदालत बनकर फ़ैसला ना सुनाएं अर्नब गोस्वामी’- तवलीन सिंह

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार तवलीन सिंह ने अपने लेख वक्त की नब्ज के जरिए रिपब्लिक टीवी के पत्रकार अर्नब गोस्वामी पर सवाल खड़े किए हैं। आप भी पढ़िए उनका लेख-

“हम पत्रकारों में एक अनकहा उसूल है कि हम एक-दूसरे के राज को राज रखते हैं। मिसाल के तौर पर इस बात को अच्छी तरह जानते हुए कि मेरे ऐसे कई साथी हैं, जो सरकारी मेहरबानियों को बाहें खोल कर स्वीकार करते हैं, ‘स्वतंत्र पत्रकार’ होने के बावजूद, मैं इनके बारे में कभी लिखती नहीं हूं। इस बात को जानते हुए कि मेरे कई बंधु हैं, जो चुनाव के समय राजनेताओं से पैसा लेकर उनकी तारीफ करते हैं अपने लेखों में, मैं उनके बारे में भी नहीं लिखती हूं।

इस हफ्ते अगर मैं अपने एक पत्रकार साथी की आलोचना करने पर मजबूर हूं तो इसलिए कि कुछ सीमाएं हैं पत्रकारिता में, जिनको पार नहीं किया जाना चाहिए और अर्णव गोस्वामी के नए न्यूज चैनल रिपब्लिक ने इन सीमाओं को अपने जीवन के पहले क्षणों में ही तोड़ डाला है। रिपब्लिक चैनल का मिजाज सनसनीखेज है। रोज कोई नया ‘स्कूप’ दिखाना उसका मकसद है। मुझे इस पर कोई एतराज नहीं है।

अर्णब जब टाइम्स नाउ चैनल के सबसे चमकते सितारे बने थे, तो इसीलिए कि वे एक नया, आक्रामक अंदाज लाए थे टीवी पत्रकारिता में। इस आक्रामक अंदाज को अपने देशवासी पसंद न करते तो अर्णव इतने बड़े सितारे नहीं बन सकते थे। सो, उनको पूरा अधिकार है अपने नए चैनल पर अपना वही रूप दिखाना। लेकिन अपने चैनल को एक अदालत में तब्दील करके, किसी पर मुकदमा चला कर उसको दंडित करने का कोई हक नहीं है।

शशि थरूर के साथ उन्होंने बिल्कुल ऐसा ही किया। उनको अपनी पत्नी सुनंदा पुष्कर का हत्यारा साबित करने की कोशिश में न कोई नए सबूत पेश किए रिपब्लिक ने और न ही साबित किया कि थरूर ने शक की सुई को अपने राजनीतिक बल से अपनी दिशा से हटवाया। फिर भी थरूर के साथ रिपब्लिक के पत्रकार ऐसे पेश आए जैसे वे कोई अपराधी हों। जब उनके सवाल कुछ ज्यादा ही बदतमीज हुए, तो इन पत्रकारों ने कहना शुरू कर दिया कि थरूर के ‘गुंडों’ ने उनके साथ बदसलूकी की।

बार-बार यह बात वे कहते गए, लेकिन बदसलूकी को दिखाया नहीं। जो तस्वीरें दिखाई गर्इं, उनमें सिर्फ भीड़ में घिरे थरूर दिखाई दिए और थोड़ी-बहुत धक्का-मुक्की दिखी, जो अक्सर होती है जब पत्रकारों का मजमा इकट्ठा होकर किसी को घेर लेता है। सबसे अजीब लगा जब अर्णब ने बार-बार कहना शुरू किया कि शशि थरूर हमने आपको घेर लिया है, अब आप कहीं नहीं जा सकते, आपके घर के चारों तरफ हमारे पत्रकार हैं।

मेरी राय में यह पत्रकारिता नहीं है। पत्रकारों को कोई अधिकार नहीं है किसी को दोषी ठहराने का। अगर रिपब्लिक चैनल के पास सबूत हैं कि पुलिस को सुनंदा पुष्कर की हत्या की पूरी जांच करने से रोका गया, तो उनका फर्ज है कि उस सबूत को वे सामने लाएं। कानूनी कार्रवाई करना अदालत का काम है। हत्या का आरोप लगाना पुलिस का काम है, लेकिन रिपब्लिक चैनल ने ये सारे अधिकार अपने हाथों में लेकर थरूर को दोषी ठहराने की कोशिश की।

यह भी साबित करने की कोशिश की कि सुनंदा पुष्कर का वास्ता रूसी माफिया के साथ था, उनको इसलिए मारा गया। ऐसा किस आधार पर कह रहे हैं रिपब्लिक के पत्रकार? कुछ ऐसे लोगों के कहने पर, जिन्होंने एक बार नहीं बताया कि उनको यह जानकारी मिली कहां से? इतना तो कम से कम पूछ लेते इन लोगों से कि उनको यह जानकारी कहां से मिली और जब मिली, उन्होंने पुलिस को क्यों नहीं दी?

शेक्सपियर ने कभी कहा था कि अगर झूठ को बार-बार कहा जाए तो अंत में वह सच बन जाता है। कुछ ऐसा ही दिखा मुझे रिपब्लिक चैनल पर। माना कि भारत के तमाम टीवी चैनल बहस पर ज्यादा ध्यान देते हैं और खोजी पत्रकारिता पर बहुत कम। जब कोई बहुत बड़ा हादसा भी होता है, तो हम हर चैनल पर देखते हैं सिर्फ बहस। इकट्ठा हो जाती हैं हर शाम वही विशेषज्ञों की टोलियां और उस हादसे का विश्लेषण करने बैठ जाती हैं ऐसे जैसे कि उन्होंने अपनी आंखों से उसे देखा हो।

विदेशी चैनल ऐसा नहीं करते। घटनास्थल पर भेजते हैं अपने पत्रकार और पूरी जांच कराते हैं घटना की, उसके बाद होती है बहस। हमारे देश में टीवी पत्रकारिता बहुत नई है। भूल गए हैं हम कि 1992 से पहले एक भी प्राइवेट चैनल नहीं था भारत में। भूल गए हैं कि दूरदर्शन को अगर देखता था कोई तो समाचारों के लिए नहीं, क्योंकि हम सब जानते थे कि दूरदर्शन पर समाचार कम होता था, मौजूदा सरकार का प्रचार ज्यादा।

यही कारण है कि आज भी दूरदर्शन को इतने कम लोग देखते हैं। जबसे प्राइवेट चैनल आए हैं, कम से कम कुछ तो असली खबरें देखने को मिलती हैं, लेकिन खोजी पत्रकारिता न के बराबर है। सो, अर्णब गोस्वामी अगर इस अभाव को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं, तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन पत्रकारिता के दायरे से निकल कर अगर वे अपने आपको न्यायाधीश बनाएंगे और अपने चैनल को अदालत, तो न वे देश की सेवा कर पाएंगे और न पत्रकारिता की।

इतना कुछ है करने को पत्रकारिता के दायरे में रह कर कि अफसोस की बात है कि उस दायरे से बाहर निकल कर वे उस काम को कर रहे हैं, जो पत्रकारों का नहीं है। क्या वे जानते नहीं हैं कि किसी व्यक्ति के पीछे पड़ कर अगर वे रिपब्लिक की टीवी अदालत में दोषी पाते भी हैं तो उस व्यक्ति को वे सिर्फ बदनाम कर सकते हैं और कुछ नहीं। अपराध साबित होगा असली अदालत में।”

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